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नए साल में लोक कल्याणकारी योजनाओं का आगाज करे केन्द्र सरकार

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक का यह अन्तिम वर्ष है और 2020 में दोनों ही अंक 20-20 हैं जो 20 के साथ 19 का अंक था वह बीत गया। केन्द्र सरकार को चाहिए कि वह 19 और 20 की कार्यशैली को अंक की गरिमा के अनुकूल बनाये तथा 2020-21 के बजट में ऐसा प्राविधान करे कि देश की जनता उसके पिछले कार्यकलापों जिनकी देश की अधिसंख्य जनता तथा विपक्षी दलों ने आलोचना की को भुलाकर इस वर्ष को लोक कल्याणकारी निर्णयों के लिए याद करे। केन्द्र सरकार अपने छः साल के कार्यों और लागू किए गए निर्णयों पर आत्म मंथन कर 1975 में लागू किए गए आपातकाल से तुलना कर यदि उसे देश के लिए अपना कोई निर्णय देश की आम जनता के पक्ष में अहितकारी लगे तो उसे रोक दे अन्यथा देश की जो वर्तमान स्थिति है उससे न तो देश की जनता ही खुश है और विश्व।
किसी भी लोकतांत्रिक देश की सरकार किसी दल या धर्म विशेष की न होकर सम्पूर्ण देशवासियों की सरकार होती है और उसके चयन में भले ही देश की 30 प्रतिशत या उसके समकक्ष आबादी का योगदान ही रहा हो लेकिन सरकार के संचालन में देश की सम्पूर्ण आबादी द्वारा करों के रुप में दिए गए आर्थिक सहयोग का योगदान होता है और देश में रहने वाला प्रत्येक नागरिक सरकार से जवाबदेही करने का अधिकार रखता है। देश की जनता पर ऐसा कोई भी निर्णय नहीं थोपा जा सकता जिससे देश और समाज का अहित हो अथवा धर्म, जाति या सम्प्रदाय के किसी भी वर्ग द्वारा उसे अमान्य घोषित कर दिया गया हो।
देश की वर्तमान स्थिति क्या है और इस सरकार के सत्ता में आने से पूर्व देश की स्थिति क्या थी हमारे देश के अर्थशास्त्री, सामाजिक विश्लेषक और विशेष रुप से उन पत्रकारों को देश की जनता के समक्ष रखना चाहिए जो अपने कर्तव्यों को भुलाकर गिरगिट की तरह रंग बदलकर स्वार्थ की दुनिया में रम गए हैं। क्या स्वार्थ के सामने राष्ट्रहित बौना हो जाता है? यदि ऐसा हो रहा तो धिक्कार है ऐसे योजनाकारों और राष्ट्रहित के विपरीत लिए गए निर्णयों पर सहमति व्यक्त करने वाले राजनेताओं, ब्यूरोक्रेट्स, मीडिया तथा अर्थशास्त्री एवं योजनाकारों पर। 2014 में सरकार बनने के बाद एक डेढ़ साल तक केन्द्रीय स्तर पर सरकार ने क्या-क्या योजनायें बनायी? उनका उद्देश्य क्या था और परिणति कैसी रही क्या इस पर मंथन नहीं होना चाहिए? फिलहाल जो बीत गया उस पर ज्यादा माथा पच्ची करने की जरुरत नहीं बल्कि आज आवश्यकता है कि केन्द्र सरकार ऐसी योजनायें बनाये जो सभी राज्य सरकारों को मान्य हों। यदि केन्द्र सरकार जनमत से चयनित हुई है तो राज्य सरकारे और स्थानीय निकाय भी उसी देश की जनता ने चुने हैं फिलहाल देश और देश का संविधान सर्वोपरि है। देश और संविधान की रक्षा सभी का उद्देश्य होना चाहिए संविधान बदलने से न तो देश का भला होगा न ही देश की जनता का। यदि विचार ही करना है तो इस संविधान के निर्माण से पूर्व की व्यवस्था पर गौर फरमायें कि अंग्रेजों के निर्णय कैसे होते थे अंग्रेजों के पहले जो शासन प्रणाली थी वह कैसी थी और त्रेता तथा द्वापर में जो बड़े-बड़े युद्ध हुए उनका एकमात्र यही कारण था कि उस समय कोई संविधान नहीं था जिसके हाथ में लाठी होती थी वही भैस ले जाता था वैसी स्थिति न आने दें।

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