हरिद्वार । 40 दिन तक चले लॉक डाउन से देश की अर्थव्यवस्था धराशाई हो गई है जबकि 2 सप्ताह का लॉक डाउन बढ़ाने के बाद भी कोई गारंटी नहीं है कि 17 मई के बाद लाकडाउन हटा लिया जाएगा। लॉक डाउन से सर्वाधिक नुकसान कृषि और कृषकों का हुआ है जिसका उत्पादन और विपणन दोनों पर इतना दुष्प्रभाव पड़ा कि किसान की आर्थिकी नष्ट हो गई और उससे भी बुरी खबर यह कि उसका बेटा जो गांव छोड़कर शहरों में रोजगार या नौकरी के लिए गया था वह भी भूखा प्यासा पैदल चलकर गांव वापस आ गया जिससे किसान का सारा गणित गड़बड़ा गया है। उद्योगों के बंद होने से किसान पर और दोहरी मार पड़ी है उसका बेटा जो मजदूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण घर से बाहर रहकर कर रहा था वह भी अब पुनः परिवार पर भार बन गया है।
केन्द्र तथा राज्य सरकारों को चाहिए कि उद्योगों के स्थान पर किसानों को प्रोत्साहन देकर देश की 70% आबादी को स्वरोजगार से जोड़े। किसान के जो भी उत्पाद हैं अन्य खाधान्न ,सब्जी ,फल ,फूल ,दूध तथा मत्स्य सभी मानव जीवन के लिए उपयोगी है जबकि हमारे देश के 50 से 70% उद्योगों में लग्जरी तथा ऐसे सामानों का उत्पादन होता है जो समाज में फिजूलखर्ची फैलाकर आर्थिक स्थिति के विकास में बाधक बनते हैं। एसी फ्री ज क्रीम ,पाउडर, सोडा ,लेमन ,कोकोकोला तथा मिनरल वाटर सहित सैकड़ों ऐसे उत्पाद हैं जिनके ना होने से मानव जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। सरकार उद्योगों को अनुदान तथा बिना ब्याज अथवा कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराती है फिर भी यह उद्योग ना तो समाज की आवश्यकता पूरी कर पाते और ना ही बेरोजगारी समाप्त कर पाते हैं जबकि सरकार यदि कृषि को प्रोत्साहन दें तो सीधे तौर पर देश की 70% आबादी स्वरोजगार से जुड़कर खुशहाल हो जाएगी। लाकडाउन से बदहाल हुई भारत की अर्थव्यवस्था को केवल और केवल कृषि में निवेश बढ़ाकर ही पटरी पर लाया जा सकता है इसके लिए सरकार सभी ग्रामों को सड़कों जिला मुख्यालय ,कस्बों तथा राष्ट्रीय राजमार्ग से जोड़कर व्यवसायपरक बना सकती है। सरकार को चाहिए कि वह कृषकों को बिना ब्याज के कृषि क्षेत्रफल के आधार पर ऋण उपलब्ध कराएं तथा कृषक ऋण अदायगी की प्रोजेक्ट बनाकर सरकार के समक्ष प्रस्तुत करें।किसानों को परंपरागत कृषि के स्थान पर बागवानी ,पशुपालन ,मत्स्य पालन के साथ ही सब्जी ,दलहन तथा तिलहन को फसलचक्र के रूप में अपनाना होगा। कृषकों को चाहिए कि वे रासायनिक खादों का उपयोग बंद कर जैविक तथा ऑर्गेनिक उर्वरकों का प्रयोग कर अपने धन की बचत करें तथा विषाक्त खाद्यान्न उत्पादन से छुटकारा पाकर जन स्वास्थ्य संवर्धन में योगदान दें। किसान की सबसे बड़ी हार उसकी फसलों का वाजिब मूल्य न मिलना होता है इसलिए किसान कर्जे में दबते हैं और आत्महत्या करते हैं।
प्रत्येक उत्पादन का नियम होता है कि उत्पादक अपने उत्पाद को तैयार करने से पूर्व उसके लिए बाजार तलाशता है लेकिन किसान उत्पादन तो कर लेता है उसके पास विपणन की व्यवस्था नहीं होती है। उसके उत्पाद का या तो मंडी में आधा पौना भाव मिलता है या बिचौलिए किसान का मुनाफा खा जाते हैं और किसान जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी गरीब का गरीब ही बना रहता है। किसानों को चाहिए कि वह नकदी दीर्घकालिक तथा सीजनल सभी फसलों का उत्पादन प्रारंभ करें तथा अपने शिक्षित बच्चों को किसी उद्योग एवं निजी संस्थान में नौकरी कराने के स्थान पर उनको अपने उत्पादों की मार्केटिंग में लगाए। तभी देश और समाज का उत्थान होगा तथा बर्बाद हो चुकी अर्थव्यवस्था दोवारा पटरी पर आएगी और भारत खाद्यान्न में लकड़ी, दुग्ध तथा औषधियों का निर्यात कर विश्व में अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बना सकता है ।
