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केन्द्र व राज्य सरकार की असंवैधानिक कार्यशैली से आम जनता त्रस्त

देश की जनता द्वारा चुनी गयी सरकार चाहे केन्द्र की हो या किसी राज्य की जब उसकी कार्यशैली संविधान के विपरीत होती है तो संवैधानिक संस्थाओं तथा संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के दायित्व बढ़ जाते हैं। न्यायपालिका एवं मीडिया से जनता को बड़ी उम्मीदें होती हैं और इन दोनों को अपने दायित्वों का निर्वाह निष्ठा एवं ईमानदारी के साथ करना चाहिए। कार्यपालिका एवं विधायिका को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह आम जनता के खून-पसीने की कमाई तथा करों द्वारा प्राप्त राजस्व से ही अपने वेतन भत्ते तथा वाहन, आवास सहित अन्य व्यय करती हैं तो जनता के प्रति दोनों को जवाबदेह होना चाहिए। वर्तमान समय में विधायिका धन बल के आधार पर मताधिकार प्राप्त करती है तो कार्यपालिका में भी बिना किसी सुविधा शुल्क के छोटी हो या बड़ी सरकारी नौकरी नहीं मिलती यही कारण है कि जन प्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद जनता से कट जाते हैं और कार्यपालिका बिना सुविधा शुल्क के कोई काम नहीं करती। ऐसा 80 के दशक के बाद से होता आया है लेकिन उस समय दाल में नमक खाया जाता था अब तो नम्बर दो के कार्यों का प्रतिशत 80 के पार हो गया है केवल 15-20 प्रतिशत ही कार्य ईमानदारी से होते हैं उनमें भी एक कहावत लागू होती है कि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है। फिलहाल देश के हालात अच्छे नहीं हैं और देश की जनता को अपने द्वारा ही चयनित सरकार से अब राष्ट्र और समाजहित में कुछ अच्छा करने की उम्मीद नहीं रह गयी है। नेता नाकारा और कार्यपालिका भ्रष्टाचार के गर्त में डूब रही है इसे संभालने की आवश्यकता है।
केन्द्र में जब से एक दल विशेष की कहें या एक व्यक्ति विशेष की सरकार आयी है तब से जो भी निर्णय लिए जा रहे, कठोर ही कठोर हैं कोई भी ऐसा कार्य नहीं हुआ जिसकी आम जनता ने मुक्त कण्ठ से सराहना की हो। वैसे तो विपक्ष का काम ही सत्ता पक्ष की आलोचना करना होता है लेकिन 2014 के बाद यह पहली सरकार है जिससे देश की जनता एवं विपक्ष दोनों ही परेशान हैं। व्यापारी हो या किसान दोनों ही देश की अर्थव्यवस्था, खाद्यान्न व्यवस्था एवं सुरक्षा की रीढ़ होते हैं लेकिन इन छः वर्षों में जनता के ऊपर करों की भरमार हुई। कच्चा तेल भले ही सस्ता हो गया हो लेकिन जनता को डीजल पेट्रोल सस्ता नहीं मिला।
पूरे देश में दो चार घरानों को छोड़कर शेष सभी वर्ग परेशान हैं और सर्वाधिक प्रभावित देश का किसान है जिसकी आज तक किसी सरकार ने नहीं सुनी। ऐसे समय में जब सरकार के कार्य न्यायपालिका को करने पड़ रहे हों और संवैधानिक पदों पर बैठे राष्ट्रपति एवं राज्यपाल जैसे व्यक्ति सत्ताधारी दल को इशारे पर कार्य करते हों, न्यायपालिका सकार के अनुकूल निर्णय देती हो और मीडिया वही दिखाती और लिखती है जिसमें सरकार की सहमति होती है तो ऐसे समय में देश को संकट से कैसे उबारा जाये। निर्वाचन आयोग हो या मानव अधिकार आयोग, सीबीआई हो या ईडी जैसी संस्थायें जब सत्ताधारी दल के इशारे पर काम करेंगी तो देश और देश की जनता का दर्द कौन सुनेगा?

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