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सरकार के भरोसे न रहकर स्वयं आत्मनिर्भर बनंे किसान

अन्तर्राष्ट्रीय उपभोक्ता कल्याण समिति के प्रदेश अध्यक्ष तथा समाजवादी विचारक रामनरेश यादव ने कहा है कि केन्द्र सरकार अपनी गलत नीतियों के कारण लगातार असफलता की ओर बढ़ रही है। देश से धन गायब हो रहा है और उद्योग जगत मंदी की मार से बंदी के कगार पर है। सरकारी, अर्द्ध सरकारी तथा निजी क्षेत्र सभी पर आर्थिक मंदी का असर स्पष्ट रुप से दिखाई देने लगा है। देश बर्बादी की ओर जा रहा है, देश का सोना पहले ही गिरवी रखा जा चुका है और अब रिजर्व बैंक से रिजर्व धन में से एक बड़ा भाग सरकार ने ले लिया है जिसका स्पष्ट संकत है कि देश में भीषण आर्थिक संकट आने वाला है। वाहन चालान हो या अन्य कर देश के प्रत्येक वर्ग को लूटने का काम बड़े पैमाने पर चल रहा है लेकिन देश का धन कहां जा रहा है इसका जवाब देने वाला कोई नहीं है ऐसी स्थिति में देश की 70 प्रतिशत आबादी की भागीदारी वाले किसानों को देश तथा अपनी रक्षा के लिए अपने उत्पादन में बदलाव कर सरकारी प्रपंचों से अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी।
आज तक देश पर काबिज रही किसी भी सरकार ने किसान हित की न सोचकर नेता, नौकरशाही एवं उद्योगों के हितों की रक्षा की तथा किसान को उपेक्षित रखा। राजनेताओं ने अपने मानदेय एवं भत्ते स्वयं  बढ़ाकर लाखों तक पहुंचा दिए तो ब्यूरोक्रेसी ने अपने वेतन सैकड़ों से बढ़ाकर विभिन्न वेतन आयोगों के माध्यम से लाखों में पहुंचा दिए वे जनता के धन से बने वातानुकूलित आवासों में रहते हैं तथा वातानुकूलित वाहनों में सैर सपाटा करते हैं जिससे देश में आर्थिक विषमता लगातार बढ़ती जा रही है। आजादी से लेकर अब तक किसी भी दल की सरकार ने किसान आयोग का गठन नहीं किया परिणाम स्वरुप किसान को उसकी उपज का वाजिब मूल्य नहीं मिल पाने के कारण वह अपने बच्चों को उच्च अथवा तकनीकी शिक्षा प्रदान नहीं कर पा रहा है। पूरे देश में किसान की दुर्गति हो रही किसान के बच्चों के पढ़ने के स्कूल अलग तथा अधिकारी एवं नेताओं के बच्चों के पढ़ने के स्कूल अलग हैं। शिक्षा एवं चिकित्सा का व्यवसायीकरण हो चुका जो अब किसान की पहुंच से काफी दूर हो रही है ऐसी स्थिति में किसान को अपनी फसल चक्र में बदलाव कर स्वयं अपने पैरों पर खड़ा होना होगा अन्यथा हाई ब्रीड एवं अधिक पैदावार के लालच में किसान बीज का मोहताज हो जायेगा। 
देश की सुरक्षा हो या खाद्यान्न समस्या दोनों ही किसान पर आधारित हैं किसान का बेटा ही सेना में भर्ती होकर देश की सुरक्षा करता है और किसान व्यक्ति के जीवित रहने के लिए अन्न का उत्पादन करता है फिर भी इस देश में किसान सर्वाधिक उपेक्षित है किसी भी नेता, अधिकारी या उद्योगपति का बेटा सेना अथवा अर्द्ध सैनिक बलों में सिपाही नहीं है राष्ट्र के निर्माण, संचालन, सुरक्षा एवं खाद्यान्न व्यवस्था बनाने में किसान का ही सर्वाधिक योगदान है। देश और समाज की इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभालने के बाद अब किसान को अपने बारे में स्वयं सोचना होगा तथा किसी भी सरकार से अपनी हित रक्षा की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए क्योंकि वर्तमान सरकार ने देश को बड़े आर्थिक संकट की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया है।
देश में कृषि का क्षेत्रफल लगातार कम होता जा रहा है जो भविष्य के लिए किसानों को बड़े संकट का पर्याय बनेगा। बीते चार दशकों में कृषि भूमि का लगभग 10 प्रतिशत क्षेत्रफल उद्योगों तथा रियल स्टेट ने लिया जबकि पांच प्रतिशत भाग आवासीय तथा यातायात के साधनों के लिए अधिग्रहित हो चुका है। शेष बची कृषि भूमि में लगभग चालीस प्रतिशत क्षेत्रफल पर गन्ना उत्पादन का अधिकार है जिससे चीनी एवं शराब का उत्पादन होता है। किसान को अब गन्ना उत्पादन का मोह त्याग कर गेंहू, धान के साथ ही मोटे अनाज, दाले एवं तिलहन का उत्पादन बढ़ाना होगा जिसे वह भविष्य के लिए संचित भी कर सकता है। सरकार यदि कृषि उपज का वाजिब मूल्य नहीं देगी तब भी किसान आपसी विनिमय के माध्यम से अपना और अपने परिवार का भरण पोषण भली भांति कर सकेगा जैसा आजादी के पूर्व और उसके उसके दो दशक बाद तक होता था। किसान को आगे बढ़ना है तो अपने उत्पादों मंे बदलाव कर स्वयं आत्मनिर्भर बनना होगा।

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