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व्यर्थ के मुद्दे में उलझाकर देश का भविष्य बिगाड़ रही भाजपा


वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री के रुप में लायी गई उम्मीददवारी से ही यह आभास हो गया था कि देश की सत्ता का सौदा हो चुका है और उसी सौदागर ने अपने ब्राण्ड के रुप में एक ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री के रुप में प्रस्तुत किया जिसे संसद के किसी भी सदन का सदस्य होने का अवसर कभी प्राप्त नहीं हुआ था यह भी ऐतिहासिक घटना ही थी। जब कोई कम्पनी, फर्म या व्यक्ति विशेष किसी देश का सौदा करे और देश का बुद्धिजीवी, विपक्ष और सामाजिक संस्थाएं तथा संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति तथा संस्थाएं उस व्यक्ति की कठपुतली बनकर कार्य करने लगें तो समझ लेना चाहिए कि देश का भविष्य बनेगा या बिगड़ेगा? ऐसा वही सोच सकते हैं जिनके अन्दर स्वार्थ से ऊपर उठकर देशभक्ति की भावना का संचार हो। देशभक्ति को स्वार्थ के सहारे ही समाप्त किया जा सकता है और यही कारण है कि हमारे देश में स्वार्थियों की संख्या बढ़ने से देशभक्ति की भावना का ह्यस हो रहा है।
जब देश की संवैधानिक संस्थाओं एवं संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के स्वर बदल जायें तो समझो कि संविधान को समाप्त करने की साजिश जोर पकड़ गयी है। संविधान ही व्यवस्था संचालन की धुरी होता है तथा जब तक इस देश में संविधान नहीं था तब तक जंगलराज चलता था जिसे स्वार्थी भाषा में रामराज्य कहते हैं इसका अर्थ होता है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस और ऐसा ही रामराज्य जैसा वातावरण शुरु भी हो गया है। इस देश में आजादी के सात दशकों का इतिहास गवाह है कि 1947 से 2014 तक 67 वर्षों में देश की जनता ने कभी ऐसा अनुभव नहीं किया कि कोई प्रधानमंत्री या सत्तारुढ़ दल अपनी स्वेच्छाचारिता से गुण्डागर्दी के अंदाज में शासन चला रहा हो देश की जनता इन कथित अच्छे दिनों का पहली बार एहसास कर रही है।
बीते दो तीन महीने से देश का जो वातावरण बन रहा है उस पर सत्तापक्ष और विपक्ष को आपस में बैठकर विचार-विमर्श करना चाहिए और देश में धरना तथा प्रदर्शनों से बिगड़ रहे वातावरण को समाप्त करना चाहिए। सत्तापक्ष का यह कहना कि इस विधेयक से किसी देशवासी पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा फिर भी एक बड़ा तबका विरोध पर आमादा हो और देश से विकास का वातावरण समाप्त हो रहा हो फिर उस मुद्दे को समाप्त करना ही सत्तापक्ष का दायित्व बनता है। देश की आजादी के बाद पहली बार इतना गलत वातावरण बना कि आजाद देश की जनता अपनी आजादी को लेकर आन्दोलित हो और सत्तापक्ष अपने निर्णय पर अटल हो इतना ही नहीं, संविधान के संरक्षक महामहिम राष्ट्रपति ने उस निर्णय को ऐतिहासिक करार दिया हो तो उस पर बड़ी बहस की आवश्यकता है लेकिन उस बहस के लिए बनायी गयी संसद में जब सत्तापक्ष का बहुमत हो तो उसका हल कैसे निकले इस पर विचार करने के लिए देश की जनता की चिंता स्वभाविक है।
राजनीति का उद्देश्य ही वोटबैंक होता है और वोटबैंक को साधने के लिए प्रयास करना प्रत्येक राजनैतिक दल का उद्देश्य होता है लेकिन जिस जनता ने अपने प्रतिनिधि चुनकर संसद में भेजे हों उनको अधिकारों की सुरक्षा कौन करेगा? लोकतंत्र में संविधान ही सबको स्वतंत्रता प्रदान करता है उसी को संशोधित कर दिया जाये और एक पक्षीय निर्णय लिए जायें तो दूसरा पक्ष आन्दोलित होता है। आन्दोलनकारियों पर किसी युवक द्वारा सरेआम फायरिंग की जाये और पुलिस उसे तत्काल अपनी अभिरक्षा में ले ले तथा वीडियो वायरल कर दिया जाये तो इसके माध्यम से जो संदेश जाता है वह निश्चित ही सत्तापक्ष पर उंगली उठाने के लिए जनता को और विचलित करने वाला हो सकता है। समय रहते इन आन्दोलनों को समाप्त करना होगा अन्यथा इसके जो भी दूरगामी परिणाम होंगे उनकी भयावहता को भांपना समय की आवश्यकता है।

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