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ब्यूरोक्रेसी की दीवाली और जनता का दिवाला


भारत धर्म निरपेक्ष देश है और यहां सभी धर्मों को अपने धर्म का प्रचार करने तथा उसे मनाने की खुली छूट है कि प्रत्येक व्यक्ति धर्म की मर्यादा और संविधान के दायरे में रहकर अपने धार्मिक पर्व को मना सकता है लेकिन हमारे देश की कार्यपालिका एवं विधायिका ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को लोकतांत्रिक न रखकर अपने तानाशाही के शिकंजे में जकड़ रखा है जिससे देश और धर्म दोनों की स्वतंत्रता का अर्थ ही बदल गया है। लोकतंत्र में जनता का अधिकार सर्वोच्च होता है लेकिन आजकल भारत की व्यवस्था में लोक को परतन्त्रता में जकड़ कर तंत्र की तानाशाही का राज चल रहा है जो देश की स्वतन्त्रता को खतरा बन सकता है। हमारे राजनेताओं एवं ब्यूरोक्रेसी ने मिलकर देश को बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया है, राजनेता और सरकारी कर्मचारी तथा अधिकारियों के वेतन भत्ते प्रतिवर्ष बढ़ रहे हैं तो जनता पर करों की भरमार हो रही है, व्यापारियों पर टेक्स बढ़ता है तो वह भी जनता पर ही डाल देता है, सरकारी कर्मचारी बिना रिश्वत के कोई काम नहीं करते वह मार भी जनता पर ही पड़ती है। अब जमाना इतना बदल गया किसी भ्रष्ट कर्मचारी की शिकायत ली नहीं जाती और शिकायत ले भी ली जाये तो उसे जांच आख्या में क्लीन चिट दे दी जाती है क्योंकि जो कर्मचारी भ्रष्टाचार करते पकड़ा जाता है वह जांच करने वाले अधिकारी को रिश्वत देकर अपने पक्ष में रिपोर्ट लगवाने में सफल हो जाता है जनता या शिकायतकर्ता फिर ठगा का ठगा ही रह जाता है। 
किसानों की फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य भले ही बढ़ा हुआ घोषित कर दिया जाये लेकिन उसका लाभ सरकारी कर्मचारियों की मिली भगत से बिचौलिए ले रहे हैं क्योंकि बिचौलिए ही सरकारी कर्मचारी अधिकारियों को रिश्वत देकर किसानों का शोषण करते हैं यही कारण है कि सरकार सबकुछ निजी क्षेत्र में देकर अब इन भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारियों की सेवायें समाप्त करने वाली है। सरकारी कर्मचारियों के वेतन और भत्ते जिस गति से बढ़ रहे हैं उसी गति से आम जनता पर करों की दरें बढ़ायी जा रही हैं जिससे सामाजिक असमानता का वातावरण तैयार हो रहा है। उत्तराखण्ड में सरकारी कर्मचारियों के वेतन एवं पेंशन में 5 प्रतिशत की वृद्धि कर राज्य की जनता पर तीन सौ करोड़ का अतिरिक्त भार डाला गया जबकि उत्तराखण्ड की आम जनता पहले से ही अन्य राज्यों की तुलना में प्रति व्यक्ति कर्जे में आगे है तो यूपी में होमगार्डों को सिपाहियों के समतुल्य वेतन देकर जनता की खून पसीने की कमाई को सरकारी कर्मचारियों ने अपनी झोली में डाल दिया है ये सभी वे कर्मचारी हैं जो बिना रिश्वत लिए जनता का काम नहीं करते। देश में इतनी अंधी सरकार आयेगी देश की जनता को इसका पूर्वानुमान नहीं था लेकिन अब तक तो जनता नाकारा सरकारों को बदल देती थी लेकिन अब ईवीएम देवी ने जनता का वह अधिकार भी छीन लिया है। लोकतंत्र में जनता अपने अधिकार भी अब भुलाने लगी है और भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी द्वारा थोपे गए सभी करों को स्वीकार कर संविधान का सम्मान कर रही है जबकि राजनेता एवं सरकारी अधिकारी तथा कर्मचारी संविधान का उल्लंघन कर आवश्यकता से अधिक वेतन लेकर भी बिना सुविधाशुल्क लिए कोई काम नहीं करते। ऐसा हमारी वर्तमान पीढ़ी द्वारा दारु पीकर वोट देने के कारण हो रहा है। यदि हम अपने अतीत पर गौर फरमायें तो हमारे पूर्वजों ने जब तक बिना किसी लालच एवं स्वार्थ के अपनी अन्तर्रात्मा की आवाज पर मतदान किया तब तक एक भी देशद्रोही सत्ता की चौखट तक पहुंच नहीं पाया लेकिन जिस दिन से सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारी जो भारत के निर्वाचन आयोग के अधीन काम करते हैं उन्हीं के खुले संरक्षण में हमारे युवाओं, नौजवानों एवं 65 वर्ष से कम के मतदाताओं जो आजादी के बाद पैदा हुए ने दारु पीकर या अन्य लालच में फंसकर मतदान करना प्रारम्भ किया तभी से विदेशी शह पर देश की सत्ता ने रन करना प्रारम्भ कर दिया और यही बहुराष्ट्रीय कम्पनियां ईस्ट इण्डिया कम्पनी बनकर देश को गुलाम बनाने की साजिश रच रही हैं जो लोग उस समय अंग्रेजों के समर्थक थे वे ही आज संविधान एवं संस्कृति को समाप्त करने के लिए धर्म के नाम पर मतदान करवा रहे हैं।

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