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नौकरशाही की गुलाम होकर रह गई देश की जनता

किसी राजनेता की कथनी और करनी में इतना बड़ा अंतर होता है, यों कहा जाये कि जो कहा उसका उल्टा किया, ऐसा देश की जनता ने आजादी के बाद पहली बार अनुभव किया। भारत की जनता मछली की तरह लालच में आकर पहली बार पश्चाताप कर रही है। देश के किसानों ने दोगुनी आय का सपना देखा था तो युवाओं ने प्रतिवर्ष दो करोड़ नए रोजगारों का, गरीबों ने अच्छे दिनों का सपना देखा तो पूरे देश की लालची जनता उस 15-15 लाख रुपये के लालच में बुरी तरह फंस गयी जिस प्रकार मछली और चूहा जाल में फंसते हैं। देश की जनता को शायद उस शख्स की असलियत तब पता नहीं थी जो अब पता चली है लेकिन अब इतनी देर हो चुकी है कि चिड़िया खेत चुग चुकी है। देश में कालेधन के नाम पर एक चवन्नी भी नहीं आयी जबकि दर्जनों बड़े कर्जदारों के या तो कर्ज माफ कर दिए गए या उनको मोटी रकमें लेकर विदेश भाग जाने में मदद दी गई। इस देश की जनता इतनी भोली है जो इससे पूर्व भी ईस्ट इण्डिया कम्पनी की मीठी-मीठी बातों में फंस कर गुलाम हो चुकी है और अब दोबारा उसी ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तर्ज पर एक ऐसे गुजराती ने कमाल दिखाया जो बात तो हिन्दुत्व की करता है लेकिन शक्ल सूरत और कारनामों से मुल्ला दिखता है। जो शख्स अपनी पत्नी और परिवार का नहीं हुआ वह देश का कैसे हो सकता है? यह बानगी जनता, देश और यूपी दोनों जगह देख चुकी है। पूरे विश्व का यदि रिकार्ड खगाला जाये तो अपने ही देश के प्रति इतनी बड़ी गद्दारी करने वाला नेता कहीं नहीं मिलेगा, जिसने देश को आर्थिक तंगी में धकेलने के लिए क्या-क्या कारनामे किए और दोबारा चुनाव जीतने के लिए कितने गन्दे और खतरनाक कारनामे किए ऐसी किसी को उम्मीद नहीं थी।
देश की जनता तो अपनी करनी का फल भुगत ही रही है, देश की ब्यूरोक्रेसी ने जिस प्रकार अपने कर्तव्यों को भुलाकर निजी स्वार्थ के लिए संविधान विरोधी कार्य किए और संवैधानिक संस्थाओं तथा संवैधानिक पदों पर बैठे लोग जिस प्रकार एक व्यक्ति विशेष के इशारे पर नाचे उसके भी परिणाम आने लगे हैं। देश कहां था और कहां पहंुच गया, आगे क्या होगा यह समय बतायेगा। देश का वातावरण कैसे बिगाड़ा गया यह बातें किसी से छुपी नहीं रह गयी हैं पहला चुनाव कालेधन के बल पर लड़ा गया और देश को पूंजीपतियों के हवाले कर दिया गया, नोटबंदी का उद्देश्य क्या बताया गया और निकला क्या? जीएसटी का उद्देश्य क्या बताया गया और निकला क्या? देश की जनता का ध्यान असल मुद्दों से किस प्रकार हटाया जाता है और देश की सुरक्षा के साथ गद्दारी कर देश को सुरक्षित हाथों में बताकर किस प्रकार दोबारा देश की जनता को छला गया। राजनेताओं को देश की मुख्यधारा से अलग कर किस प्रकार नाचने गाने वाले तथा अन्य क्षेत्रों का राजनीति में प्रवेश कराया गया यह देश के साथ गद्दारी है या वफादारी जनता अब महसूस करने लगी है। गाड़ी चाहे कितनी महंगी खरीदो दस साल बाद सड़क पर नहीं चलेगी, यदि चलाओगे तो एक हजार से पच्चीस हजार तक का जुर्माना देकर और चलोगे तो अपने ही देश की सड़कों पर रोड टैक्स (टोल प्लाजा) देकर। बिजली ही नहीं पानी भी तभी मिलेगा जब भारी कीमत दोगे। फिलहाल पानी की बोतल गांव के दूध की कीमत में मिल रही है।
भारत की जनता आजाद है या अपने ही देश के राजनेता और नौकरशाही की गुलाम। शायद अब जनता को आभास होने लगा है कि उससे चालान के रुप में भारी भरकम रकम तो वसूली जाती है लेकिन वह रकम कोषागार में जमा न होकर कहां जाती है यह नहीं बताया जाता। देश में ऐसा वातावरण क्यों बनाया गया कि पूरे देश का किसान परेशान, उद्योग बंदी के कगार पर, व्यापार चौपट, बाजारों से रौनक गायब, हर चौराहे पर असलाह धारी लुटेरों की फौज तैनात, ईडी और सीबीआई सम्पन्नता की दुश्मन बनकर कार्यवाही कर रही आखिर क्या हो गया इस देश की ब्यूरोक्रेसी को जो अपने ही देश की दुर्दशा करने पर तुली हुई है।

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