कई किसान संगठनों द्वारा बार-बार उठायी गयी किसान आयोग के गठन की मांग पर सरकार ने अब तक कोई कार्यवाही नहीं की है अब किसानांे को अपनी समृद्धि के उपाय स्वयं तलाशने होंगे, किसान अब अनपढ़ नहीं हैं उन्हें स्वयं प्रयास करने होंगे। जिन चीनी मिलों की स्थापना किसान की समृद्धि के लिए की गई थी वे सभी आज जन स्वास्थ्य के लिए बड़े खतरे के रुप में सामने आ रही हैं। चीनी मिलों से बनने वाली चीनी और शराब दोनों ही स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं यदि समय रहते चीनी मिलों को बंद नहीं कराया गया तो आगामी बीस वर्षों में देश की 70 प्रतिशत आबादी शराबी और 80 प्रतिशत जनता नाना प्रकार की बीमारियों से ग्रसित हो जायेगी। एक सर्वे के अनुसार अनुमान लगाया गया है कि जब से शुगर मिलों की संख्या बढ़ी और किसानों ने धान-गेंहू, दलहन तथा तिलहन के साथ ही मोटे अनाजों का उत्पादन बंद कर गन्ना उत्पादन में ही पूरी शक्ति लगा दी है तब से शराबियों और मरीजों की संख्या बढ़ी, परिणाम स्वरुप अब बड़े-बड़े चिकित्सालय उद्योग का रुप धारण कर रहे हैं और जनता की मेहनत का 30 से 40 प्रतिशत धन अब चिकित्सा पर व्यय होने लगा है, यह आंकड़ा एक दशक से लगातार बढ़ता ही जा रहा है। शुगर मिलों से राजनेताओं को चुनाव के समय चंदा मिलता है, सरकार को राजस्व प्राप्ति होती है, आबकारी विभाग राजस्व का प्रमुख स्रोत बनता जा रहा है, समाज में नशे की प्रवृत्ति बढ़ रही है, गुड़ का निर्माण एवं प्रयोग बंद हो जाने से मानव तन में फास्फोरस और कैल्सियम जैसे महत्वपूर्ण घटकों की कमी हो रही है जबकि चीनी का प्रयोग बढ़ने के बाद से ही शुगर के मरीजों में लगातार इजाफा हो रहा है।
किसानों में बढ़ रही गन्ना उत्पादन की होड़ से दलहन-तिलहन तथा अन्य मोटे अनाजों का उत्पादन शून्यता की ओर जाने लगा है परिणाम स्वरुप मानव तन बीमारियों का घर बनने लगा है। वर्तमान में किसान को गन्ने की फसल का ही एक मुश्त धन दिखायी देता है शेष गेंहू एवं धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य में से एक सौ से दो सौ रुपये प्रति कुन्तल बिचौलिए ले जाते हैं, बिचौलिए गन्ने में भी होते हैं लेकिन रो-झींक कर एक-डेढ़ साल में गन्ने का धन जब किसान को मिलता है तो उसे कुछ दिखायी देता है। गन्ने का भुगतान भी किसान को काफी विलम्ब से मिलता है लेकिन कुल मिलाकर अगला दिया पिछला लिया की तर्ज पर किसान का काम चलता रहता है। देश की कुल कृषि भूमि के लगभग पचास प्रतिशत क्षेत्रफल पर गन्ने का उत्पादन हो रहा है और यह स्पीड लगातार बढ़ती ही जा रही है यदि गन्ना उत्पादन की यही स्पीड रही तो आगामी 15-20 वर्षों में देश की खाद्यान्न व्यवस्था गड़बड़ा जायेगी। दलहन और तिलहन का उत्पादन लगातार गिर रहा है और मोटे अनाजों के बीज गायब होने प्रारम्भ हो गए हैं, जिससे जन स्वास्थ्य पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभाव के परिणाम भी आने प्रारम्भ हो गए है।
गन्ना उत्पादन भले ही किसान को फायदे का सौदा लग रहा है लेकिन है नहीं, मैं भी किसान का ही बेटा हूं और जानता हूं कि अकेले गन्ने के उत्पादन ने हमारे कितने अनाजों की बलि ले ली है जिससे किसान को दाल, घी, तेल, सब्जी सबकुछ बाजार से खरीद कर खाना पड़ रहा है और मिलावटी खाद्यान्न पदार्थ खाने का ही परिणाम है कि अब गांवों में भी शुगर और कैंसर के मरीज पाये जाने लगे हैं। गन्ना 12 महीने की फसल है, एक साल में एक खेत में एक बार ही गन्ने की फसल होती है और गन्ना ऐसी फसल है जिसे किसान काट कर अपने घर में भी नहीं रख सकता, गन्ना जितना भी पैदा होगा वह शुगर मिलों की सम्पत्ति बन जाती है जबकि गन्ने के स्थान पर एक वर्ष मंे किसान उड़द, मंूग, मूंगफली, लोभिया, ज्वार, बाजरा, गेंहू, धान, सरसों, तिल इत्यादि की कई फसलें ले सकता है। रवि, खरीफ और जायद तीनों फसलों को समाप्त कर कृषि भूमि पर अब गन्ना उत्पादन का क्षेत्रफल बढ़ता जा रहा है पूरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश गन्ना फोबिया से ग्रसित हो रहा है इसी क्षेत्र में सर्वाधिक शराबी और बीमार व्यक्ति हैं तथा इसी क्षेत्र में बड़े-बड़े अस्पताल ;निजी चिकित्सालयद्ध खुल गए हैं। एन.सी.आर. में महंगे इलाज वाले अस्पतालों की संख्या पूरे देश की तुलना में सर्वाधिक है। गन्ना उत्पादन की वृद्धि का ही दुष्परिणाम है कि कभी दालें दो सौ रुपये प्रति किलो पार कर जाती हैं तो कभी टमाटर और प्याज बाजार से गायब हो जाता है। मोटे अनाज मक्का, ज्वार-बाजरा इत्यादि पहले ही गायब हो चुके हैं कुछ लोग शौक के लिए कभी-कभी मक्की या बाजरे के आटे का प्रयोग करते हैं। देश और समाज को बर्बादी से बचाने के लिए किसान को अब स्वयं पहल करनी होगी। अन्यथा कोई भी सरकार शुगर मिलों को बंद नहीं करवायेगी वह तो किसानों की बकाया राशि भुगतान के लिए चीनी मिलों को बिना ब्याज के मोटी रकम देती है और बदले में राजनेता मिल मालिकों से चुनावी चंदा वसूलते हैं, किसान अपना औ.र देश का भविष्य स्वयं सुधारें।
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