हरिद्वार। धर्म के नाम पर वोटबैंक की राजनीति करने वाली भाजपा ने सनातन धर्म और संस्कृति का राजनीतिकरण कर भारतीय समाज से संस्कार एवं नैतिकता को पतन के गर्त में धकेल दिया है। भाजपा के इस तुष्टीकरण का ही प्रभाव है कि संतों ने भी धर्म और अध्यात्म से किनारा कर राजनीति की तरफ अपना मुंह मोड़ लिया है। यूपी के मुख्यमंत्री सहित कई केन्द्रीय एवं राज्यों में मंत्री रहने के बाद अब संसद तथा विधानसभाओं में भी भगवा उपस्थिति का समावेश बढ़ने लगा है।
देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी में मुख्यमंत्री जैसी कुर्सी पर एक संत के विराजमान होने, केन्द्रीय मंत्री, सांसद, विधायक और पूर्व केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री जैसे पदों पर संतों की रही धमक ने अब संत समाज को धर्म एवं अध्यात्म से हटाकर राजनीति की तरफ मोड़ दिया है परिणामतः हरिद्वार के कई आश्रम अब पूर्ण रुपेण अघोषित रुप से राजनीति के अखाड़े बन गए हैं यहां या तो अब धार्मिक कार्यक्रम होते नहीं और होते हैं तो उन पर राजनेताओं का ही वर्चस्व रहता है किसी संत, शंकराचार्य या बड़ी धार्मिक संस्था का प्रतिनिधित्व शून्य ही रहता है। स्वामी रामदेव तथा श्री श्री रविशंकर के व्यापार में कूदने तथा कई दर्जन संतों द्वारा शिक्षा एवं चिकित्सा का किया गया व्यवसायीकरण यह सिद्ध कर रहा है कि अब संत समाज का ही विश्वास धर्म और संस्कृति से हटकर राजनीति और व्यापार की तरफ चला गया है।
2019 में प्रयाग में सम्पन्न हुए अर्द्धकुम्भ मेलोें का राजनीतिकरण करते हुए यूपी तथा केन्द्र की भाजपा सरकार ने उस अर्द्धकुम्भ को पहले कुम्भ और बाद में महाकुम्भ के नाम से प्रचारित कर बहुत बड़ी धनराशि व्यय की।
जितना धन प्रयाग के अर्द्धकुम्भ मेले के आयोजन पर व्यय किया गया उससे राज्य और राज्य के कृषकों की माली हालत में बड़ा इजाफा किया जा सकता था लेकिन इतनी बड़ी धनराशि व्यय होने के बाद कितने स्थायी विकास कार्य हुए प्रयाग गवाह है। जहां तक संतों की सम्पन्नता एवं लोकप्रियता का सवाल है तो हरिद्वार पूरे देश में संतों की सम्पन्नता के लिए पहले पायदान पर हैं। यहां लगभग सभी अखाड़ों के पास अपार धन सम्पदा, सम्पत्तियां तथा भूमि थीं जो इन्होंने काम्पलेक्स तथा होटल इत्यादि बनवाकर अघोषित रुप से कालोनाइजर्स को बेच दिए हैं इन धार्मिक सम्पत्तियों पर जिन पूंजीपतियों का कब्जा है उनमें अधिकांश सत्तारुढ़ दल से जुड़े हैं। इन राजनेताओं के सानिध्य में आने के बाद सनातन धर्मगुरुओं ने अपने आपको इतना बदल लिया है कि अधिकांश आश्रम या अखाड़े में होने वाले धार्मिक कार्यक्रमों में राजनेताओं का ही वर्चस्व रहता है। इसी पांच जनवरी 2020 को हरिद्वार के प्राचीन अवधूत मण्डल आश्रम में सम्पन्न हुए ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामी हंस प्रकाश के सातवें निर्वाण दिवस समारोह में राज्य के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष से लेकर पूरे कार्यक्रम में सत्तारुढ़ दल का पूरा दबदबा रहा। इतना ही नहीं महामहिम राज्यपाल ने एक विवादास्पद संत के आश्रम में जाकर पूजा-अर्चना की। जो संत समाज का मार्गदर्शन करते थे वे ही और संस्कृति की सबसे बड़ी हानि है।

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