हरिद्वार। गीता मनीषी महामण्डलेश्वर स्वामी विज्ञानानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा है कि गीता मानवतावादी ग्रन्थ है जिसमें किसी जाति, धर्म अथवा सम्प्रदाय के अलगाव का वर्णन नहीं है। गीता एक एकमात्र ऐसा पावन ग्रन्थ है जिसमें सम्पूर्ण मानवता के लिए नरः एवं मानवः शब्द का प्रयोग कर वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश दिया है यही कारण है कि सनातन धर्म के अन्य ग्रन्थों की तुलना में गीता का विश्व की सर्वाधिक भाषाओं में अनुवाद हुआ है। वे आज दक्षनगरी के विष्णु गार्डन स्थित श्रीगीता विज्ञान आश्रम में फाल्गुन मास की अमावस्या पर पधारे भक्तों को गीता के उपदेशों का रसपान करवा रहे थे।
मानव जीवन में गीता की ग्राह्यता का वास्ता देते हुए उन्हांेने कहा कि गीता भगवान श्रीकृष्ण की वाणी है जिसका अन्य मानव रचित ग्रन्थों की तुलना में अलग स्थान है गीता ही एकमात्र ऐसा सर्वमान्य गन्थ है जिसकी किसी भी धर्म के अनुयायी द्वारा आलोचना नहीं की जाती है। गीता के ज्ञान को मानव जीवन के लिए उपयोगी बताते हुए वयोवृद्ध संत ने कहा कि सभी धर्मग्रन्थों में व्यवहारिक ज्ञान की पूर्णता नहीं मिलती लेकिन गीता के उपदेशों में भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में जो ज्ञान अर्जुन को दिया और मानवता के सम्मान के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की जो प्रेरणा मिलती है आज उसी गीता ज्ञान की समाज को आवश्यकता है ताकि नैतिक पतन की ओर जा रहे समाज में मानवता के आदर्शों का सूत्रपात हो। आपसी सौहार्द एवं राष्ट्रीय एकता की मजबूती के प्रतीक पर्व होली को सौहार्दपूर्वक मनाने का आवाह्न करते हुए उन्हांेने कहा कि धार्मिक पर्वों से राष्ट्रीयता की भावना और मजबूत होती है।
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