हरिद्वार में प्रतिवर्ष लगने वाले कांवड़ मेले की दुश्वारियां प्रतिवर्ष बढ़ती ही जा रही हैं परिणाम स्वरुप पैदल आने वाले कांवड़ यात्रियों की संख्या में इस वर्ष अपेक्षाकृत काफी कमी देखी गई। पूरे कांवड़ मेले के दौरान स्नान करते समय डूब कर, वाहन से कुचल कर या चट्टान इत्यादि गिरने से लगभग तीस कांवड़ यात्रियों की मृत्यु हो गयी सभी उत्तराखण्ड से बाहर के थे इसलिए किसी को मुआवजे के रुप में फूटी कौड़ी नहीं दी गई। कांवड़ियों के कई वाहन क्षतिग्रस्त हुए तो आधा दर्जन वाहनों में आग लगने से वे भस्म हो गए। कांवड़ यात्रियों ही नहीं बल्कि पत्रकारों को भी ड्यूटी पर तैनात पुलिस ने अपनी लाठियों का निशाना बनाया इसके बाद भी मेला सकुशल सम्पन्न होने के समाचार छपवाकर खूब अपनी पीठ थपथपायी। पंचपुरी में 15 दिन तक जन जीवन अस्त-व्यस्त रहा और स्कूलों में घोषित अवकाश के बाद अन्य सभी सरकारी कार्यालयों में कांवड़ ड्यूटी बताकर अघोषित अवकाश का वातावरण रहा जबकि जल चढ़ने के बाद आराम करने और थकान मिटाने का भी अवकाश दिया गया इसके वे सभी कर्मचारी हकदार भी हैं।
केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकार और कांवड़ मेले में आने वाले पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, यूपी, राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के सभी नेता तथा अधिकारी भलीभांति जानते हैं कि हरिद्वार कांवड़ मेले के आयोजन हेतु किन-किन व्यवस्थाओं की आवश्यकता है लेकिन व्यवस्था बनाना उस राज्य सरकार का दायित्व होता है जिस राज्य में वह मेला आयोजित होता है। कांवड़ मेले का सम्पूर्ण दायित्व उत्तराखण्ड सरकार का है जो राज्य निर्माण के 19 वर्ष बीतने के बाद भी इस मामले को लेकर कभी संवेदनशील नहीं दिखी क्योंकि राज्य सरकार के साथ ही स्थानीय व्यापारी, कांवड़ निर्माता चाय एवं भोजन व्यवस्था से जुड़े लोग बड़ी कमाई करते हैं। कांवड़ मेला अकेले हरिद्वार में ही कई अरब का व्यापार देकर जाता है भले ही गन्दगी एवं अव्यवस्था होती हो लेकिन कमाई चोखी होने पर सारी परेशानियां गूढ़ हो जाती हैं। ‘गंगा का संदेश’ प्रतिवर्ष और यदा-कदा इन मेलों की व्यवस्था हेतु स्थायी प्रबन्ध करने की मांग करता रहता है।
आगामी वर्ष 2021 में सम्पन्न होने जा रहे कुम्भ पर्व से पूर्व 2020 में पुनः कांवड़ मेला आयेगा जो उस अवधि में होगा जब कुम्भ मेले की तैयारियां जोरों पर चल रही होंगी क्या फिर तैयारियों का वास्ता देकर जिला प्रशासन अपना पल्ला यों ही झाड़ लेगा जैसा इस बार हुआ है। कई वर्षों के बाद यह पहला कांवड़ मेला है जिसमें बड़े स्तर पर जनहानि और धनहानि हुई है लेकिन शासन और प्रशासन स्तर पर कोई टिप्पणी न होना यहां की राज्य सरकार की संवेदनहीनता को प्रदर्शित करती है। पार्किंग, प्रसाधन और प्रश्रय कांवड़ मेले की तीन बड़ी समस्यायें और तीनों का समाधान सरलतापूर्वक किया जा सकता है। राज्य सरकार के साथ ही शासन और प्रशासन तीनों को भली भांति यह ज्ञान हो चुका है कि कांवड़ यात्रियों के लिए न तो पार्किंग व्यवस्था है और न ही प्रसाधन की परिणाम स्वरुप बड़ी मात्रा में गंदगी होती है और अव्यवस्थायें इतनी कि साल दो साल में सुधार नहीं हुआ तो 2025 के बाद श्रावण मास का कांवड़ मेला केवल और केवल एक यादगार के रुप में जाना जायेगा।
