हैदराबाद पुलिस द्वारा चार बलात्कारियों के किए गए एनकाउन्टर पर पूरे देश से मिली जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। अधिकांश जनता तो पुलिस के कार्य की सराहना कर रही है कि उसने उन बलात्कारी दरिन्दों को उसी स्थान पर ले जाकर मारा जिस स्थान पर चारों ने एक महिला की अस्मत लूटने के बाद उसे जलाकर मार दिया था और पुलिस ने खून का बदला खून से लेकर बता दिया है कि पुलिस चाहे तो कुछ भी कर सकती है, लेकिन इस घटना पर जो उंगलियां उठ रही है। उस विचारधारा पर गौर फरमाना भी संविधान का सम्मान करने के लिहाज से लाजिमी है। पुलिस ने भले ही कानून अपने हाथ में लेकर अदम्य साहस का की मिशाल कायम की है जिन लोगों ने जैसा कृत्य किया उसका वैसा ही परिणाम भुगता इसका समाज में जो संदेश जायेगा उससे गलत काम करने वालों में भय का वातावरण बनेगा और कोई भी दुष्कर्मों ऐसे वीभत्स कृत्यों को अंजाम देने से पहले उसके परिणाम पर भी गौर फरमायेगा। तत्कालिक रुप से देखने में यह सब बहुत अच्छा लगा रहा है लेकिन, प्रत्येक इन्काउन्टर की न्यायिक जांच होती है और वह जांच भी न्याय से जुड़े किसी व्यक्ति को ही सौंपी जाती है सो नियमानुसार इस एनकाउन्टर की भी न्यायिक जांच होगी।
यदि संवैधानिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो देश में अब जो भी कुछ हो रहा है अच्छा नहीं हो रहा है पूरा देश और समाज गलतियां करने पर आमादा है संविधान का किसी को न तो भय है और न ही सम्मान। यदि इस समाज में पुलिस का भय होता तो वे दरिन्दे इस वारदात को अंजाम नहीं देते या न्यायिक व्यवस्था इतनी दुरुस्त होती तो पीड़िता को न्याय दिलाने की कमान पुलिस स्वयं न संभालती जांच करती और न्याय का काम न्यायपालिका पर छोड़ती, अब किसी को किसी पर विश्वास भी नहीं रह गया है क्योंकि जब किसी अपराधी पर पुलिस गोली चलती है तो उसे भागने से रोकने के लिए चलाती है और गोलियां पैरों पर या ऐसे स्थान पर मारी जाती है कि उस पर कब्जा किया जा सके लेकिन उन चारों के जो चित्र सोशल मीडिया पर सामने आये है सभी के सीने से खून निकलने के फोटो दर्शाये गए थे। पुलिस ने तो पीड़िता को न्याय दे दिया अब न्यायिक जांच में क्या होगा यह बाद की बात है।
संविधान का सम्मान करना समाज, सरकार और सरकारी मशीनरी के साथ ही समस्त संवैधानिक संस्थाओं एवं संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों का नैतिक दायित्व होता है क्योंकि उन सब ने इसी संवैधानिक की शपथ लेकर जनता के करों से प्राप्त राजस्व से अपनी शाही जीवनशैली का रसास्वादन शुरु किया होता है। हमारे देश में एक ऐसे दल का वर्चस्व बढ़ रहा है जो भारतीय संविधान को समाप्त कर ऐसा शासन चलाना चाहता है जिसे कभी रामराज्य की संज्ञा दी जाती थी क्योंकि उस समय संविधान नहीं था। यदि संविधान होता तो रावण सीता को नहीं ले जाता या संविधान होता तो कौरव-पाण्डवों के साथ तथा उनकी पत्नी के साथ ऐसा ताण्डव नहीं करते जो उन्होंने किया और उसके परिणाम स्वरुप रामायण एवं महाभारत में कैसे वीभत्स युद्धों का आगाज हुआ, क्योंकि उस समय संविधान नहीं था। उस समय मनुवाद था, जिसकी लाठी उसी की भैस होती थी, ‘न्यू लार्डस न्यू लॉज’ होते थे, राजा के वजीर