घर वापसी कराने वालों के राज में घर वापस आने को तरस रही देश की जनता
कोरोना के कहर ने पूरे विश्व को हिलाकर रख दिया है और 22 मार्च के जनता कर्फ्यू के बाद 24 मार्च से हुई 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा तथा बाद में 19 दिन की बढ़ोत्तरी ने देश की जनता का जीवन इतना कष्टमय बना दिया कि मजदूर और असहाय वर्ग अब भूख से मरने के स्थान पर कोरोना से संघर्ष करने में विश्वास करने लगा है। भारत सरकार ने भले ही बिना किसी तैयारी के नोटबंदी और जीएसटी की भांति अचानक यह निर्णय ले लिया हो लेकिन तीन सप्ताह तक भी कोरोना की रोकथाम के लिए किसी प्रकार की दवाई की खोज किए बगैर आम जनता पर पुलिस की सख्ती करवाना अब जनता के जहन को कुछ और ही संदेश दे रहा है। भारत में लगभग 40 प्रतिशत जनता दैनिक मजदूरी पर और 10 प्रतिशत जनता असंगठित क्षेत्र जिसे निजी क्षेत्र भी कह सकते हैं के माध्यम से अपना पेट पालती है। कुल मिलाकर देश की 50 प्रतिशत आबादी दो जून रोटी के लिए तरस रही है और सरकारी तंत्र जनता की आवाज सुनने के स्थान पर सरकारी आदेशों के पालन के नाम पर जनाधिकारों का उल्लंघन कर रहा है।
हमारे देश की राजनीति इतनी गंदी और तंत्र इतना स्वार्थी है कि वह संकट की घड़ी में भी सहानुभूति नाम की चीज से रु-ब-रु नहीं हो रहा है। राहत सामग्री का आलम यह है कि भाजपा नेता केवल अपने वोट बैंक जो तीस प्रतिशत के लगभग है उसी को राहत सामग्री दे रहे हैं तो कांग्रेसियों का भी यही हाल है। हमारे देश के कथित समाजसेवी और चंदे का धंधा करने वाले संत तथा उद्योगपति भी अपने स्तर से असहायों की सहायता न कर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री राहत कोषों में धनराशि देकर समाचार-पत्र एवं चैनलों में सुर्खियां बटोर रहे हैं। संकट की इस घड़ी में जब पूरा देश एकजुट होकर कोरोना से लड़ रहा है तो भी सरकारी तंत्र और राजनेता अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने से बाज नहीं आ रहे हैं, इस कोरोना ने सभी राजनैतिक दलों एवं सरकारी तंत्र की पोल खोल दी है। राष्ट्रवाद और देशभक्ति का नारा लगाने वालों के विषय में उस जनता की आवाज सुनो जो अपने घर से दूर ऐसे स्थानों पर फंसे हैं जहां भिक्षा की लाइन में लगकर पेट की क्षुधा शांत करनी पड़ रही है और अपने ही देश में अपने वतन तथा परिवार से मिलने को तरस रहे हैं।
कोरोना से जहां पूरा देश एकजुट होकर लड़ रहा है वहीं राजनेता ‘अंधा बांटे रेबड़ी अपने-अपने को देय’ वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हैं। इस कार्य में न केवल सत्ता पक्ष बल्कि विपक्ष की भूमिका भी अछूती नहीं रह गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा अमेठी को भेजी गई खाद्य सामग्री ने उनके प्रति देश की जनता में जो सहानुभूति थी उसमें काफी गिरावट आयी है। संकट की घड़ी में भी मुंह देख कर सहायता राशि और राशन का वितरण हो रहा है यह न केवल निन्दनीय कृत्य बल्कि समाज में विघटन के भाव भरने वाला है और देश की निरीह जनता को मूल अधिकारों का हनन समाजद्रोह की श्रेणी में आता है। राहत सामग्री में भेदभाव बरतने वालों को जनता समझे और वे लोग जिस दल से संबंध रखते हों उनका बहिष्कार करे। कोरोना भारत की मजबूत और मेहनतकश जनता पर निष्प्रभावी सिद्ध हो रहा है। अतः मजदूर एवं दैनिक आधार पर रोजी-रोटी अर्जित करने वालों के लिए सरकारी बंदिशें अब समाप्त कर देनी चाहिए ताकि जनता अपने तथा अपने परिवार के लिए आजीविका का प्रबंध कर सके क्योंकि सरकारी प्रबन्धों तथा मीडिया में प्रसारित समाचारों को सुन-सुन कर जनता के सब्र का बांध अब टूट रहा है और समय रहते सरकार को चाहिए कि वह आम जनता के मूल अधिकारों को बहाल करे।
