किसी भी देश की अर्थव्यवस्था यदि खराब होती है तो उस देश के प्रधानमंत्री की नीतियों को दोषी मानना स्वभाविक है। अनुभवों के अभाव में किसी से भी गलती हो सकती है, किसी सम्पन्न राज्य की सत्ता चलाने और पूरे देश का नेतृत्व करने में अन्तर होता है। हमारे प्रधानमंत्री से यदि कहीं गलतियां हुई हैं तो वे क्षम्य हो सकती हैं बशर्ते कि गलतियों का स्वयं संज्ञान लेकर उनमें सुधार का प्रयत्न किया जाये। सत्ता का लोभ सभी को होता है और सत्ता प्राप्त करने के लिए प्रत्येक दल का राजनेता साम, दाम, दण्ड और भेद की नीति अपनाता है। देश की सत्ता पर अब तक काबिज रहे राजनेताओं की कार्यशैली का आकलन किया जाये तो प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने अनुभवहीन होने के बाद भी जितनी बेहतरी से राष्ट्र के प्रारम्भिक काल की बुनियाद रखी सदैव न केवल स्मरणीय बल्कि अनुकरणीय रहेगी जबकि इन्दिरा गांधी की सत्ता संचालन का अलग ही अंदाज था। अपनी सत्ता बनाये रखने के लिए इन्दिरा गांधी ने अपनी मूल पार्टी को ही नकार कर अलग पार्टी बना ली और अन्त में आपातकाल जैसी घोषणा करनी पड़ी जिसका खामियाजा भी उन्होंने भुगता इसके अतिरिक्त वी.पी. सिंह हों या चन्द्रशेखर, चौ. चरण सिंह हों या अटल बिहारी बाजपेयी सभी के अपने अंदाज थे। जहां नरसिंह राव ने मौन धारण कर अल्पमत की सरकार चला कर दिखा दी तो मनमोहन सिंह ने लगातार दो पारियों में ऐसा इतिहास बनाया जो कांग्रेस और देश के इतिहास में अविस्मरणीय रहेगा।
भारत लोकतांत्रिक देश है यहां की व्यवस्था बनाने अथवा बिगाड़ने में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का बराबर का योगदान होता है। देश में बिगड़ती अर्थव्यवस्था के लिए अकेले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता है इसके लिए विपक्ष भी बराबर का जिम्मेदार है। प्रधानमंत्री बनने से पूर्व जब नरेन्द्र मोदी यह कह रहे थे कि देश का इतना कालाधन विदेशों मे जमा है कि यदि भारत में आ जाये तो प्रत्येक व्यक्ति के खाते में 15-15 लाख रुपये आ जायेंगे, उस समय मोदी जी सत्ता में नहीं थे तब जो दल सत्ता में था उसे बताना चाहिए था कि धन काला नहीं होता है और धन जिसने जमा किया उसी का है उसी को मिलेगा। यदि वह धन भारत आ भी गया तो वह राष्ट्र की सम्पत्ति में तो जमा हो सकता है लेकिन जनता के खाते में नहीं आ सकता यह मोदी जी का सत्ता पाने का एक शगूफा था जो विपक्ष की नादानी से सफल हुआ। जब मोदी जी अपनी रैलियों में चीख-चीख कर कह रहे थे कि अब अच्छे दिन आने वाले हैं तो अन्य दलों को बताना चाहिए था कि इस समय सभी के बहुत अच्छे दिन हैं पूरा देश सम्पन्न है और धन अपने देश के बैंकों के अलावा विदेशों में भी जमा है तो इससे अधिक दिन कभी नहीं आ सकते और जनता को भी सोचना चाहिए था कि वर्तमान में उसके अच्छे दिन चल रहे हैं। जब अमेरिका सहित पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा गयी तब भी भारत अपने पैरों पर खड़ा रहा तो उससे भी अच्छे दिन और क्या हो सकते हैं? खैर कोई बात नहीं सुबह का भटका हुआ यदि शाम को अपने घर आ जाये तो उसे भटका हुआ नहीं कहा जाता है। देश की जनता और विपक्ष ने यदि अच्छे दिनों का आनन्द ले लिया हो तो 2014 से पूर्व वाली स्थिति में आये। देश की जनता और विपक्ष यदि ईवीएम में खोट मानते हैं तो समय रहते अभी से चुनाव आयोग से कहें कि देश की जनता केवल मत-पत्र के माध्यम से ही मतदान करेगी और विपक्ष को यदि ईवीएम से आपत्ति है तो वह भारत निर्वाचन आयोग को अभी लिखकर दे दे कि यदि मत-पत्र से चुनाव नहीं हुआ तो पूरा विपक्ष चुनाव का बहिष्कार करेगा तथा कोई भी दल अपना प्रत्याशी नहीं उतारेगा। चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है उसे देश की जनता और विपक्ष दोनों की मांग माननी पड़ेगी। विडम्बना यह कि जहां विपक्ष जीत जाता है वहां तो उसकी लोकप्रियता और जहां हार जाता है वहां ईवीएम में गड़बड़ी करने का आरोप लगाता है। भारत लोकतांत्रिक देश है और यहां चुनावों की सतत प्रक्रिया चलती रहती है, विपक्ष यदि 2024 के लोकसभा चुनाव मंे मत-पत्र के माध्यम से चुनाव चाहता है तो भारत निर्वाचन आयोग को अभी से लिख कर दे दे, जब चुनाव के दो चार महीने रह जाते हैं उस समय व्यवस्था बदलना चुनाव आयोग के लिए संभव नहीं होता है।
मोदी जी कैसे भी हैं अच्छे हैं या बुरे, हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं उनकी पार्टी जब विपक्ष में थी तो सत्ता पक्ष से एक भी काम गलत नहीं होने दिया, सजग विपक्षी की भूमिका निभायी लेकिन जब अन्य दल विपक्ष में आ गए तो सत्ता पक्ष ने कितने गलत काम कर दिए विपक्ष की बोलती बंद रही। नोटबंदी में मोदी जी ने जनता से 50 दिन मांगे लेकिन विपक्ष ने भी दे दिए, क्यों? बैंक और एटीएम की लाइनों में सैकड़ों लोग मर गए विपक्ष की बोलती बंद रही, क्यों? कांग्रेस जीएसटी लायी थी भाजपा ने लागू नहीं होने दी लेकिन जब भाजपा ने जीएसटी लागू की तो पूरा विपक्ष चुप, क्यों? अब मोदी सरकार के निर्णय गलत हैं या विपक्ष की भूमिका इस पर अधिक बहस करने की आवश्यकता नहीं फिलहाल देश की स्थिति अच्छी नहीं है सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों यदि देश को स्वतंत्र और सम्पन्न देखना चाहते हैं तो प्रतिशोध की भावना त्यागें अब बहुत हो चुका अपने-अपने अहम त्याग कर राष्ट्र और समाजहित के कार्य करें। बहुत हो गया हिन्दू-मुसलमान, हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और राम मंदिर तथा कश्मीर, अब केवल विकास की बात होनी चाहिए।
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