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सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाने के लिए पहल करें संवैधानिक संस्थाएं

समाज और राष्ट्र का कल्याण करना सरकार का कर्तव्य होता है लेकिन जब कोई राजनैतिक दल अपने वोट बैंक रुपी स्वार्थ को पूर्ण करने की नियति से जब कोई नीति लागू करता है तो देश और समाज दोनों का वातावरण बिगड़ता है जो राष्ट्र की क्षति है। लोकतंत्र में सभी जाति एवं धर्म के लोगों के अधिकार समान होते हैं और सरकार का दायित्व होता है कि वह सर्व समाज के हितों का ध्यान रखते हुए निर्णय करे। जब सरकार के किसी निर्णय से धर्म या जाति सम्प्रदाय या वर्ग विशेष के अधिकारों का हनन होता है या उसकी आशंका होती है तो देश का साम्प्रदायिक सौहार्द बिगड़ना स्वाभाविक हो जाता है। हमारी वर्तमान केन्द्र सरकार द्वारा अपने पहले एवं दूसरे कार्यकाल में जो भी निर्णय लिए गए उनसे न तो राष्ट्र की उन्नति हुई और न ही समाज के किसी वर्ग का भला बल्कि सरकार गठन से पूर्व वर्तमान सत्तारुढ़ दल ने जो वादे किए थे उसके विपरीत कार्य किया ऐसी कथनी और करनी में अंतर वाली यह पहली भारत सरकार है जिसकी देश के अन्दर और बाहर सर्वत्र आलोचना हो रही है।
केन्द्र सरकार द्वारा लाया गया नागरिकता संशोधन विधेयक आज पूरे भारत में चर्चा का विषय बना हुआ है, पूरे देश में आजकल धरना प्रदर्शन ही नहीं बल्कि हिंसक घटनायें भी हो रही है और राष्ट्रीय सम्पत्ति को क्षति पहुंचाने की घटनाओं का सिलसिला जारी है। पूर्वोत्तर में असम और बंगाल के बाद उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी तथा दिल्ली की जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं ने आन्दोलन का जो मार्ग चुना उससे पूरे देश का माहौल बिगड़ गया है। हालांकि इस कानून को लागू करने की देश में कोई आवश्यकता नहीं थी लेकिन यह पार्टी ऐसी है जो अपनी सत्ता संचालन की नाकामियों को छुपाने के लिए देश की जनता का ध्यान बंटाती रहती है नागरिकता संशोधन विधेयक भी इसी कड़ी का एक पहलू है जिसमें अब अन्य विपक्षी दल भी शिरकत करने लगे हैं तथा मुस्लिम भाइयों का यह पहला आन्दोलन है जिसमें हिन्दू समाज का उन्हें सहयोग प्राप्त हो रहा है।
विपक्षी दलों का कहना है कि भाजपा देश की अधिसंख्य जनता को अपने पक्ष में करने के लिए अक्सर धर्म आधारित राजनीति कर अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक करती रहती है और जब मामला ऐसे ही शान्त नहीं होता या पूरा विपक्ष एकजुट होकर भाजपा के विरोध में लामबन्द हो जाता है तो पुलवामा जैसी घटनाओं को अंजाम देना भी यह पार्टी अच्छी तरह जानती है। सत्तासीन कोई भी दल हो सकता है यहां लोकतंत्र है और देश की सेवा करने का सभी को बराबर का अधिकार है सो देश की जनता ने साठ साल तक विपक्ष में रही पार्टी को एक बार फिर राष्ट्रसेवा का अवसर प्रदान किया लेकिन अब स्थिति इतनी भयानक होती जा रही है कि देश के दो गुजराती नेता पूरे देश की राजनीति पर इतने भारी पड़ते जा रहे हैं जितनी भारी कभी इन्दिरा गांधी पड़ी थीं। इन्दिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाने से लेकर अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर अपनी अलग कांग्रेस आई का गठन का लिया था लेकिन यहां तो लोकतांत्रिक व्यवस्था है इसलिए इन्दिरा गांधी का दौर भी समाप्त हो गया और जिस राज्य से देश और दिल्ली की सरकारें चलती थीं वहां से पूरा सफाया हो गया। इन्दिरा गांधी का वह कारनामा उनकी दूसरी पीढ़ी पर भी भारी पड़ा और जहां तक तानाशाही पूर्ण तरीके से सत्ता का संचालन करने की बात है तो पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुर्शरफ को वहां के न्यायालय ने क्या निर्णय सुनाया है किसी से छुपा नहीं है। फिलहाल सरकार की नियति जो भी हो लेकिन देश और समाज हित में बिना किसी इफ या वट के केन्द्र सरकार, महामहिम राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय तथा मानव अधिकार आयोग को भी इस पर संज्ञान लेना चाहिए।

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