महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर कई दिनांे तक चले राजनैतिक घटनाक्रम के बाद राजभवन का जो संदेश आया उस पर पूरा देश हतप्रभ रह गया। कई दलों के राजनेताओं ने फिर भाजपा पर संवैधानिक पद एवं संस्थाओं के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। राष्ट्रपति और राज्यपाल भारतीय संविधान के प्रथम रक्षक होते हैं अब तो राज्यपालों पर भी सत्ता पक्ष के इशारे पर काम करने के आरोप लगने लगे हैं। हाल ही में कई प्रदेशों में भाजपा की सरकारों के गठन को लेकर राजभवन के निर्णय और सीबीआई, ईडी, आरबीआई, चुनाव आयोग सहित कई संवैधानिक संस्थाओं को विशेष निर्णयों के आधार पर शक के दायरे में लिया जा चुका है। वर्ष 2014 में नयी सरकार के गठन के बाद सरकारी स्तर पर हुए अनेकों निर्णयों तथा देश में घटित हुई घटनाओं पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाये तो अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भाजपा अब भारत की सत्ता से कभी अलग नहीं होगी बल्कि भाजपा ही भारत और भारत ही भाजपा का नारा दिया जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
कभी इन्दिरा गांधी द्वारा कांग्रेस को तोड़कर कांग्रेस आई का गठन करना और कोर्ट के निर्णय के बाद आपातकाल की घोषणा कर सभी राजनेताओं को जेलों में ढूंस देने के बाद भी ऐसा ही लग रहा था कि शायद अब भारत में इंदिरा गांधी का कोई विकल्प नहीं है लेकिन वह अस्सी का दशक था और आज इक्कीसवीं सदी का भारत है उस समय पूरे देश में उत्तर प्रदेश की कार्य संस्कृति के आधार पर कार्य हो रहा था तो आजकल गुजरात का जलवा चल रहा है। अब यूपी और गुजरात में क्या समानता और क्या-क्या अन्तर है यह जनता को स्वयं समझना पड़ेगा। फिलहाल लोकतंत्र में किसी भी सरकार को आजीवन चलने वाली नहीं कहा जा सकता और न ही यह दावा किया जा सकता कि जब तक व्यक्ति विशेष जीवित है वही सत्ता संभालेगा। लोकतंत्र में ऐसा संभव नहीं है लेकिन जब लोकतंत्र ही नहीं होगा तो सबकुछ ‘मुमकिन’ हो जायेगा।
कभी इन्दिरा गांधी द्वारा कांग्रेस को तोड़कर कांग्रेस आई का गठन करना और कोर्ट के निर्णय के बाद आपातकाल की घोषणा कर सभी राजनेताओं को जेलों में ढूंस देने के बाद भी ऐसा ही लग रहा था कि शायद अब भारत में इंदिरा गांधी का कोई विकल्प नहीं है लेकिन वह अस्सी का दशक था और आज इक्कीसवीं सदी का भारत है उस समय पूरे देश में उत्तर प्रदेश की कार्य संस्कृति के आधार पर कार्य हो रहा था तो आजकल गुजरात का जलवा चल रहा है। अब यूपी और गुजरात में क्या समानता और क्या-क्या अन्तर है यह जनता को स्वयं समझना पड़ेगा। फिलहाल लोकतंत्र में किसी भी सरकार को आजीवन चलने वाली नहीं कहा जा सकता और न ही यह दावा किया जा सकता कि जब तक व्यक्ति विशेष जीवित है वही सत्ता संभालेगा। लोकतंत्र में ऐसा संभव नहीं है लेकिन जब लोकतंत्र ही नहीं होगा तो सबकुछ ‘मुमकिन’ हो जायेगा।
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