केन्द्र में मोदी सरकार की दूसरी पारी है और पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी कठोर निर्णय लेने के लिए जाने जाते हैं। जिस प्रकार इन्दिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर लोगों को चौंका दिया था उसी प्रकार नरेन्द्र मोदी ने भी नोटबंदी और कश्मीर से धारा 370 हटाकर पूरे विश्व में सनसनी फैला दी है। 1975 का आपातकाल और 2016 की नोटबंदी दोनों ही निर्णय दोनों नेताओं ने अपने सशक्त होने का एहसास कराने के लिए लिए थे। तीन तलाक बिल पास कराना एक धर्म विशेष से सम्बन्धित है तो कश्मीर का विभाजन और 370 धारा का हटना भी देश की किसी प्रगति के लिए उठाया गया कदम नहीं कहा जा सकता है जिस प्रकार इन्दिरा गांधी ने बंगलादेश को अलग देश बनाकर पाकिस्तान को तगड़ा झटका दिया था उसी प्रकार नरेन्द्र मोदी ने कश्मीर से धारा 370 हटाकर पाक को इतना तगड़ा झटका दिया कि उसकी आंखें तिलमिला गयीं और दिन में तारे नजर आने लगे। परिणाम स्वरुप बीते वर्षों की तुलना में इस वर्ष 15 अगस्त पर विशेष सतर्कता बरतनी पड़ी। जिस प्रकार इन्दिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर भारत को नेता विहीन बना दिया था उसी प्रकार नरेन्द्र मोदी ने कश्मीर सहित पूरे देश तथा सभी दलों के नेताओं को उनकी औकात बता दी है।
देश की आजादी में जिन दलों का योगदान रहा उन्होंने छः दशक तक निर्बाध गति से देश की सत्ता का रसास्वादन किया और राष्ट्र तथा समाज की प्रगति के आयाम भी स्थापित किए। उन्होंने प्रचार में विश्वास न रखकर काम करने में अधिक दिलचस्पी ली परिणाम स्वरुप छः दशक में जो कार्य हुए उन्होंने भारत की दस प्रतिशत आबादी को विकसित और साठ प्रतिशत को विकासशील की श्रेणी में ला दिया। देश की तीस प्रतिशत आबादी आज भी जीवनयापन करने के लिए कठोर श्रम करती है। हमारे देश की जनता पुरुषार्थी है वह किसी भी सरकार पर अपनी प्रगति के लिए अधिक भार नहीं डालती बल्कि राष्ट्र की प्रगति का वास्ता देकर केन्द्र या राज्य सरकार जनता पर जितने भी करों का भार डालती है जनता उसे सहर्ष स्वीकार करती है अब यह निर्णय सरकार का होता है कि वह कितने कर थोपे और कितनी सहूलियतंे दे।
केन्द्र सरकार की यह दूसरी पारी है और मोदी सरकार जिन राष्ट्रहित के अहम मुद्दों के लेकर सत्ता में आयी थी उनमें जो भी विकास से जुड़े वे सब गायब हो गये उनके स्थान पर नए-नए अध्याय जुड़ते चले गए। अपने सत्ता में आने वाले एजेन्डे के रुप में केवल धारा 370 ही है शेष सब भुला दिए गए बल्कि कुछ मुद्दों पर तो विपरित कार्य हुआ है। जिस बड़े मुद्े पर विपरित कार्य हुआ वह कालाधन है। विदेशों में जमा कालाधन भारत लाने की बात हुई थी उसे भुला कर भारत का सफेद धन कितनी बड़ी मात्रा में लेकर कुछ लोग विदेश भाग गए जबकि बड़े-बड़े आंकड़ों में से एक चवन्नी भी भारत नहीं आयी। भारत का समाजसेवी जो राष्ट्रहित के मुद्दों पर अनशन करता था वह अब स्वयं को बीमार बता रहा है तो जो बाबा अपने योग शिविरों में कालेधन का आंकड़ा देता था आज उसकी हैसियत देश में जाने-माने धन्ना सेठों में है।
प्रत्येक सरकार का काम करने का अपना अलग तरीका होता है, इससे पूर्ववर्ती सरकारों का काम करने का ढंग दूसरा था इस सरकार का अपना अलग ही तरीका है। तीन तलाक हो या लद्दाख-कश्मीर, नोटबंदी हो या जीएसटी, इन निर्णयों को देश के विकास से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है। कहते हैं कि कलियुग प्रचार का युग है और इस युग में अपना प्रचार स्वयं करना पड़ता है अपना प्रचार करने के लिए प्रचार माध्यमों को अपना बनाना पड़ता है सो बना लिया गया। जनता के सामने जैसा प्रचार होगा वह उसी पर विश्वास करेगी, जो प्रचार में नहीं है वह समाप्त समझा जाता है लेकिन आजकल उल्टा हो रहा है सरकार तो अपना प्रचार करती ही है विपक्षी भी आलोचना की दृष्टि से सरकार का ही प्रचार करता है। देश की जनता आज विकास की वाट जोह रही है लेकिन सरकार है कि नित नए-नए मुद्दों में उसे उलझा कर विकास की तरफ से उसका ध्यान इस प्रकार हटा दिया कि अब विकास की बात ही कोई नहीं करता है। देश की जनता का धन से वास्ता छूट रहा है और सरकार के पास सारा खजाना एकत्र हो रहा है धन एकत्र होता तो दिखायी दे रहा लेकिन खर्च कहां हो रहा यह जानने के लिए जनता उत्सुक है।
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