हरिद्वार में आयोजित हो रहे कुम्भ मेला 2021 के सभी स्थायी अथवा अस्थायी निर्माण कार्यों को 31 दिसम्बर 2020 तक पूर्ण करना है जिसके लिए केन्द्र सरकार से राज्य सरकार द्वारा पांच हजार करोड़ रुपये की मांग की गई। मेला अधिकारी सहित अधिकांश अधिकारियों की नियुक्ति भी हो चुकी है लेकिन अभी तक केवल बैठकों का दौर चल रहा है न तो कोई भी कार्य योजना तैयार की गई न ही किसी कार्य की निविदायें ही आमंत्रित की गई। हरिद्वार में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले कांवड़ सहित अन्य मेलों की व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए यहां स्थायी प्रवृत्ति के निर्माण कार्यों की आवश्यकता है लेकिन अब तक सम्पन्न हुए कुम्भ एवं अर्द्धकुम्भ मेलों को देखा जाये तो 2004 के अर्द्धकुम्भ को छोड़कर बाद में कोई भी स्थायी प्रवृत्ति का बड़ा निर्माण कार्य नहीं हुआ है। हरिद्वार के जिला तथा पुलिस प्रशासन को प्रतिवर्ष श्रावण मास के कांवड़ मेले में भारी अव्यवस्थायें का सामना करना पड़ता है लेकिन आज तक किसी अधिकारी ने पांच-दस लाख यात्रियों के लिए होने वाली स्थायी व्यवस्था के लिए कोई प्रबन्ध नहीं किए जबकि मेला सम्पन्न हो जाने के बाद दावे करोड़ों में होते हैं जो झूठे सिद्ध हो रहे हैं।
कुम्भ, अर्द्ध कुम्भ तथा कांवड़ मेलों में सबसे बड़ी समस्या पार्किंग एवं प्रसाधन की होती है जिसके स्थायी समाधान की आवश्यकता है दो पहिया एवं चार पहिया वाहनों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है परिणाम स्वरुप हरिद्वार में जाम की समस्या बनी रहती है। ऐसा नहीं है कि इस समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है लेकिन इस पर कार्य करने की आज तक नहीं सोची गई क्योंकि नैतिक पतन के इस युग में मीडिया इतना रचनात्मक और आज्ञाकारी हो गया है कि सरकार और प्रशासन जैसा चाहता है वैसा ही प्रचार होता है यह युग परिवर्तन का प्रभाव है। अर्थ प्रधान युग में प्रत्येक प्राणी को सुख, सुविधा और समृद्धि की चाहत होती है उसकी मनोकामना पूर्ण हो जाये तो चाहे संत हो या अखाड़ा, पत्रकार हो या कवि सब सकारात्मक बन जाते हैं जो नहीं बनता उसे देशद्रोही बताने का नया फैशन प्रारम्भ हो गया है।
हरिद्वार का महत्व हरकी पैड़ी से है जहां गंगा स्नान का विशेष पुण्यफल बताया जाता है लेकिन कुम्भ और कांवड़ दो ऐसे पर्व आते हैं जब कुल आने वालों में से चौथाई यात्री भी हरकी पैड़ी तक नहीं पहुंच पाते हैं क्योंकि हरकी पैड़ी अपनी क्षमता से अधिक यात्रियों को स्नान नहीं करवा सकती है। हरकी पैड़ी से यात्रियों के दवाब को कम करने के लिए वीआईपी घाट से पार्किंग स्थल के पास से आनन्द वन समाधि होते हुए चण्डीघाट पुल तथा उससे आगे गंगा नदी के दायें तट पर पक्के स्नान घाटों की आवश्यकता है जिस पर रोड़ी बेलवाला पुलिस चौकी के पास पक्का पुल बनाकर नीलधारा टापू को भी कांवड़ मेले के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है लेकिन इस राज्य के नेता हों या अधिकारी कुम्भ मेले के नाम पर मिलने वाली बड़ी धनराशि को स्थायी निर्माण कार्यों में न लगाकर तत्कालिक व्यवस्थाओं पर ही सारा फोकस रखते हैं।
वर्ष 2010 में हरिद्वार में आयोजित हुए कुम्भ मेले के बाद एक ऐसी गलत परम्परा बन गयी है कि कुम्भ बजट से ही अब अखाड़े और आश्रमों के संत भी अपनी-अपनी व्यवस्थायें करवाते हैं मेलाधिकारी के समक्ष नेता और संत दोनों को खुश रखने की चुनौती होती है उसे संत, नेता और अखबार तथा चैनल सभी को देखना होता है यही कारण है कि मेलाधिकारी भी स्थायी निर्माण कार्यों से ध्यान हटाकर तत्कालिक व्यवस्थायें चाक-चौबन्द कर सभी को खुश कर देता है ऐसी व्यवस्था अभी और कितने कुम्भ एवं अर्द्ध कुम्भों तक चलेगी? केन्द्र में पहली बार कठोर निर्णय लेने वाली सरकार आयी है और यदि इस पुरानी परम्परा पर इस कुम्भ मेले में प्रतिबन्ध नहीं लगा तो कुम्भ और कांवड़ जैसे धार्मिक आयोजनों में देश-विदेश के नागरिक आना बन्द कर देंगे, जब श्रद्धालु ही नहीं आयेंगे तो संत और सरकारी अधिकारी तथा कर्मचारी ही पवित्र गंगाजल में डुबकी लगाकर स्वयं को धन्य मान लेंगे, बोलो गंगा मइया की जय।

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