हरिद्वार। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के प्रदेश संयोजक रामनरेश यादव ने कहा है कि देश की जनता का विकास कार्यों से ध्यान हटाकर विवादास्पद मुद्दों में उलझाना भाजपा की नियति बनी गयी है जिसमें राम मंदिर, कश्मीर के बाद अब असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल की जनता को आन्दोलन के लिए उतारकर देश का वातावरण बिगाड़ दिया है। केन्द्र की सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार ने अब तक जो नीतियां लागू की उससे देश का विकास रुक गया, अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गयी और बेरोजगारी बढ़ी है। देश की जनता के खून-पसीने से अर्जित धन नेता एवं ब्यूरोक्रेट्स अपनी सुख-सुविधाओं पर खर्च कर रहे हैं और भय का वातावरण बनाकर संविधान के विपरीत तानाशाहीपूर्ण तरीका अपनाकर देश का धन और समय दोनों बर्बाद किए जा रहे हैं। जो धन विकास योजनाओं पर व्यय होना था वह चुनावी प्रचार, जन प्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त एवं मूर्तियां इत्यादि लगाकर बर्बाद किया जा रहा है जिसे समय रहते रोकने की आवश्यकता है अन्यथा देश 70 साल पहले वाली स्थिति में आ जायेगा इसके लिए सत्ता पक्ष विपक्ष और देश की जनता को राष्ट्रहित के लिए कार्य करना होगा।
उत्तराखण्ड प्रसपा की ओर से प्रेस को जारी एक बयान में रामनरेश यादव ने कहा है कि संवैधानिक संस्थाओं एवं संवैधनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों का सत्तापक्ष की कठपुतली बनकर कार्य करना देश के संविधान का अपमान है और यह परम्परा भाजपा के केन्द्र में सत्तारुढ़ होते ही बढ़ना प्रारम्भ हो गयी थी। भाजपा की कथनी और करनी में जमीन और आसमान का अंतर है वह जो कहती है उसका उलटा करती है देश की जनता के सामने सत्ता में आने से पूर्व जो मुद्दे भाजपा ने रखे थे जनता ने उस पर विश्वास कर भाजपा को सत्ता सौंपी लेकिन सत्तासीन होते ही भाजपा का असली चेहरा देश की जनता के सामने आ गया जिसके लिए अब जनता को स्वयं सोचना और अपनी गलती पर पुनर्विचार करना होगा। भारत लोकतांत्रिक देश है तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था का संचालन संविधान से होता है न कि तानाशाही या मनुवाद से। यह सत्य है कि देश की आजादी से अब तक देश की सत्ता पर उन्हीं लोगों का अधिकार रहा जिन्होंने अपनी संख्या कम होते हुए भारत की अधिसंख्य जनता को शिक्षा और सामाजिक न्याय से दूर रखा और जो लोग उनका वोट बैंक बने उनकी नादानी और अशिक्षा इसके लिए जिम्मेदार है।
देश में शिक्षा एवं चिकित्सा का व्यवसायीकरण कर पहले से ही व्यवस्था को बिगाड़ने का कार्य किया जा चुका है और यह सत्य है कि सरकारी स्कूल देश में बेरोजगारी के कारखाने के रुप में अपनी पहचान बना चुके हैं। यह भी सत्य है कि जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं वे निजी संस्थानों में नौकरी करते हैं और जो निजी क्षेत्र के विद्यालयों से शिक्षा ग्रहण करते हैं वे सरकार तथा सरकारी तंत्र का संचालन करते हैं इसीलिए सरकारी शिक्षा सस्ती और निजी शिक्षण संस्थानों की शिक्षा महंगी होती है, किसी भी सरकार ने अभी तक इस अंतर को समाप्त करने की नहीं सोची। यह भी सत्य है कि मन चंचल होता है इसीलिए देश की जनता को ‘मन की बात’ के माध्यम से दिल और दिमाग से पैदल कर दिया गया जिससे जनता के सोचने और समझने की शक्ति समाप्त हो गयी। मन की तरंगों को मार कर यदि देश की जनता दिल और दिमाग से सोचती तो उसे ज्ञान होता कि नोटबंदी का देश पर क्या दुष्प्रभाव हुआ, जीएसटी का क्या परिणाम रहा। पुलवामा का उद्देश्य क्या था, कश्मीर समस्या से देश का क्या भला हुआ या राम मंदिर निर्माण से कौन-कौन लोग लाभान्वित होंगे, स. पटेल की इतनी महंगी मूर्ति देश की जनता को क्या संदेश देगी अथवा नागरिकता संशोधन कानून लागू होने से देश का विकास होगा या विनाश। देश के संविधान को दरकिनार कर गृहयुद्ध का जो वातावरण तैयार किया जा रहा है उसके परिणामों की भयावहता को भांपना होगा अन्यथा किसी असंवैधानिक एवं अपंजीकृत संस्था के भरोसे रहना देश की भावी पीढ़ी का भविष्य बिगाड़ने के अलावा और कुछ नहीं होगा।
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