उत्तराखण्ड राज्य आज 19 वर्ष का हो गया है, अपनी शैशवावस्था से विषम भौगोलिक परिस्थितियों से संघर्ष करते-करते किशोरावस्था प्राप्त करने से पूर्व ही औद्योगिक क्रांति से जुड़ गया और राज्य की पहली चयनित सरकार ने पं. नारायणदत्त तिवारी के नेतृत्व में राज्य के मैदानी क्षेत्रों मंे लगभग एक हजार औद्योगिक इकाइयों की स्थापना का नया कीर्तिमान स्थापित किया तो राज्य के युवाओं में रोजगार के प्रति आशा की किरण फूटी और सुदूरवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों के युवाओं का राज्य के मैदानी क्षेत्रों के प्रति आकर्षण बढ़ा। आज राज्य में न केवल उत्तराखण्ड के बल्कि निकटवर्ती अन्य प्रदेश उत्तर प्रदेश और बिहार के भी हजारों युवा आजीविका चला रहे हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि राज्य निर्माण का सपना साकार नहीं हुआ क्योंकि जो विकास सुदूरवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों में होना था वह पहाड़ पर न होकर मैदान में हुआ जिससे पलायन में तेजी आई। इस पलायन के लिए हमारी ब्यूरोक्रेसी स्पष्ट रुप से दोषी है जो नये राज्य के अनुरुप योजनायें नहीं बना पायी। ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि नया राज्य बनने के बाद विकास नहीं हुआ, विकास हुआ और लोगों में सम्पन्नता भी आयी और जो आर्थिक विषमता बढ़ी उसके पीछे भी ब्यूरोक्रेसी का ही कमाल है। नया राज्य बनने के बाद एक करोड़ की आबादी में से एक प्रतिशत लगभग एक लाख की आबादी ने विकास की गंगा में जमकर गोते लगाये और इनमें से लगभग पांच सौ परिवार तो ऐसे हैं जो राज्य में महाविकास की सीमा को भी पार कर गए। उन पांच सौ परिवारों में राजनेता एवं ब्यूरोक्रेट्स सम्मिलित हैं जिन्होंने अपने स्वार्थ और सुविधाओं के लिए न तो पहाड़ पर (गैरसैण) राजधानी बनने दी और न ही सुदूरवर्ती पर्वतीय क्षेत्र में कोई उद्योग या कुटीर उद्योग लगवाये। न ही पर्यटन का विकास होने दिया न ही तीर्थाटन का, और जो योजनायें केन्द्र सहायतित थी उनमें जमकर भ्रष्टाचार किया कि केदारनाथ त्रासदी, कुम्भ 2010 तथा वीरचन्द्र सिंह गढ़वाली योजना की जांचें आज भी लंबित हैं। इतने स्थापना दिवस मना लिए और इस बार तो पूरा सप्ताह ही मनाया जा रहा है कहीं विकास का जिक्र नहीं, सिर्फ धन व्यय करने के सिवा।
उत्तराखण्ड आज भी भारत ही नहीं विश्व का सर्वाधिक साधन और सम्पदा सम्पन्न राज्य है इस राज्य में यदि आयुर्वेद एवं योग को लेकर जो प्रयास बाबा रामदेव ने किए उतना किसी अन्य उद्योगपति नेता या ब्यूरोक्रेट्स ने नहीं किया। यदि राजनेताओं में पं. नारायणदत्त तिवारी का नाम अग्रपंक्ति में सम्मिलित किया जाये तो उनसे भी कहीं न कहीं चूक तो हुई कि जो विकास सुदूरवर्ती पर्वतीय क्षेत्र में होना था वह पहाड़ पर न होकर मैदान का विकास हुआ जबकि मैदान तो पहले से ही विकसित थे। किसी भी राज्य के विकास के लिए वहां हैवी इण्डस्ट्री का होना आवश्यक नहीं है क्योंकि उद्योगों को सरकार सस्ती जमीने देती है सारी सुविधायें सुलभ करवाती है और उद्योग जो स्थायी रोजगार के नाम पर 6 से 8 हजार रुपये में 10-12 घंटे तक श्रमिकों का शोषण करते हैं। उद्योगों में काम करने वाला कोई भी श्रमिक परिवार आज तक विकसित परिवार की श्रेणी में नहीं आया वह न तो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा ही दिलवा पाता है और न ही निजी आवास की सुविधा प्राप्त कर पाता है बल्कि किराये के मकान में रहकर जीवनयापन ही कर पाता है। राज्य में कोई भी उद्योग ऐसा नहीं है जिसने अपने राज्य में चायना से आयात होने वाले उत्पादों को बंद करवा दिया हो ये उद्योग केवल अपना विकास करते हैं अलबत्ता इस बीसवें स्थापना दिवस समारोह में हम सब को पहाड़ के विकास की भूमिका तैयार करनी होगी तभी साकार होगा राज्य निर्माण का सपना।
