हरिद्वार। गीता ज्ञान के मर्मज्ञ महामण्डलेश्वर स्वामी विज्ञानानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा है कि युग और सत्ता के परिवर्तन से सृष्टि चक्र का संचालन होता है और धराधाम पर जब अत्याचार एवं अनाचार की वृद्धि होती है तब संत-महापुरुष युग परिवर्तन का शंघनाद करते हैं। भगवत सत्ता ही ब्रह्माण्ड की अदृश्य शक्ति है जो कर्म तथा आचरण के अनुरुप जीवधारी के जीवन का निर्माण करती है वे आज श्रीगीता विज्ञान आश्रम में स्वामी विज्ञानानंद वेद विद्यालय के वेदपाठी ब्राह्मणों को गीता ज्ञान की दीक्षा दे रहे थे।
युग की परिवर्तनशीलता पर व्याख्यान देते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक कलियुग के बाद सतयुग आता है अर्थयुग की अवनति के बाद धर्म युग का शुभारम्भ होता है। सृष्टि के रचयिता एवं पालनहार को ही सर्वोपरि बताते हुए उन्हांेने वास्तविक संसार के स्वरुप की जानकारी देते हुए बताया कि भगवान ने केवल मानव का निर्माण किया हिन्दू, मुसलमान, सिख, इसाई इत्यादि का वर्गीकरण तो मानव की कल्पना है। भगवान ने पृथ्वी का सृजन किया उसमें हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, रुस या अमेरिका तो मनुष्य की मान्यताओं के प्रतिफल है। वेदान्त का सार समझाते हुए उन्हांेने कहा कि भगवान ने हमें इंसान बनाकर पृथ्वी पर सत्कर्म करने के लिए भेजा है लेकिन युग के प्रभाव के कारण व्यक्ति नैतिक पतन के आगोश में धंसता जा रहा है और मानवता की दुर्दशा के लिए व्यक्ति स्वयं जिम्मेदार है। जिस प्रकार सृष्टि के नियमों का अनुसरण होता था उसी प्रकार प्रत्येक देश तथा संस्था के संचालन का अपना-अपना संविधान होता है उस संविधान और सृष्टि के नियमों का पालन करना प्रत्येक जीवधारी का कर्तव्य होता है और यह नियम प्रकृति की वनस्पति तथा पशु पक्षियों पर भी लागू होते हैं। उन्होंने सभी विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए ऋषि मुनियों के बताये मार्ग पर चलने का आवाह्न किया।
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