हरिद्वार। धर्म क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण नगरी हरिद्वार है जो भारी अव्यवस्थाओं के बीच भी धर्मानुयायियों के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है। हरिद्वार भारत ही नहीं पूरे विश्व की आस्था का ऐसा स्थान है जहां आकर व्यक्ति की तीर्थाटन एवं पर्यटन दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है इसीलिए कुम्भ एवं अर्द्धकुम्भ मेलों के आयोजन हेतु केन्द्र एवं राज्य सरकार की तरफ से भारी भरकम धनराशि उपलब्ध करायी जाती है। उत्तराखण्ड नया राज्य बनने के बाद यहां की ब्यूरोक्रेसी ने सोची समझी साजिश के तहत ऐसा मकड़जाल बुना कि हरिद्वार को मांस, मदिरा, खनन और अनेकों प्रकार से इस पावन नगरी को भ्रष्टाचार का केन्द्र बना दिया, यहां सरकारी धन बाद में आता है उसे ठिकाने लगाने की योजनायें पहले ही तैयार हो जाती हैं इस कार्य में यहां के जन प्रतिनिधियों की भूमिका भी संदिग्ध रही है।
हरिद्वार में कुम्भ तथा अर्द्धकुम्भ के मेले उत्तराखण्ड राज्य निर्माण से पूर्व भी आयोजित होते थे उनके आयोजन मंे भी भ्रष्टाचार होता था लेकिन वह एक निश्चित दर से कमीशन के तौर पर। वह इसीलिए कि सरकारी सेवा में आने के बाद चपरसी से लेकर चीफ सेक्रेटरी तक ऐसा कोई कर्मचारी नहीं है जिसने अपने वेतन के अतिरिक्त किसी प्रकार की अन्य सुविधा प्राप्त न की हो इसीलिए माना जाता है कि 90 प्रतिशत सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारी सुविधा शुल्क भोगी होते हैं। अब तक विभिन्न मामलों में हुई जांच से यह स्पष्ट भी हो गया है लेकिन इन सरकारी कर्मचारियों ने अपने बचाव के लिए विभागीय जांच का प्राविधान कर रखा है, चूंकि भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे तक और नीचे से ऊपर तक दो मुंहे सांप की तरह चलता है इसीलिए विभागीय जांच में भ्रष्ट कर्मचारी को सजा नहीं मिलती और भ्रष्टाचार दिन दूना रात चौगुना बढ़ता जा रहा है। अब बात करते हैं हरिद्वार में आयोजित होने वाले धार्मिक पर्वों की तो राज्य की पहली निर्वाचित सरकार ने मात्र सौ करोड़ की लागत से अर्द्धकुम्भ मेले का आयोजन वर्ष 2004 में कराया जिसमें मेला नियंत्रण कक्ष एवं मेला अस्पताल जैसे दो महत्वपूर्ण स्थायी निर्माण कराये गए यातायात हेतु गंगनहर पर दो पुलों का निर्माण हुआ तथा हरकी पैड़ी का विस्तार हुआ। यह सभी विकास कार्य हरिद्वार में बढ़ने वाली यात्रियों की संख्या को आसानी से नियंत्रित करने में आज भी सहायक हैं।
जब तक केन्द्र एवं राज्यों में गैर भाजपा सरकारें रहीं तब तक सरकारी योजनाओं में कमीशनखोरी का चलन था लेकिन जब से संघ के नियंत्रण में चलने वाली सरकारों का आगाज हुआ, सरकारी योजनाओं से कमीशन की दर बढ़ कर खुली लूट में तब्दील हो गयी और धर्म, धार्मिक पर्व और धार्मिक स्थलों के नाम पर बड़ी-बड़ी योजनायें बनाकर उनमें सरकारी धन जो देश की आम जनता की खून पसीना एवं मेहनत की कमाई का पैसा होता है उसकी लूट खसोट प्रारम्भ हो गयी यही कारण है कि आज गाय, गंगा और राम सभी बदनाम हो गए। कुम्भ मेला 2010 हरिद्वार और अर्द्धकुम्भ मेला 2018-2019 प्रयाग जिसे पहले कुम्भ और बाद में महाकुम्भ के नाम से प्रचारित किया गया उसका क्या कारण था देश के नागरिक भलीभांति समझते हैं। जहां तक कुम्भ 2010 हरिद्वार की बात है तो किसी धार्मिक आयोजन में इतना बड़ा भ्रष्टाचार शायद पहली बार हुआ होगा जिसमें मुख्यमंत्री, सांसद, नगर विकास मंत्री और कुम्भ मेलाधिकारी ने अखाड़ा परिषद अध्यक्ष के साथ मिलकर बहती गंगा में ‘‘पवित्र स्नान’’ किया था।
जहां तक वर्तमान कुम्भ मेला 2021 हरिद्वार के आयोजन की बात है तो मेले की व्यवस्था के लिए नियुक्त कुम्भ मेला अधिकारी महोदय ने सरकार को कोई ऐस प्लान दिया ही नहीं कि इस आयोजन में ऐसे स्थायी निर्माण कार्य हो जायें जो यहां आयोजित होने वाले अन्य मेलों की व्यवस्था में भी काम आयें। कुम्भ मेला आयोजन में लगे राज्य के नगर विकास मंत्री और मेला अधिकारी की क्या मंशा रही होगी यह तो भगवान ही बेहतर जान पायेगा लेकिन अब कुम्भ पर्व के आयोजन में इतना समय भी नहीं बचा है कि स्थायी निर्माण कार्य सम्पन्न हो सकें फिलहाल कुछ घाटों का निर्माण कराया जा रहा है उन्हीं में संतोष करना पड़ेगा। उत्तराखण्ड राज्य एवं कुम्भ क्षेत्र हरिद्वार के व्यवस्थित विकास के लिए केन्द्र सरकार के पास अब एक ही विकल्प बचा है कि वह सम्पूर्ण हरिद्वार जनपद एवं लक्ष्मण झूला तक लगने वाले कुम्भ क्षेत्र को केन्द्र शासित राज्य का दर्जा प्रदान करे तभी बचेगी गंगा और गंगा तट पर आयोजित होने वाले धार्मिक पर्व।
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