कोरोना के कहर ने पूरे विश्व को हिलाकर रख दिया है और 22 मार्च के जनता कर्फ्यू के बाद 24 मार्च से हुई 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा तथा बाद में 19 दिन की बढ़ोत्तरी ने देश की जनता का जीवन इतना कष्टमय बना दिया कि मजदूर और असहाय वर्ग अब भूख से मरने के स्थान पर कोरोना से संघर्ष करने में विश्वास करने लगा है। भारत सरकार ने भले ही बिना किसी तैयारी के नोटबंदी और जीएसटी की भांति अचानक यह निर्णय ले लिया हो लेकिन तीन सप्ताह तक भी कोरोना की रोकथाम के लिए किसी प्रकार की दवाई की खोज किए बगैर आम जनता पर पुलिस की सख्ती करवाना अब जनता के जहन को कुछ और ही संदेश दे रहा है। भारत में लगभग 40 प्रतिशत जनता दैनिक मजदूरी पर और 10 प्रतिशत जनता असंगठित क्षेत्र जिसे निजी क्षेत्र भी कह सकते हैं के माध्यम से अपना पेट पालती है। कुल मिलाकर देश की 50 प्रतिशत आबादी दो जून रोटी के लिए तरस रही है और सरकारी तंत्र जनता की आवाज सुनने के स्थान पर सरकारी आदेशों के पालन के नाम पर जनाधिकारों का उल्लंघन कर रहा है।
हमारे देश की राजनीति इतनी गंदी और तंत्र इतना स्वार्थी है कि वह संकट की घड़ी में भी सहानुभूति नाम की चीज से रु-ब-रु नहीं हो रहा है। राहत सामग्री का आलम यह है कि भाजपा नेता केवल अपने वोट बैंक जो तीस प्रतिशत के लगभग है उसी को राहत सामग्री दे रहे हैं तो कांग्रेसियों का भी यही हाल है। हमारे देश के कथित समाजसेवी और चंदे का धंधा करने वाले संत तथा उद्योगपति भी अपने स्तर से असहायों की सहायता न कर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री राहत कोषों में धनराशि देकर समाचार-पत्र एवं चैनलों में सुर्खियां बटोर रहे हैं। संकट की इस घड़ी में जब पूरा देश एकजुट होकर कोरोना से लड़ रहा है तो भी सरकारी तंत्र और राजनेता अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने से बाज नहीं आ रहे हैं, इस कोरोना ने सभी राजनैतिक दलों एवं सरकारी तंत्र की पोल खोल दी है। राष्ट्रवाद और देशभक्ति का नारा लगाने वालों के विषय में उस जनता की आवाज सुनो जो अपने घर से दूर ऐसे स्थानों पर फंसे हैं जहां भिक्षा की लाइन में लगकर पेट की क्षुधा शांत करनी पड़ रही है और अपने ही देश में अपने वतन तथा परिवार से मिलने को तरस रहे हैं।
कोरोना से जहां पूरा देश एकजुट होकर लड़ रहा है वहीं राजनेता ‘अंधा बांटे रेबड़ी अपने-अपने को देय’ वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हैं। इस कार्य में न केवल सत्ता पक्ष बल्कि विपक्ष की भूमिका भी अछूती नहीं रह गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा अमेठी को भेजी गई खाद्य सामग्री ने उनके प्रति देश की जनता में जो सहानुभूति थी उसमें काफी गिरावट आयी है। संकट की घड़ी में भी मुंह देख कर सहायता राशि और राशन का वितरण हो रहा है यह न केवल निन्दनीय कृत्य बल्कि समाज में विघटन के भाव भरने वाला है और देश की निरीह जनता को मूल अधिकारों का हनन समाजद्रोह की श्रेणी में आता है। राहत सामग्री में भेदभाव बरतने वालों को जनता समझे और वे लोग जिस दल से संबंध रखते हों उनका बहिष्कार करे। कोरोना भारत की मजबूत और मेहनतकश जनता पर निष्प्रभावी सिद्ध हो रहा है। अतः मजदूर एवं दैनिक आधार पर रोजी-रोटी अर्जित करने वालों के लिए सरकारी बंदिशें अब समाप्त कर देनी चाहिए ताकि जनता अपने तथा अपने परिवार के लिए आजीविका का प्रबंध कर सके क्योंकि सरकारी प्रबन्धों तथा मीडिया में प्रसारित समाचारों को सुन-सुन कर जनता के सब्र का बांध अब टूट रहा है और समय रहते सरकार को चाहिए कि वह आम जनता के मूल अधिकारों को बहाल करे।
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