इतना ही नहीं कुम्भ एवं अर्द्धकुम्भ जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों को जिस प्रकार राजनेता, अधिकारी और अखाड़े मिलकर लगभग दो दशक से अपनी कमाई का साधन मात्र मान रहे हैं और केन्द्र तथा राज्य सरकार से मिलने वाली बड़ी धनराशि को स्थायी व्यवस्था में न लगाकर यह कहकर टाल देते हैं कि हमें तो मेला सम्पन्न कराने का दायित्व सौंपा गया था सो हमने पूरा कर दिया अब भविष्य की व्यवस्था के बारे में भविष्य में आने वाले अधिकारी सोचें। लेकिन ऐसा नहीं है ये अधिकारी भविष्य की कोई प्लानिंग नहीं करते क्योंकि भविष्य में आयोजित होने वाले चाहे कांवड़ मेले हो या अर्द्धकुम्भ अथवा कुम्भ अनुभवी अधिकारी के रुप में उन्हीं अधिकारियों को दोबारा कमान सौंप दी जाती है जिन्होंने पिछले मेलों में मनमानी, लीपापोती की थी। केन्द्र सरकार की यह दूसरी पारी है वह कुम्भ तथा अर्द्धकुम्भ सभी मेलों की व्यवस्था देख चुकी है उसे भी अपने पुराने अनुभव के आधार पर बजट देना और उसका हिसाब लेना चाहिए।
केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकार और कांवड़ मेले में आने वाले पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, यूपी, राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के सभी नेता तथा अधिकारी भलीभांति जानते हैं कि हरिद्वार कांवड़ मेले के आयोजन हेतु किन-किन व्यवस्थाओं की आवश्यकता है लेकिन व्यवस्था बनाना उस राज्य सरकार का दायित्व होता है जिस राज्य में वह मेला आयोजित होता है। कांवड़ मेले का सम्पूर्ण दायित्व उत्तराखण्ड सरकार का है जो राज्य निर्माण के 19 वर्ष बीतने के बाद भी इस मामले को लेकर कभी संवेदनशील नहीं दिखी क्योंकि राज्य सरकार के साथ ही स्थानीय व्यापारी, कांवड़ निर्माता चाय एवं भोजन व्यवस्था से जुड़े लोग बड़ी कमाई करते हैं। कांवड़ मेला अकेले हरिद्वार में ही कई अरब का व्यापार देकर जाता है भले ही गन्दगी एवं अव्यवस्था होती हो लेकिन कमाई चोखी होने पर सारी परेशानियां गूढ़ हो जाती हैं। ‘गंगा का संदेश’ प्रतिवर्ष और यदा-कदा इन मेलों की व्यवस्था हेतु स्थायी प्रबन्ध करने की मांग करता रहता है।
आगामी वर्ष 2021 में सम्पन्न होने जा रहे कुम्भ पर्व से पूर्व 2020 में पुनः कांवड़ मेला आयेगा जो उस अवधि में होगा जब कुम्भ मेले की तैयारियां जोरों पर चल रही होंगी क्या फिर तैयारियों का वास्ता देकर जिला प्रशासन अपना पल्ला यों ही झाड़ लेगा जैसा इस बार हुआ है। कई वर्षों के बाद यह पहला कांवड़ मेला है जिसमें बड़े स्तर पर जनहानि और धनहानि हुई है लेकिन शासन और प्रशासन स्तर पर कोई टिप्पणी न होना यहां की राज्य सरकार की संवेदनहीनता को प्रदर्शित करती है। पार्किंग, प्रसाधन और प्रश्रय कांवड़ मेले की तीन बड़ी समस्यायें और तीनों का समाधान सरलतापूर्वक किया जा सकता है। राज्य सरकार के साथ ही शासन और प्रशासन तीनों को भली भांति यह ज्ञान हो चुका है कि कांवड़ यात्रियों के लिए न तो पार्किंग व्यवस्था है और न ही प्रसाधन की परिणाम स्वरुप बड़ी मात्रा में गंदगी होती है और अव्यवस्थायें इतनी कि साल दो साल में सुधार नहीं हुआ तो 2025 के बाद श्रावण मास का कांवड़ मेला केवल और केवल एक यादगार के रुप में जाना जायेगा।
इतना ही नहीं कुम्भ एवं अर्द्धकुम्भ जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों को जिस प्रकार राजनेता, अधिकारी और अखाड़े मिलकर लगभग दो दशक से अपनी कमाई का साधन मात्र मान रहे हैं और केन्द्र तथा राज्य सरकार से मिलने वाली बड़ी धनराशि को स्थायी व्यवस्था में न लगाकर यह कहकर टाल देते हैं कि हमें तो मेला सम्पन्न कराने का दायित्व सौंपा गया था सो हमने पूरा कर दिया अब भविष्य की व्यवस्था के बारे में भविष्य में आने वाले अधिकारी सोचें। लेकिन ऐसा नहीं है ये अधिकारी भविष्य की कोई प्लानिंग नहीं करते क्योंकि भविष्य में आयोजित होने वाले चाहे कांवड़ मेले हो या अर्द्धकुम्भ अथवा कुम्भ अनुभवी अधिकारी के रुप में उन्हीं अधिकारियों को दोबारा कमान सौंप दी जाती है जिन्होंने पिछले मेलों में मनमानी, लीपापोती की थी। केन्द्र सरकार की यह दूसरी पारी है वह कुम्भ तथा अर्द्धकुम्भ सभी मेलों की व्यवस्था देख चुकी है उसे भी अपने पुराने अनुभव के आधार पर बजट देना और उसका हिसाब लेना चाहिए।
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