केन्द्र तथा राज्य सरकारों को चाहिए कि उद्योगों के स्थान पर किसानों को प्रोत्साहन देकर देश की 70% आबादी को स्वरोजगार से जोड़े। किसान के जो भी उत्पाद हैं अन्य खाधान्न ,सब्जी ,फल ,फूल ,दूध तथा मत्स्य सभी मानव जीवन के लिए उपयोगी है जबकि हमारे देश के 50 से 70% उद्योगों में लग्जरी तथा ऐसे सामानों का उत्पादन होता है जो समाज में फिजूलखर्ची फैलाकर आर्थिक स्थिति के विकास में बाधक बनते हैं। एसी फ्री ज क्रीम ,पाउडर, सोडा ,लेमन ,कोकोकोला तथा मिनरल वाटर सहित सैकड़ों ऐसे उत्पाद हैं जिनके ना होने से मानव जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। सरकार उद्योगों को अनुदान तथा बिना ब्याज अथवा कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराती है फिर भी यह उद्योग ना तो समाज की आवश्यकता पूरी कर पाते और ना ही बेरोजगारी समाप्त कर पाते हैं जबकि सरकार यदि कृषि को प्रोत्साहन दें तो सीधे तौर पर देश की 70% आबादी स्वरोजगार से जुड़कर खुशहाल हो जाएगी। लाकडाउन से बदहाल हुई भारत की अर्थव्यवस्था को केवल और केवल कृषि में निवेश बढ़ाकर ही पटरी पर लाया जा सकता है इसके लिए सरकार सभी ग्रामों को सड़कों जिला मुख्यालय ,कस्बों तथा राष्ट्रीय राजमार्ग से जोड़कर व्यवसायपरक बना सकती है। सरकार को चाहिए कि वह कृषकों को बिना ब्याज के कृषि क्षेत्रफल के आधार पर ऋण उपलब्ध कराएं तथा कृषक ऋण अदायगी की प्रोजेक्ट बनाकर सरकार के समक्ष प्रस्तुत करें।किसानों को परंपरागत कृषि के स्थान पर बागवानी ,पशुपालन ,मत्स्य पालन के साथ ही सब्जी ,दलहन तथा तिलहन को फसलचक्र के रूप में अपनाना होगा। कृषकों को चाहिए कि वे रासायनिक खादों का उपयोग बंद कर जैविक तथा ऑर्गेनिक उर्वरकों का प्रयोग कर अपने धन की बचत करें तथा विषाक्त खाद्यान्न उत्पादन से छुटकारा पाकर जन स्वास्थ्य संवर्धन में योगदान दें। किसान की सबसे बड़ी हार उसकी फसलों का वाजिब मूल्य न मिलना होता है इसलिए किसान कर्जे में दबते हैं और आत्महत्या करते हैं।
प्रत्येक उत्पादन का नियम होता है कि उत्पादक अपने उत्पाद को तैयार करने से पूर्व उसके लिए बाजार तलाशता है लेकिन किसान उत्पादन तो कर लेता है उसके पास विपणन की व्यवस्था नहीं होती है। उसके उत्पाद का या तो मंडी में आधा पौना भाव मिलता है या बिचौलिए किसान का मुनाफा खा जाते हैं और किसान जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी गरीब का गरीब ही बना रहता है। किसानों को चाहिए कि वह नकदी दीर्घकालिक तथा सीजनल सभी फसलों का उत्पादन प्रारंभ करें तथा अपने शिक्षित बच्चों को किसी उद्योग एवं निजी संस्थान में नौकरी कराने के स्थान पर उनको अपने उत्पादों की मार्केटिंग में लगाए। तभी देश और समाज का उत्थान होगा तथा बर्बाद हो चुकी अर्थव्यवस्था दोवारा पटरी पर आएगी और भारत खाद्यान्न में लकड़ी, दुग्ध तथा औषधियों का निर्यात कर विश्व में अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बना सकता है ।
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