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भटकाव से आजिज आयी भारत की जनता को अब चाहिए विकास

भारत माता ने भाजपा सरकार के छः साल के कार्यकाल में बड़े कटु अनुभव किए हैं और अब जनता का धैर्य जवाब दे रहा है अब तक जो हुआ वह जनता ने बड़ी खुशी-खुशी, बड़ी -बड़ी उम्मीदों के साथ झेला। जनता ने जो किया उसका फल उसे मिला। यह प्रकृति का नियम है कि जैसा करोगे वैसा भरोगे। जनता को अच्छे दिनों की चाहत थी यह उसकी अति महत्वाकांक्षा थी क्योंकि जबसे इक्कीसवीं सदी का आगाज हुआ तभी से जनता के अच्छे दिन शुरु हो गए थे और 2013-14 में पूरे देश की जनता अच्छे दिनों में ही जी रही थी लेकिन लालच बुरी बला होती है देश की जनता को और अच्छे दिन चाहिए थे सो देख लिए।
देश की जनता के लालची होने का ही प्रमाण है कि 15-15 लाख रुपये के लालच में आकर आज देश का कितना बड़ा नुकसान हुआ इस बात का एहसास देश की जनता को करना चाहिए कि उसके लालच ने आज देश को 15 साल पीछे धकेल दिया है। देश की जनता अपने किए का परिणाम भुगत चुकी है अब केन्द्र सरकार से भारत माता की सेवा करने की आस रख रही है। अब केवल भारत माता की जय बोलने से काम चलने वाला नहीं है और न ही पाकिस्तान को थर-थर कंपवाने से भारत का विकास होगा। कश्मीर से धारा 370 हट जाने के बाद न तो कोई कश्मीरी पंडित कश्मीर में बसने जायेगा न ही कश्मीर के मुसलमान पाकिस्तान जाने वाले हैं। जम्मू-कश्मीर के दो टुकड़े करने से भी न तो कश्मीर के लोगों का भला हुआ न ही भारत में कोई प्रगति का सूत्रपात हुआ। जहां तक पटेल की मूर्ति में इतनी बड़ी धनराशि व्यय करने का सवाल है तो यह सब देश के धन की बर्बादी का ही पर्याय है। अब यदि राम मंदिर बन जाता है तो भी न तो देश का भला होगा न ही धर्म का। देश आज अर्थव्यवस्था की मजबूती और अपने सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि चाहता है। देश से अनावश्यक मुद्दों को बन्द कर विकास योजनायें लागू की जाये और बंदी के कगार पर चल रहे उद्योगों को संजीवनी देकर उनको चालू रखा जाये तथा आम जनता को स्वरोजगार से जोड़ा जाये।
संवैधानिक व्यवस्था ही लोकतांत्रिक देश की मजबूती का आधार है और जब तक देश में संविधान नहीं था तब तक देश और समाज को कई बड़े-बड़े युद्धों का दंश झेलना पड़ा। कोई भी युद्ध या आन्दोलन विकास में बाधक होते हैं। जब कोई सरकार संविधान का सम्मान न कर मनमानी व्यवस्था लागू करती है तो देश और समाज दोनों का विकास रुक जाता है। जब किसी धर्म या समाज के लोगों को अपने अधिकारों के लिए आन्दोलन करना पड़ता है तो उनके कर्तव्यों का ट्ठास होता है और अधिसंख्य जनता अपने अधिकारों को संरक्षित करने के लिए आन्दोलन का रास्ता अपनाती है जिससे न केवल विकास बाधित होता है बल्कि देश की सम्पत्ति का भी नुकसान होता है। इन सब झंझावतों को रोकना ही सरकार का कर्तव्य होता है। आज भारत माता शांति एवं सौहार्द का वातावरण चाहती है। केन्द्र सरकार तथा राज्यों की चयनित सरकारों को चाहिए कि आपसी तारतम्य बनाकर आन्दोलनों को रोके तथा विकास एवं राष्ट्रहित के मुद्दों पर कार्य करे। हमारे संविधान ने अनेकों संवैधानिक पद तथा संवैधानिक संस्थाओं का प्राविधान है लेकिन जनता यह एहसास कर रही है कि हमारी संवैधानिक संस्थायें अपने कर्तव्यों का पालन संविधान के अनुरुप न कर सत्तारुढ़ दल के हाथों की कठपुतली बनती जा रही हैं इस व्यवस्था में तत्काल परिवर्तन की आवश्यकता है।

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