यह कोई कहावत नहीं बल्कि सत्यता है कि 18 वर्ष में बच्चा बालिग हो जाता है और अपने पैरों पर खड़ा होकर धर्नाजन की ओर अग्रसर हो जाता है लेकिन हमारा राज्य उत्तराखण्ड एक सप्ताह बाद 19 वर्ष का हो जायेगा और आज भी अपने पैरों पर खड़ा न होकर दिल्ली की तरफ दयनीय दृष्टि से देखता है। चाहे कोई विकास परक योजना हो या कुम्भ जैसा धार्मिक पर्व जब तक केन्द्रीय सहायता नहीं मिलती तब तक आंखें दिल्ली की तरफ ही लगी रहती हैं। राज्य निर्माण के बाद नियमानुसार विशेष राज्य का दर्जा भी होता है वह भी रहा और अवस्थापना मद में भी अन्य राज्यों की तुलना में विषम भौगोलिक परिस्थितियों के तहत अधिक सहायता मिली। लेकिन...?
प्रतिवर्ष राज्य स्थापना दिवस 9 नवम्बर को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था और आयोजनों पर हमारी ब्यूरोक्रेसी एवं राजनेता जमकर जश्न मनाते आ रहे हैं इस वर्ष हमारी राज्य सरकार ने 19वें स्थापना दिवस को राज्य स्थापना सप्ताह के रुप में मनाने का निर्णय लिया है जिन पर 6 दिन तक लगातार खर्चा ही खर्चा है। हमारे राजनेता एवं ब्यूरोक्रेट्स पता नहीं किस ख्यालगोई में फंस कर रह गये जिन्हें राज्य के विकास की बिल्कुल परवाह नहीं है। 19 वर्ष बीतने के बाद एक भी विकास परक योजना लागू नहीं हुई यदि राज्य स्थापना दिवस पर प्रतिवर्ष एक ऐसी योजना लागू होती जिसमें बाहरी निवेश एवं विकास का खाका तैयार होता तो आज 19 ऐसी योजनायें चल रही होतीं जिनसे राज्य न केवल विकसित की श्रेणी में आ जाता बल्कि देश का अग्रणी और सम्पन्न राज्य होता। ऐसा नहीं है कि इन योजनाओं के बारे में हमारे नेता और अधिकारी जानते नहीं, सभी भली प्रकार वाकिफ हैं और राज्य निर्माण से पूर्व चिल्ला-चिल्ला कर भाषण देते थे कि उत्तराखण्ड में विकास की असीमित संभावनायें हैं जो राज्य निर्माण के बाद ही साकार हो सकती हैं। नया राज्य तो बन गया अब बालिग भी हो गया लेकिन वे सभी योजनायें नया राज्य बनते ही दफन हो गयीं। जिस प्रकार राजनेता और अधिकारी अपना-अपना जन्मदिन मनाते हैं तो अपने शेष जीवन के लिए कुछ विशेष योजनायें तैयार करते हैं और उन्हें पूर्ण करने का संकल्प लेते हैं। इस अवसर पर उन्हें अनेकों प्रकार के बेशकीमती उपहार भी मिलते हैं फिर राज्य का स्थापना दिवस उनके अपने-अपने जन्मदिवसों से भिन्न क्यों है? ऐसा पहली बार हो रहा है कि स्थापना दिवस सप्ताह पर लगातार 6 दिनों तक खर्चों की सीमा करोड़ों को पार कर जायेगी।
जिस राज्य को भारत का आदर्श राज्य एवं सुख-सुविधा सम्पन्न बनाने की कवायत चल रही थी उसमें आज सड़कें वीरान हैं, एनएच घोटालों में फंस कर रह गया, छात्रवृत्ति घोटाला, आपदा घोटाला, भूमि घोटाला, सहित कोई भी ऐसी योजना नहीं जिसमें भ्रष्टाचार न हुआ हो लेकिन विडम्बना देखें कि एक दो मामलों की छोड़कर सभी को क्लीन चिट मिल गई। उत्तराखण्ड पहला ऐसा राज्य है जहां सरकारी बंगले का किराया, बिजली, टेलीफोन का बकाया होते हुए भी एक नेता ने दो बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और दोनों बार जीता। मामला न्यायालय तक भी गया लेकिन नतीजा टांय-टांय फिस, क्योंकि कुम्भ 2010 के आयोजन का हीरो आजकल केन्द्र में मंत्री है और पार्टी ऐसी कि जिसमें एक दो या सात नहीं जाते ही करोड़ों गुनाह माफ हो जाते हैं, बस भगवान ही मालिक है, राज्य का भविष्य कैसा होगा अभी तक कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता अलबत्ता यहां विकास योजना चली हो या नहीं, विकास हुआ या नहीं लेकिन मान्यवर और श्रीमान, कार्यपालिका एवं विधायिका में ऐसा कोई नहीं जो विकास के आकाश पर चांद तारों की चौपड़ में मस्त न हो। बधाई हो राज्य के 19वें स्थापना दिवस सप्ताह की जिसमें महिला, युवा, फिल्म और सेना के नाम पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों पर राज्य के अनेक क्षेत्रों मंे धनवर्षा के आसार बन गये हैं।
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