देश की जनता को वास्तविक मुद्दों से भटकाने के लिए सरकार, राजनेता एवं ब्यूरोक्रेट्स के पास अनेकों मुद्दे होते हैं जिनमें भटकाकर असल मुद्दे से देश की जनता का ध्यान हटाया जा सकता है। भारत की लगभग 70 प्रतिशत जनता आज भी कृषि से जुड़ी है जो गांवों में निवास कर कड़ी मेहनत से अनाज का उत्पादन कर देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाने में सफल रही। भारत में केवल कृषक ही ऐसा स्तम्भ है जो देश की रक्षा, सुरक्षा से लेकर भरण-पोषण में भरपूर योगदान दे रहा है आज उसकी सुनने वाला कोई नहीं है।
हमारी सरकारों ने गन्ना उत्पादन को किसान की मुख्य उपज का हिस्सा बना दिया है जबकि गन्ना मिलों में गन्ने से चीनी एवं अल्कोहल का निर्माण होता है जिससे शराब बनती है जो सरकार को सर्वाधिक राजस्व प्रदान करती है भले ही शराब और चीनी दोनों मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारिक हों लेकिन सरकार को चाहिए राजस्व एवं नेताओं को चुनाव के समय चाहिए शुगर मिलों से चन्दा। शुगर मिलें किसान से गन्ना लेकर एक-एक साल बाद भुगतान करती हैं कुछ भुगतान आंशिक भी होता है जिससे किसान का भरोसा मिलों पर बना रहता है जबकि गन्ने की उधार खरीद से मिलों को भारी मुनाफा मिलता है। किसान को न तो अपनी उपज का मूल्य निर्धारित करने का अधिकार है न ही उसको नकद बेचने का अधिकार इस पर जहां तक सरकार द्वारा कृषि उपज के मूल्य निर्धारण का सवाल है तो कोई एतराज नहीं लेकिन सरकार ने जो दर निर्धारित कर दी उन पर खरीद तो करवाये, ऐसा नहीं हो रहा है जो कृषकों के शोषण की श्रेणी में आता है। कृषि प्रधान देश कहलाने वाले भारत के किसान की क्या दुर्दशा हो रही है उस पर किसी की नजर नहीं है पूरा देश आज बलात्कार, हत्या और इन्काउन्टर में उलझा हुआ है और किसान अपने धान को निर्धारित दर से तीन सौ से पांच सौ रुपये प्रति कुन्तल कम की दर से बेचने को मजबूर है। किसान की उपज धान को आज गीला, कम्पाइन का कटा अथवा अन्य कारण बताकर बारह सौ रुपये से लेकर पन्द्रह सौ रुपये कुन्तल की दर से खरीदा जा रहा है सरकार और सरकारी कर्मचारी जो जनता के करों से प्राप्त राजस्व से ही वेतन आहरित करते हैं किसानों की समस्या से एकदम दूर हैं। धान खरीद सरकार बिचौलियों के माध्यम से करवाती है और ये बिचौलिए सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारियों के साथ मिलकर किसान की उपज से करोड़ों रुपये प्रतिदिन अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं। कहां गया वह लोकतंत्र जिसमें जनता की चुनी हुई सरकार को जनता के लिए काम करने वाली बताया जाता है।
इस आजाद भारत का 60 से 70 प्रतिशत किसान आज सरकारी कर्मचारियों की गुलामी की जिन्दगी जी रहा है किसानों की उपज पर सरेआम डकैती डाली जा रही है, सरकार और राजनेता स्वयं इस सारे खेल को देख रहे हैं लेकिन किसान हित में किसी की जुबान हिलने का नाम नहीं ले रही है भारत के किसान को समय रहते संगठित होना पड़ेगा और जब तक वह राजनैतिक दलों के इशारे पर कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा या अन्य दलों में बंटा रहेगा उसका भला होने वाला नहीं है। आज किसान के बेटों को सरकारी नौकरी नहीं मिल रही है और न ही सरकारी नौकरी प्राप्त करने वाली शिक्षा। नौकरी देने वाली शिक्षा दूसरे स्कूलों में मिलती है और बेरोजगार पैदा करने वाली शिक्षा सरकारी स्कूलों में मिलती है। किसान स्वयं सोचे और शिक्षा का अधिकार प्राप्त कर सरकार और सरकारी तन्त्र का हिस्सा बने।
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