जैसी सलाह देते थे राजा वही घोषणा कर देता था क्योंकि उस समय संविधान नहीं था। यदि संविधान होता तो न तो वे बड़े-बड़े युद्ध होते न ही अत्याचार। अत्याचार, तानाशाही और स्वेच्छाचारिता को समाप्त कर समरसता का वातावरण बनाने के लिए ही संविधान का निर्माण किया गया जो समाज सत्ता और तन्त्र के संचालन का मार्ग प्रशस्त करता है आज उसी संविधान को समाप्त करने की चाल चल रही है। चाहे चुनाव हों, सरकारों का का निमा्रण हो या सरकारी तंत्र एवं संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग इसे रोकना होगा।
यदि संवैधानिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो देश में अब जो भी कुछ हो रहा है अच्छा नहीं हो रहा है पूरा देश और समाज गलतियां करने पर आमादा है संविधान का किसी को न तो भय है और न ही सम्मान। यदि इस समाज में पुलिस का भय होता तो वे दरिन्दे इस वारदात को अंजाम नहीं देते या न्यायिक व्यवस्था इतनी दुरुस्त होती तो पीड़िता को न्याय दिलाने की कमान पुलिस स्वयं न संभालती जांच करती और न्याय का काम न्यायपालिका पर छोड़ती, अब किसी को किसी पर विश्वास भी नहीं रह गया है क्योंकि जब किसी अपराधी पर पुलिस गोली चलती है तो उसे भागने से रोकने के लिए चलाती है और गोलियां पैरों पर या ऐसे स्थान पर मारी जाती है कि उस पर कब्जा किया जा सके लेकिन उन चारों के जो चित्र सोशल मीडिया पर सामने आये है सभी के सीने से खून निकलने के फोटो दर्शाये गए थे। पुलिस ने तो पीड़िता को न्याय दे दिया अब न्यायिक जांच में क्या होगा यह बाद की बात है।
संविधान का सम्मान करना समाज, सरकार और सरकारी मशीनरी के साथ ही समस्त संवैधानिक संस्थाओं एवं संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों का नैतिक दायित्व होता है क्योंकि उन सब ने इसी संवैधानिक की शपथ लेकर जनता के करों से प्राप्त राजस्व से अपनी शाही जीवनशैली का रसास्वादन शुरु किया होता है। हमारे देश में एक ऐसे दल का वर्चस्व बढ़ रहा है जो भारतीय संविधान को समाप्त कर ऐसा शासन चलाना चाहता है जिसे कभी रामराज्य की संज्ञा दी जाती थी क्योंकि उस समय संविधान नहीं था। यदि संविधान होता तो रावण सीता को नहीं ले जाता या संविधान होता तो कौरव-पाण्डवों के साथ तथा उनकी पत्नी के साथ ऐसा ताण्डव नहीं करते जो उन्होंने किया और उसके परिणाम स्वरुप रामायण एवं महाभारत में कैसे वीभत्स युद्धों का आगाज हुआ, क्योंकि उस समय संविधान नहीं था। उस समय मनुवाद था, जिसकी लाठी उसी की भैस होती थी, ‘न्यू लार्डस न्यू लॉज’ होते थे, राजा के वजीर जैसी सलाह देते थे राजा वही घोषणा कर देता था क्योंकि उस समय संविधान नहीं था। यदि संविधान होता तो न तो वे बड़े-बड़े युद्ध होते न ही अत्याचार। अत्याचार, तानाशाही और स्वेच्छाचारिता को समाप्त कर समरसता का वातावरण बनाने के लिए ही संविधान का निर्माण किया गया जो समाज सत्ता और तन्त्र के संचालन का मार्ग प्रशस्त करता है आज उसी संविधान को समाप्त करने की चाल चल रही है। चाहे चुनाव हों, सरकारों का का निमा्रण हो या सरकारी तंत्र एवं संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग इसे रोकना होगा।
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