ब्यूरोक्रेसी में जब से भ्रष्टाचार के द्वार खुले हैं तब से विभागीय जांच बदनाम हो गयी है। चूंकि विभागीय जांच में अपने ही अधीनस्थों की जांच दोषी कर्मचारियों का उच्चाधिकारी करता है। हालांकि कानूनी प्रावधान में ऐसा कहा गया है कि कोई भी उच्चाधिकारी अपने अधीनस्थ की जांच नहीं कर सकता लेकिन राजनेता हों या नौकरशाही सभी ने मिलकर बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा निर्मित संविधान को समाप्त करने का मन बना लिया है यही कारण है कि सम्पूर्ण कार्यपालिका भ्रष्टाचार के दलदल में धंसती जा रही है और विभागीय जांच में उच्चाधिकारी अपने अधीनस्थ को क्लीन चिट देकर भ्रष्टाचारियों का मनोबल बढ़ा रहे हैं। कुछ मामले ऐसे अवश्य होते हैं जिनमें विभागी जांच होती है लेकिन जहां तक भ्रष्टाचार या जनहित से जुड़े मामले होते हैं उनमें विभागीय जांच न होकर अपराध अनुसंधान इकाई द्वारा जांच होनी चाहिए। विभिन्न मामलों में अब तक हुई विभागीय जांचों में स्पष्ट रुप से देखा गया है कि लोक सेवक नियमावली के विपरीत कार्य एवं आचरण करने वाला कर्मचारी विभागीय जांच में क्लीन चिट प्राप्त करने में सफल हो जाता है।
विभागीय जांच के आदेश अधिकतर उन्हीं मामलों में दिए जाते हैं जिनमें कर्मचारी के विरुद्ध कार्यवाही नहीं करनी होती है क्योंकि यदि उच्चाधिकारी अपने अधीनस्थ पर भ्रष्टाचार, कदाचार या कार्य के प्रति लापरवाही का दोष सिद्ध करता है तो वह स्वयं भी उस दोष के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है क्योंकि उस कर्मचारी पर कमाण्ड का वह स्वयं जिम्मेदार है यही कारण है कि विभागीय जांच में दोषी कर्मचारी स्पष्ट रुप से दोषी होते हुए भी क्लीन चिट प्राप्त कर लेते हैं और शिकायत कर्ता को मुंह की खानी पड़ती है, हालांकि न्यायपालिका के दरबार सभी के लिए खुले हैं लेकिन सभी की कुछ न कुछ सीमायें होती हैं जिनको लांघने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता।
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