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धर्म के नाम पर क्यों बढ़ रहा है धंधा और राजनीति?

धर्म तो मन और जीवन में धारण करने की वस्तु है, धर्म से ही व्यक्ति को सन्मार्ग की प्रेरणा मिलती है और धर्म के सापेक्ष होने वाले कर्म से व्यक्ति का जीवन पवित्र हो जाता है। हमारे ऋषि मुनियों ने जिन वस्तुओं, जीवनोपयोगी वनस्पति, पेड़-पौधे अथवा पशु सभी को धर्म से इसीलिए जोड़ा कि व्यक्ति और समाज धर्म से जुड़कर अपने कर्मों को पवित्र रखे इसीलिए कहते हैं कि धर्म ही कर्म और कर्म ही व्यक्ति का धर्म होता है। यह धर्म तब तक ही संपुष्ट रहा जब तक धर्म के नाम पर न धंधा हुआ और न ही राजनीति, आज धर्म पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं और समाज की तीस प्रतिशत आबादी आज धर्म के नाम पर धंधा और राजनीति कर धर्म को समाप्त करने पर तुली हुई है। धर्मस्थलों को दुकानों की तरह संचालित कर उन्हें राजनीति का अड्डा बना दिया है धार्मिक पर्वों को विसंगति प्रधान बनाकर धर्मार्थ संस्थानों के नाम पर धन कमाने एवं एकत्र करने के प्रकल्पों का संचालन प्रारम्भ कर दिया गया है।
धार्मिक पर्व सामाजिक समरसता के प्रतीक होते थे लेकिन आज के नेता हों या ब्यूरोक्रेट्स, संत हों या प्रचार माध्यम सभी ने इन धार्मिक पर्वों को आर्थिक दृष्टि से देखना प्रारम्भ कर दिया है तथा कुम्भ जैसे पर्व अब केवल और केवल धनोपार्जन के आयोजन मात्र बन कर रह गये हैं। पहले हमारे समाज का प्रत्येक व्यक्ति धर्म के नाम पर धन लेना पाप समझता था लेकिन आज के संत धर्म के नाम पर चंदे का धंधा चलाकर न केवल मालामाल हो रहे हैं बल्कि दूसरे के माल को अपना बनाने के चक्कर में अदालतों और जेलों की शोभा भी बढ़ा रहे हैं। कई नेता और ब्यूरोक्रेट्स भी कुम्भ जैसे पर्व को अपनी कमाई का मुख्य स्रोत मान रहे हैं तो कई संत एवं अखाड़े भी बकायदा कुम्भ पर्व पर अपनी भावी योजनाओं के टारगेट फिक्स करते हैं। जहां तक अयोध्या के राम मंदिर का सवाल है तो उसके बनने या न बनने से देश के आम नागरिक पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है यदि बन भी गया तो पुजारी और ट्रस्टियों की आय का साधन बनेगा। जिस प्रकार कश्मीर से धारा 370 हटने से देश की प्रगति का मार्ग प्रशस्त नहीं हुआ उसी प्रकार राम मंदिर से भी देश की जनता की किस्मत चमकने वाली नहीं है। दोनों मामलों में फिर न्यायपालिका का दखल बना रहेगा, झूठी वाहवाही लूटने वालों ने पहले देश को अब धर्म को लूटकर सरकारी खजाने को खाली कर दिया है। कहां से होगा कश्मीर का विकास और कहां से बनेगा राम मंदिर? जहां तक धर्म के नाम पर बड़े आयोजनों का प्रश्न है तो यह बात अब गुजरे जमाने की बात हो गयी है। कुम्भ एवं अर्द्धकुम्भ के नाम पर 2010 और 2019 में जिस प्रकार देश की जनता के खून पसीने की कमाई को पानी की तरह बहाया गया इस धार्मिक भ्रष्टाचार रुपी गंगा में कितने नेताओं, संतों एवं अधिकारियों ने ‘अपवित्र’ डुबकी लगायी उसका बखान तो नहीं किया जा सकता लेकिन अनुभव अवश्य किया जा सकता है। धर्म के नाम पर धंधे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक संत ने यह बयान छपवाया कि वह राम मंदिर निर्माण में ग्यारह लाख रुपये देगा और चालू हो गया धर्म के नाम पर चंदा वसूलने का धंधा क्योंकि सभी जानते हैं कि ग्यारह लाख उस संत के पिताजी ने उसे दिए नहीं कि जाओ बेटा अयोध्या में मंदिर बनवाओ, आखिर वह संत देगा तो चंदा वसूली से ही इसी को कहते हैं और ऐसे ही होता है धर्म के नाम पर धंधा, इस धंधे के कई और भी आयाम हैं।
इसी वर्ष के प्रारम्भ में इलाहाबाद में सम्पन्न हुए अर्द्धकुम्भ को मात्र धंधा और राजनीति चमकाने के लिए पहले कुम्भ और बाद में महाकुम्भ कहकर प्रचारित किया गया क्योंकि उत्तर प्रदेश में सरकार एक संत के सानिध्य में ही चल रही है तो फिर अर्द्धकुम्भ को महाकुम्भ घोषित किया जा सकता है क्योंकि ऐसा ‘मुमकिन’ है। इस धर्म के धंधे ने धार्मिक आयोजनों को अब इतना बदनाम कर दिया है कि 2021 में हरिद्वार में आयोजित होने वाले कुम्भ पर्व के लिए अभी तक न तो केन्द्र से धन मिला और न ही स्थायी प्रवृत्ति के निर्माण कार्य प्रारम्भ हुए जो कांवड़ मेलों या अन्य लक्खी मेलों की व्यवस्था में सहायक बन सकें।

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