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आम बजट से होगा साफः भाजपा विकास चाहती है या विनाश!

भारतीय संविधान के अनुसार केन्द्र सरकार देश की व्यवस्था चलाने के लिए एक बजट तैयार करती है जिससे आय एवं व्यय का ब्यौरा तैयार किया जाता है कि सरकार चलाने के लिए आय के स्रोत क्या होंगे और उनका व्यय किन.किन मदों में कितना.कितना किया जायेगा। इस बजट की तैयारी देश के वर्तमान हालात के अनुरुप की जाती है कि किस मद में धन के व्यय का प्राविधान किया जाये कि बेरोजगारी एवं महंगाई से निजात पाकर राष्ट्र को प्रगति के पथ पर अग्रसर किया जायेए इसकी तैयारी आजकल चल रही है आगामी माह के अन्त तक आम बजट प्रस्तुत कर दिया जायेगा। बजट से ही देश की जनता अपनी चयनित सरकार की नीति और नियति का अंदाजा लगाती है।
भारत कृषि प्रधान देश था और आज भी देश की साठ प्रतिशत जनता सीधे कृषि से और 20 प्रतिशत आबादी अपरोक्ष रुप से आज भी कृषि पर आधारित है। शुगर मिल हों या राइस मिलए रासायनिक खाद के कारखाने हों या ट्रैक्टर अथवा अन्य कृषि यंत्र बनाने वाले उद्योग सभी कृषि पर आधारित हैं और कृषि उत्पादों की उपयोगिता पर प्रकाश डाला जाये तो देश की 100 प्रतिशत आबादी किसानों द्वारा उत्पादित खाद्यान्न पदार्थ अनाजए सब्जीए फल और दूध पर ही आधारित है। जिस कृषि और कृषक का राष्ट्र तथा समाज के निर्माण में इतना बड़ा योगदान हो उसके लिए बजट में विशेष स्थान न मिलना ही देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य माना जाता है। इतना ही नहीं जहां तक देश की सुरक्षा का सवाल है तो हमारी सेनाओं में जो वीर सैनिक राष्ट्र रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान दे रहे हैं वे सभी कृषकों की ही संतान हैं जिस देश की आधे से अधिक आबादी कृषि क्षेत्र से जुड़ी हो और कृषि ही एकमात्र ऐसा व्यवसाय है जिसके संपुष्ट होते ही देश की 70 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से ऊपर उठ जायेगीए 50 प्रतिशत बेरोजगारी समाप्त हो जायेगी और देश का सकल घरेलू उत्पाद जो वर्तमान में तीन प्रतिशत के निकट है सीधे तौर पर बढ़कर 20.25 प्रतिशत हो जायेगा। ऐसा तभी हो सकता है जब कोई राष्ट्रभक्त व्यक्ति देश का नेतृत्व करेगा और कृषक पृष्ठभूमि से होगा तथा प्रत्यक्ष रुप से कृषि क्षेत्र से उसका संबंध होगा।
केन्द्र सरकार को चाहिए कि किसानों को उसकी उपज का मूल्याकंन कृषि लागत तथा किसान की मजदूरी को मिलाकर करे। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि देश की सत्ता पर अब तक काबिज रही सरकारों ने कृषि उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करते समय कभी भी किसान की मेहनत एवं मजदूरी का मूल्याकंन न कर केवल उसकी लागत बीजए खाद और पानी की कीमत को ही कृषि उपज के मूल्य का आधार मानाए इसीलिए किसान भी बेरोजगार की श्रेणी में गिने जाते हैं। वर्तमान सरकार यदि इस देश का वास्तविक विकास चाहती है तो उसे शहरीकरण और स्मार्ट सिटी या बुलट ट्रेन जैसे मुद्दों को छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों की यातायात व्यवस्था सड़कों की चौड़ाई या आरबन हाट का विकास कर कृषि क्षेत्र को मजबूती प्रदान करनी होगी। सरकार द्वारा वर्तमान में जो योजनायें किसानों के लिए चलायी जा रही हैं वे किसान को गरीबए निरीहए बेचारा और भिखारी समझने वाली प्रतीत हो रही है। किसान को न तो चार माह में दो हजार की खैरात चाहिए न ही एक.दो लाख तक की कर्ज माफी। 
किसान को चाहिए अपनी उपज के लिए विपणन की उचित व्यवस्थाए उपज के मूल्य के साथ अपनी मजदूरीए जिसकी व्यवस्था सरकार सीधे स्तर पर करे कोई भी एजेंसी या बिचौलिया ही इस योजना को असफल बनाने की कड़ी है क्योंकि सरकार यदि उद्योगों के उत्पादों की आनलाइन बिक्री करवा सकती है तो किसान की उपज को आनलाइन क्यों नहीं खरीदती। विडम्बना यह है कि सरकार कृषि उपज को खरीदती है बिचौलिए के माध्यम से और बिक्री करती है फेयर प्राइज शाप के माध्यम से। सब्सिडी देनी चाहिए आयातित वस्तुओं पर लेकिन हमारी सरकार दो रुपये किलो गेंहू और तीन रुपये किलो चावल बेचकर किसानों का मनोबल तोड़ रही और कृषि उत्पाद का अपमान कर रही हैए सरकार बजट जारी करने से पूर्व कृषि एवं कृषकों के लिए सोचे। 

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