कुछ लोगों का मानना है कि राज्य निर्माण का सपना साकार नहीं हुआ क्योंकि जो विकास सुदूरवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों में होना था वह पहाड़ पर न होकर मैदान में हुआ जिससे पलायन में तेजी आई। इस पलायन के लिए हमारी ब्यूरोक्रेसी स्पष्ट रुप से दोषी है जो नये राज्य के अनुरुप योजनायें नहीं बना पायी। ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि नया राज्य बनने के बाद विकास नहीं हुआ, विकास हुआ और लोगों में सम्पन्नता भी आयी और जो आर्थिक विषमता बढ़ी उसके पीछे भी ब्यूरोक्रेसी का ही कमाल है। नया राज्य बनने के बाद एक करोड़ की आबादी में से एक प्रतिशत लगभग एक लाख की आबादी ने विकास की गंगा में जमकर गोते लगाये और इनमें से लगभग पांच सौ परिवार तो ऐसे हैं जो राज्य में महाविकास की सीमा को भी पार कर गए। उन पांच सौ परिवारों में राजनेता एवं ब्यूरोक्रेट्स सम्मिलित हैं जिन्होंने अपने स्वार्थ और सुविधाओं के लिए न तो पहाड़ पर (गैरसैण) राजधानी बनने दी और न ही सुदूरवर्ती पर्वतीय क्षेत्र में कोई उद्योग या कुटीर उद्योग लगवाये। न ही पर्यटन का विकास होने दिया न ही तीर्थाटन का, और जो योजनायें केन्द्र सहायतित थी उनमें जमकर भ्रष्टाचार किया कि केदारनाथ त्रासदी, कुम्भ 2010 तथा वीरचन्द्र सिंह गढ़वाली योजना की जांचें आज भी लंबित हैं। इतने स्थापना दिवस मना लिए और इस बार तो पूरा सप्ताह ही मनाया जा रहा है कहीं विकास का जिक्र नहीं, सिर्फ धन व्यय करने के सिवा।
उत्तराखण्ड आज भी भारत ही नहीं विश्व का सर्वाधिक साधन और सम्पदा सम्पन्न राज्य है इस राज्य में यदि आयुर्वेद एवं योग को लेकर जो प्रयास बाबा रामदेव ने किए उतना किसी अन्य उद्योगपति नेता या ब्यूरोक्रेट्स ने नहीं किया। यदि राजनेताओं में पं. नारायणदत्त तिवारी का नाम अग्रपंक्ति में सम्मिलित किया जाये तो उनसे भी कहीं न कहीं चूक तो हुई कि जो विकास सुदूरवर्ती पर्वतीय क्षेत्र में होना था वह पहाड़ पर न होकर मैदान का विकास हुआ जबकि मैदान तो पहले से ही विकसित थे। किसी भी राज्य के विकास के लिए वहां हैवी इण्डस्ट्री का होना आवश्यक नहीं है क्योंकि उद्योगों को सरकार सस्ती जमीने देती है सारी सुविधायें सुलभ करवाती है और उद्योग जो स्थायी रोजगार के नाम पर 6 से 8 हजार रुपये में 10-12 घंटे तक श्रमिकों का शोषण करते हैं। उद्योगों में काम करने वाला कोई भी श्रमिक परिवार आज तक विकसित परिवार की श्रेणी में नहीं आया वह न तो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा ही दिलवा पाता है और न ही निजी आवास की सुविधा प्राप्त कर पाता है बल्कि किराये के मकान में रहकर जीवनयापन ही कर पाता है। राज्य में कोई भी उद्योग ऐसा नहीं है जिसने अपने राज्य में चायना से आयात होने वाले उत्पादों को बंद करवा दिया हो ये उद्योग केवल अपना विकास करते हैं अलबत्ता इस बीसवें स्थापना दिवस समारोह में हम सब को पहाड़ के विकास की भूमिका तैयार करनी होगी तभी साकार होगा राज्य निर्माण का सपना।
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