समाज के प्रति संवेदनशीलता, कानून का भय और कर्तव्य के प्रति निष्ठा ये सब बीते जमाने की बातें हो गयी हैं। हमारी सरकारें जन स्वास्थ्य के प्रति कितनी संवेदनशील हैं इसका अंदाजा नित नई-नई बढ़ रही बीमारियों डेंगू, चिकनगुनिया, कैंसर तथा अन्य बीमारियों को दिन-प्रतिदिन बढ़ रही भयावहता से सहज ही लगाया जा सकता है। एक जमाना था जब चेचक, मलेरिया, पोलियो तथा गले में घेंघा जैसी बीमारियां बढ़ रही थीं तो सरकार ने उन पर नियंत्रण किया लेकिन वर्तमान में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हमारी सरकारें ही बीमारियों पर नियंत्रण करने वालों के नियंत्रण में काम कर रही है। सृष्टि का सत्य है कि यहां न कोई धन सम्पदा लेकर आता है न ही जाता है सबकुछ किसी व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति न होकर राष्ट्र और समाज की ही सम्पत्ति होती है बल्कि जो व्यक्ति गलत ढंग से अर्जित किए धन का संचय करता है वह इसी जन्म में नरक ;जेलद्ध की सजा भुगतता है। अब समाज का प्रत्येक व्यक्ति सुखमय एवं समृद्धशाली ;स्वर्ग सदृशद्ध जीवन जीने के चक्कर में अपना अन्त समय नरक ;जेलद्ध गामी बना लेता है ऐसा व्यक्ति की दूरगामी सोच के अभाव में होता है। केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार कोई भी समाज में फैल रही भयावह एवं जानलेवा बीमारियों की रोकथाम के प्रति गम्भीर नहीं है। सरकारों का उद्देश्य जनता से बड़ी मात्रा में कर वसूल कर नेताओं एवं नौकरशाहों के वेतन भत्तों में वृद्धि करना मात्र रह गया है इससे देश में लगातार आर्थिक असमानता का वातावरण बन रहा है और देश की जनता स्वयं को गुलामी जैसी स्थिति में जीने को विवश मान रही है। सरकार जो भी योजना धरातल पर उतारना चाहती है उसमें भ्रष्टाचार सबसे पहले अपनी जगह बना लेता है यह भ्रष्टाचार पहले ब्यूरोक्रेसी से शुरु हुआ अब धीरे-धीरे राजनेताओं और निजी संस्थाओं में भी अच्छी पैठ बना चुका है।
जो चिकित्सक कभी भगवान का स्वरुप माना जाता था वह आज पैसा कमाने का पर्याय बन गया है। पहले वैद्य नाड़ी देखकर शरीर का पूरा हाल जान लेते थे आज के चिकित्सक तरह-तरह के परीक्षण करवा कर ही मरीज की जेबें ढीली करवा देते हैं जहां तक उपचार का प्रश्न है तो जीवन और मृत्यु तो परमात्मा के हाथ में होती है लेकिन एलोपैथी के प्रारम्भिक काल में नयी बनने वाली दवाईयों की जांच पशुओं या चूहा जैसे अनुपयोगी जीवधारियों पर होती थी तो आजकल मेडिकल कॉलेजों के प्रशिक्षु चिकित्सक स्त्री-पुरुषों पर ही अपनी दवाइयों तथा इंजेक्शनों का प्रयोग कर दवा की गुणवत्ता एवं प्रभाव का परीक्षण करते हैं भले ही मरीज की मृत्यु हो जाये क्योंकि उपचार के दौरान यदि मरीज की मृत्यु हो जाती है तो चिकित्सक को दोषी नहीं माना जाता है। वैसे भी हमारे देश में जितने नियम और कानून बनते हैं वे सब जनता को नियंत्रण में करने के लिए ही बनाये जाते है। देश का वातावरण बिगड़ने का मुख्य कारण यही है कि हमारे देश की नौकरशाही और नेताशाही बेलगाम हो गयी है। सरकार किसी भी दल की हो ब्यूरोक्रेसी में सुविधायें तथा भ्रष्टाचार दोनों समानान्तर बढ़ रहे हैं।
बदलते मौसम में व्यक्ति पहले भी बीमार होते थे लेकिन उस समय बीमार होने वालों की संख्या दो से पांच प्रतिशत ही होती थी जो आज बढ़ कर 30 से 40 प्रतिशत हो गयी है। लगभग आधी आबादी बीमारियों की चपेट में है और सरकार शिक्षा की भांति चिकित्सा का भी व्यवसायीकरण करने में जुटी है, क्या यही है सरकार का जनता के प्रति दायित्व? यदि समय रहते समाज में बढ़ रही जानलेवा बीमारियों की रोकथाम का विकल्प नहीं खोजा गया तो आधी आबादी मृत्यु के आगोश में समाने के कगार पर है। देश में बढ़ती बीमारियों की रोकथाम हेतु जनता को केवल सरकारों पर ही दोषारोपण न कर स्वयं के भी प्रयास करने हांेगे क्योंकि कई बीमारियों के लगने कारण और निवारण दोनों का ज्ञान होने के बाद भी हमारे देश की जनता व्यर्थ के शानो-शौकत में फंस कर स्वयं को बीमारियों के जाल में फंसा रही है, जनता स्वयं सावधान रहे।
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