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देश और समाज को बर्बाद करने वाले उद्योगों को बंद करे सरकार

बेलगाम होता जा रहा प्रदूषण प्रकृति के विनाश की पटकथा लिख रहा है और हमारी सरकार में बैठे राजनेता एवं ब्यूरोक्रेट्स विकास के नाम पर विनाश की मंजिले तैयार करने में मशगूल हैं। वर्तमान युग विज्ञान का युग है लेकिन भारत में योग, अध्यात्म एवं ज्योतिष अपने अलग-अलग दावे कर स्वयं के श्रेष्ठ होने के तर्क दे रहे हैं। हमारे देश में लग रहे उद्योगों से बेरोजगारी तो कम हुई नहीं बल्कि प्रदूषण इतना बढ़ गया कि समय रहते इस पर यदि नियंत्रण नहीं किया गया तो प्रकृति प्रलयकाल के आगोश में समा जायेगी। आज ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण और बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग मानवता के विनाश की पर्याय बनती जा रही है लेकिन किसी वैज्ञानिक, योग एवं अध्याय के गुरु अथवा ज्योतिषियों ने ऐसा कोई शोध नहीं किया कि प्रकृति और संस्कृति में आ रहे बदलाव के मुख्य कारण क्या हैं? 
हमारे देश में आज भी सत्तर प्रतिशत आबादी कृषि पर आधारित है जो विकास से अछूती है लेकिन भ्रष्टाचार और महंगाई की मार झेलते हुए देश की सत्ता के संचालन हेतु करों के भार से इतनी दबती जा रही कि उसका दम घुटने के कगार पर है। सरकार कृषि को प्रोत्साहन न देकर प्रदूषण फैलाने वाले और श्रमिकों का शोषण करने वाले उद्योगों को प्रोत्साहन दे रही है। जितने उद्योग लग रहे हैं उतनी ही चायना जैसे विदेशीं सामानों की बिक्री भारत में बढ़ रही है। किसानों की जमीने उद्योगपति खरीद कर प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग लगा रहे हैं, ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा रहे हैं और श्रमिकों का शोषण कर रहे हैं किसी भी औद्योगिक इकाई का श्रमिक आर्थिक रुप से सक्षम न होकर केवल पेट पालने की स्थिति में है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने, प्रदूषण फैलाने और कृषि उपज का सामजस्य बिगाड़ने में सर्वाधिक योगदान हमारे चीनी मिलों का है। चीनी मिलों से निकलने वाली बदबू व्यक्ति में मानसिक विकारों को जन्म देकर संस्कार विहीन बना रही है जब व्यक्ति प्रदूषित वायु को श्वांस के रुप में ग्रहण करता है तो उसकी मानसिक स्थिति असंतुलित हो जाती उसकी सोचने और समझने की क्षमता में कमी आ जाती है परिणाम स्वरुप व्यक्ति दुष्चरित्रता की ओर अग्रसर हो जाता है। अब तक प्रचार माध्यमों के जरिये प्रकाश मंे आयी बलात्कार, अत्याचार, भ्रष्टाचार तथा अन्य अमानुषिक घटनायें उन्हीं क्षेत्रों में अधिक होती हैं जहां शुगर मिल हैं। 
जहां तक औद्योगिक विकास, उत्पादन और बेरोजगारी की समस्या समाप्त करने का सवाल है तो शुगर मिल में चीनी और शराब का उत्पादन होता है जो दोनों ही उत्पाद मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। चीनी मिलें केवल वर्ष में चार-पांच माह ही कार्य करती हैं जिससे बेरोजगारी पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। सरकार गन्ना खरीदने के लिए चीनी मिलों को तो प्रोत्साहन देती है लेकिन गेंहू, धान, अरहर, मसूर, उड़द, सरसों, तिल तथा मूंगफली अथवा ज्वार, बाजरा जैसे जिन्सों के उत्पादन को प्रोत्साहन देने का काम नहीं कर रही है न ही आलू खरीद तथा संरक्षण के उपाय कर रही न ही पशु पालन एवं दुग्ध व्यवसाय को प्रोत्साहन दे रही है परिणाम स्वरुप देश की 60-70 प्रतिशत जनता बीमार की श्रेणी में आ गयी है और जिस प्रकार शुगर, रक्तचाप, कैंसर एवं डेंगू जैसी बीमारियां अपने पैर पसारती जा रही हैं उन सबके पीछे बढ़ता प्रदूषण एवं ग्लोबल वार्मिंग ही है। हमारे राजनेता/जन प्रतिनिधि लोकसभा एवं राज्य की विधान सभाओं में अपने अपने वेतन भत्ते स्वयं बढ़ा लेते हैं और ब्यूरोक्रेसी ने वेतन आयोगों का गठन कर अपने-अपने वेतन लाखों रुपये तक पहुंचा दिए हैं उसकी भरपाई के लिए किसान एवं आम जनता पर करों की भरमार कर दी। देश की जनता पिसती जा रही, राजनेता और सरकारी अधिकारी तथा कर्मचारी मौज-मस्ती मार रहे हैं समाज में अधिक विषमता आसमान छू रही है। ऊपर से बिजली कर्मचारी की बिजली माफ, जल संस्थान/निगम के कर्मचारी अधिकारियों का पानी माफ रोडवेज कर्मचारियों का किराया माफ रेल कार्मियों का किराया माफ इन सब का भारी भरकम भार आम जनता पर पड़ रहा है। जन प्रतिनिधि एवं अधिकारियों के वाहन एवं भवन सब सरकारी जो एचआरए कटता है वह भी नाम मात्र का पांच कमरों की कोठी का किराया मात्र 1200/रु मासिक जबकि मजदूर को दो हजार मासिक से कम में टीन शेड वाला कमरा भी नहीं मिलता। इतनी बड़ी विसंगति और इतनी बड़ी असमानता फैलाने वाली सरकार ने अब आम जनता के लिए तो ऐसा कर दिया वह अपने ही देश की सड़कों पर बिना भारी भरकम कर (टोल प्लाजा) दिए चल भी नहीं सकती। सरकार यदि देश को बचाना चाहती है तो तुरन्त किसान आयोग का गठन करे और कृषि उत्पादों में सामजस्य बनाने के लिए तत्काल योजनायें बनाये अन्यथा भ्रष्ट नौकरशाही के अत्याचार इस देश की जनता अधिक दिनों तक बर्दाश्त नहीं कर पायेगी। जिस पुलिस की स्थापना जनता की सुरक्षा के लिए की गई थी वह हर चौराहे पर जनता की जेबे ढीली करवा रही है और जुर्माने के रुप में वसूली जा रही भारी भरकम राशि कोषागार में जमा भी नहीं हो रही है देश की जनता लुट रही है और राजनेता मौज-मस्ती में व्यस्त है।

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