देश की सरकार हो या राज्य की जो भी कानून बनाती है उसके सभी पहलुओं पर विचार करने के लिए ही पक्ष और विपक्ष में बहस का प्राविधान हमारे संविधान में किया गया है। हमारे देश में आजादी के बाद एक दर्जन से भी अधिक ऐसी सरकारें बनी जिन्होंने संविधान का सम्मान किया और बिना विपक्षी राय के किसी भी कानून को लागू नहीं किया लेकिन हमारे देश में दो नेता ऐसे भी पैदा हुए जिन्होंने बड़ी कुर्सी पर बैठने के बाद स्वयं से बड़ा किसी को नहीं समझा और जो भी निर्णय लिए वे स्वेच्छाचारिता पूर्ण थे, उन निर्णयों से देश को काफी क्षति हुई। उन नेताओं में पहली थीं इन्दिरा गांधी और दूसरे हैं नरेन्द्र मोदी। इन्दिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल लगाया था तो नरेन्द्र मोदी ने बने बनाये भारत को उस कंगाली और बर्बादी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया जो देश को 2014 से पूर्व वाली स्थिति में लाने में दो दशक का समय लगेगा वह भी तब जब किसी राष्ट्रहित सोचने वाले और संविधान का सम्मान करने वाले की सत्ता आये।
केन्द्र सरकार ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष की जनता को सोचना चाहिए कि एक प्रदेश के दो आदमी मिलकर पूरे देश की 130 करोड़ जनता पर अपने निर्णय कैसे थोप सकते हैं और अब तक देश की जनता पर जो निर्णय थोपे गए उनके दुष्परिणाम क्या रहे यह बात देश के अर्थशास्त्री, पत्रकार, कवि और विपक्ष को अब अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर रखनी चाहिए क्योंकि भारत के संविधान को समाप्त करने के लिए ही संवैधानिक पदों की गरिमा समाप्त की गई है। मीडिया और विपक्ष को समाप्त कर दिया गया है तथा विपक्ष को डरपोक और मीडिया को बिकाऊ माल घोषित कर दिया गया है।
आजादी के बाद यह पहला अवसर है कि हमारी केन्द्र सरकार एक ऐसे संगठन एवं व्यापारिक परिवार के इशारे पर कार्य कर रही है जो 130 करोड़ जनता को ठग कर केवल अपना हित सोच रहे है। हमारे देश में आजादी के पूर्व से जन्म ले चुकी एक ऐसी संस्था जो अंग्रेजी हुकूमत की हिमायती रही और आज भी देश के संविधान को समाप्त कर अपने स्वार्थ का एजेण्डा देश पर थोपना चाहती है। विदित हो इस संस्था का न तो स्वयं में कोई संविधान है न ही किसी संवैधानिक नियम के तहत पंजीकृत है। संघ हो या युवा वाहिनी सभी के अपने-अपने गुप्त और मौखिक एजेंडे हैं, जिसका कोई संविधान या नियमावली नहीं उसे कोई सरकार प्रतिबन्धित भी कैसे करे या न्यायालय उसकी किस नियम के तहत जवाबदेही तलब करे।
कुल मिलाकर वर्तमान सरकार का कोई भी एजेण्डा जनहित का नहीं रहा, नोटबंदी हो या जीएसटी, नीति आयोग का गठन हो या ईवीएम का करिश्मा, सेना तथा संवैधानिक संस्थाओं का राजनीतिकरण हो या अब एनआरसी या सीएए सभी देश का धन बर्बाद करने के अलावा किसी भी प्रकार से राष्ट्र और समाजहित के नहीं हो सकते। अब देश की स्वतंत्रता और संविधान को बचाने के लिए देश की जनता को नए सिरे से सोचना होगा।
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