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विरोध की राजनीति से कमजोर होता है देश और समाज

आन्दोलन एवं विरोध की राजनीति को दबाना सरकार का कर्तव्य है लेकिन जब सरकार ही किसी ऐसी नीति को लागू करे जिससे देश की जनता के हक हकूक पर हमला हो रहा हो तो वह सरकार की विफलता का परिचायक होता है और नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में पूरे देश में जनता के जो स्वर उठ रहे हैं वे देश और समाज दोनों के लिए नुकसान दायक हैं। वर्तमान सरकार की कार्यशैली देश में इससे पूर्व कार्यरत रही सरकारों से एकदम विपरीत है और आम नागरिकों का मानना है कि इस सरकार का कोई भी निर्णय तैयारी के साथ नहीं लिया गया बल्कि तानाशाहीपूर्वक जनता पर थोपा गया। पूरे देश में प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री ने जो अपने निर्णय थोपने और उन पर अडिग रहने का जो ऐलान किया वह तर्क संगत नहीं लग रहा। इस निर्णय का न तो देश की जनता एवं विपक्ष ने स्वागत किया और न ही विश्व के अन्य देशों ने।
आन्दोलन और विरोध प्रदर्शन छोटा या बड़ा देश और समाज दोनों के लिए अहितकारी होता है लेकिन सरकार ने अब तक जो निर्णय लिए वह उसकी अपनी विचारधारा पर आधारित माने जा रहे हैं। सरकार के पिछले निर्णय यदि देश के लिए लाभकारी रहे होते तो जनता इस पर भी विश्वास कर लेती लेकिन पिछले निर्णयों से जो हताशा देश के हाथ लगी उससे सरकार के प्रति जनता का विश्वास उठ गया है। विपक्ष हो या देश की जनता अब वर्तमान सरकार के किसी भी निर्णय पर विश्वास करने वाली नहीं है। यही कारण है कि सीएए एवं एनआरसी को लेकर पूरे देश की जनता आन्दोलित है। केन्द्र सरकार भले ही अपनी पीठ अपने आप थपथपा रही हो लेकिन जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं वे भी बेमन से इसे लागू करने की औपचारिकतायें पूर्ण कर रहे हैं। सीएए तथा एनआरसी के समर्थन में जो आन्दोलन चलाये जा रहे हैं उनको पार्टी विशेष से ऊपर उठकर देखा जाये तो देश की जनता उसे बेमतलब का ड्रामा करार दे रही है।
आजादी के सात दशकों में यह पहला ऐसा अवसर प्रतीत हो रहा है कि देश की जनता का अपनी ब्यूरोक्रेसी तथा संवैधानिक संस्थाओं एवं संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के प्रति असहमति बन रही है। हद तो तब हो गयी जब देश की सेना को भी वोट बैंक की राजनीति के रुप में प्रयोग किया जाने लगा और ऐसा पहली बार हुआ कि किसी सेनाध्यक्ष ने कोई राजनैतिक बयान जारी किया हो और उसे सेवानिवृत्ति के पश्चात किसी उच्च पद से नवाजा गया हो जिसका कोई औचित्य नहीं है।
सृष्टि के रचनाकाल से अब तक का इतिहास रहा है कि तानाशाही से अब तक न तो किसी राजा का राज चला न ही किसी दल की सरकार। सरकार किसी भी दल की हो लेकिन उसका संचालन संविधान के अनुरुप हो तो किसी को कोई परेशानी नहीं होती है और जब आम जनता को समान दृष्टिकोण से देखा जाये तो आन्दोलन और धरने प्रदर्शन की आवश्यकता ही नहीं होती है। समाज हो या सरकार जब सभी अपने-अपने कर्तव्य का पालन निष्ठा एवं ईमानदारी से करें तो अधिकार प्राप्ति के लिए आन्दोलन की आवश्यकता नहीं होती है। देश से जब तक आन्दोलनों एवं धरना प्रदर्शनों को विराम नहीं मिलेगा तब तक देश उन्नति नहीं कर सकता अब यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह देश का विकास चाहती है या व्यर्थ की धरना प्रदर्शन एवं आन्दोलनों में उलझाकर देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना चाहती है।

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