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संविधान का सम्मान करना सरकार का नैतिक दायित्व


भारत का संविधान समानता, सामजिक समरसता और राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता का संदेश देता है। हमारे देश का संवैधानिक ढांचा कई लोकतांत्रिक देशों के संविधानों का सार ग्रहण करने के बाद तैयार किया गया है। देश को सर्वोपरि रखने के लिए देश के संविधान का सम्मान करना देश के सभी नागरिकों, जन प्रतिनिधियों एवं लोकसेवकों का दायित्व होता है और इन दायित्वों का निर्वाह निष्ठा एवं ईमानदारी से किया जाये इसीलिए सत्ता संचालन के लिए संवैधानिक पद और संवैधानिक संस्थाओं की स्थापना भी की गई है। जिस प्रकार राष्ट्र की सत्ता के संचालन के लिए संविधान की आवश्यकता होती है उसी प्रकार व्यक्ति के जीवन को स्वस्थ एवं चिरायु रखने के लिए प्राकृतिक दिनचर्या की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार देश की साठ प्रतिशत आबादी ने अपनी दिनचर्या को अप्राकृतिक बनाकर स्वयं को नाना प्रकार की बीमारियों की गिरफ्त में फंसा लिया है उसी प्रकार हमारे देश के सत्तर प्रतिशत राजनेता एवं ब्यूरोक्रेट्स ने अपने नैतिक दायित्वों से विरत जाकर देश की संवैधानिक व्यवस्था को बिगाड़ कर विसंगति प्रधान बना दिया है जिसने देश की संवैधानिक व्यवस्था गड़बड़ाने लगी है। आज आवश्यकता है व्यक्ति को अपनी दिनचर्या सुधारने की और राजनेता एवं ब्यूरोक्रेट्स को संविधान का सम्मान कर अपने नैतिक दायित्वों का निर्वाह करने की।
राजसत्ता के संचालन में संवैधानिक व्यवस्था का सम्मान करना आवश्यक होता है लेकिन व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए राष्ट्रहित का ध्यान रखते हुए कुछ कठोर निर्णय भी लेने पड़ते हैं लेकिन निर्णय सारे कठोर हों, जनता की आमदनी छीन ली जाये और उस पर करों की भरमार कर दी जाये, अधिकारियों पर दवाब देकर गलत कार्य कराये जायें और बाद में उनकी जांच कराकर नौकरी छीनने जैसे फरमान जारी हों। संवैधानिक संस्थाओं का सत्ता के दुरुपयोग और संविधान के समानान्तर अलग नीतियां लागू करना स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध होता है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए विपक्ष का मजबूत होना जरुरी होता है लेकिन जब विपक्ष नाम की चीज ही समाप्त कर दी जाये और स्पष्ट रुप से यह घोषणा कर दी जाये कि सत्ता पक्ष एक पार्टी विशेष विहीन भारत बनाना चाहता है तो इसका स्पष्ट रुप से यही अर्थ निकाला जाना चाहिए कि जब विपक्ष समाप्त हो गया तो समझो कि लोकतंत्र समाप्त हो गया। क्या लोकतंत्र को समाप्त कर स्वस्थ, समृद्ध और स्वतंत्र राष्ट्र की कल्पना की जा सकती है? यदि नहीं तो फिर कहां गयीं वे संवैधानिक संस्थायें और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति जो यह सोचें कि उनकी सेवा में जनता का कितना धन प्रतिदिन व्यय होता है और उसके बदले में वे देश को क्या दे रहे हैं। संवैधानिक पदों पर किसी प्रकार की उंगली नहीं उठायी जा सकती यह भी संवैधानिक बाध्यता है लेकिन उन्हें कर्तव्य बोध तो कराया जा सकता है ताकि वे स्वयं संज्ञान लेकर किसी व्यक्ति या पार्टी के एजेन्ट के रुप में कार्य न करते हुए राष्ट्र और समाजहित के कार्य करें। मैं किसी राजनेता अथवा पार्टी विशेष की कार्यशैली पर कटाक्ष नहीं करना चाहता लेकिन सत्तारुढ़ दल की तरफ किस कदर राजनेताओं का पलायन होता है और सरकारी कर्मचारी, अधिकारी किस प्रकार अपने दायित्व को दरकिनार कर सत्ता पक्ष के सिपहसालार बन जाते हैं यह सब स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा खड़ा कर रहे हैं।
देश की सत्तर प्रतिशत आबादी से सरकारी व्यवस्था के बाबत किए गए सर्वे से यह तथ्य निकल कर सामने आये हैं कि अब सरकार का गठन करने के लिए आम जनता की सहभागिता की आवश्यकता नहीं रह गयी इससे स्पष्ट हो रहा है कि देश की जनता भी अपने मताधिकार रुपी शक्ति को खो चुकी है और हमारे प्रधानमंत्री महोदय ने यह कहकर देश की जनता को चाैंका दिया कि अगले चुनाव में सभी सांसद अपने बूते जीतकर लोकसभा में आयें इससे कुछ ऐसा आभास हो रहा है कि अब तक 2014 एवं 2019 में जो सांसद जीते हैं वे स्वयं की लोकप्रियता से नहीं केवल और केवल नरेन्द्र मोदी नामक व्यक्ति के नाम पर चुनकर लोकसभा में आये हैं जैसा कि चुनाव प्रचार में भी मोदी जी ने कहा कि आप सांसद नहीं प्रधानमंत्री चुने और मेरे नाम पर मतदान करें।

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