धर्म एवं संस्कृति से समाज का संवर्द्धन होता है और धार्मिक पर्व ही व्यक्ति को संस्कारित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। संस्कारित जीवन व्यक्ति को सुख, समृद्धि और शांति प्रदान करता है तथा सनातन धर्म पर्वों का सबसे बड़ा गुलदस्ता है जो वर्ष पर्यन्त व्यक्ति को सत्कर्म की प्रेरणा देता रहता है यही कारण है सनातन धर्म के अनुयायी सम्पूर्ण सृष्टि में सुखी एवं शान्त स्वभाव के होते हैं। हरिद्वार में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला श्रावण मास का कांवड़ मेला समाज में समरसता, सम्भाव एवं आर्थिक समानता लाने का सबसे बड़ा पर्व है जो समाज के सभी वर्गों में श्रद्धा, उत्साह एवं स्वरोजगार के साधन सृजित कर निराश व्यक्ति में भी आशा की किरणों का संचार कर देता है। समाज यदि सनातन धर्म के पर्वों की प्रधानता को स्वीकार कर ले तो किसी भी उद्योग या सरकार से रोजगार के लिए याचना ही नहीं करनी पड़ेगी।
उत्तराखण्ड राज्य धर्म, संस्कृति एवं प्राकृतिक संसाधनों के लिए विश्व का सबसे धनी राज्य है, यहां की राज्य सरकार यदि धर्म, पर्यटन, आयुष एवं ऊर्जा के क्षेत्र में कार्य प्रारम्भ कर दे तो यह राज्य धरती का स्वर्ग और विश्व का सर्वाधिक सम्पन्न राज्य बन सकता है, लेकिन राज्य बनने के 19 वर्ष बीतने के बाद भी यहां की कार्यपालिका और विधायिका ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया। नया राज्य बनने के बाद यहां एक कुम्भ और दो अर्द्धकुम्भ सम्पन्न हो चुके हैं जबकि दूसरे कुम्भ महापर्व आयोजन की व्यवस्थायें प्रारम्भ होने वाली हैं और प्रतिवर्ष श्रावण मास में आयोजित होने वाले कांवड़ मेले भी किसी अर्द्धकुम्भ से कम नहीं होते हैं। उत्तराखण्ड राज्य और विशेषकर हरिद्वार भारत का एकमात्र शहर है जहां देश के अन्य शहरों की तुलना में सर्वाधिक यात्री एवं पर्यटक आते हैं लेकिन यहां के राजनेता एवं अधिकारी आज तक कोई स्थायी व्यवस्था नहीं बना पाये, केवल तत्कालिक व्यवस्थायें बनाकर केन्द्र एवं राज्य सरकार से मिलने वाली धनराशि का बंदरबांट कर लेते हैं। राज्य निर्माण के बाद यहां क्रियान्वित होने वाली कोई भी ऐसी योजना नहीं है जिसमें भ्रष्टाचार या बंदरबांट न हुआ हो अनेकों खुलासे हो चुके हैं तो अनेकों जांचें ठण्डे बस्ते में चली गयी हैं। भारत की सात मोक्षपुरियों में हरिद्वार का स्थान सर्वोपरि है और यह विश्व का पहला धार्मिक स्थान हैं जहां आने वाला व्यक्ति स्वयं को धन्य और पाप तथा संताप से मुक्त समझता है। यहां गंगा की पवित्रता के नाम पर और धार्मिक पर्वों की व्यवस्था के नाम पर लूट खसोट का जो खुला खेल होता है उसका सम्पूर्ण विश्व में गलत संदेश जाता है और धर्म के नाम पर धन बटोरने वालों का अंत बहुत बुरा होता है इसके अनेकों उदाहरण मिल चुके हैं। नया राज्य निर्माण के बाद यह 19वां कांवड़ मेला है जो लगातार अव्यवस्थाओं में हुआ है, आज तक किसी भी अधिकारी ने ऐसा कोई प्रस्ताव राज्य सरकार अथवा केन्द्र सरकार के पास नहीं भेजा कि कांवड़ मेले को स्थायी व्यवस्थाओं की आवश्यकता है यही कारण है कि पैदल आने वाले कांवड़ यात्रियों की संख्या में अब कमी आने लगी है जबकि डाक कांवड़ के नाम से जानी जाने वाली दो पहिया एवं चार पहिया वाहनों वाली यात्रा में अब लगातार वृद्धि हो रही है फिर भी वाहनों के आवागमन एवं पार्किंग की जिला प्रशासन के पास कोई व्यवस्था नहीं है, भोले के भक्त हैं तो भोलेनाथ ही उनकी व्यवस्था भी करते हैं। जिस प्रकार मां गंगा अपनी स्वच्छता के लिए किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार की मोहताज नहीं है वह प्रतिवर्ष वर्षा )तु में अपनी स्वच्छता स्वयं करती है और अपने तटों की समस्त गंदगी बटोर कर समुद्र में डाल देती है उसी प्रकार भोले के भक्तों की शौच कर्म एवं वाहन पार्किंग की व्यवस्था भी भगवान भरोसे ही है। यह कार्य किसी इंसान के भरोसे नहीं है बल्कि इस कार्य को कई देवता मिलकर करते हैं। करोड़ों की संख्या में आने वाले कांवड़ यात्री लाखों टन मल खुले में त्यागते हैं जिसे देवर्षि इन्द्र की कृपा से वर्षा के माध्यम से बहाया जाता है और वह मल भी मां गंगा स्वयं में समेट कर हरिद्वार को स्वच्छ बनाती है क्योंकि भगवान भोलेनाथ स्वयं एक माह तक हरिद्वार में रहकर सृष्टि का संचालन करते हैं।
कुम्भ, अर्द्धकुम्भ एवं प्रतिवर्ष लगने वाले कांवड़ मेलों के सफल आयोजन हेतु हरिद्वार में स्थायी पार्किंग एवं शौचालय बनाने की आवश्यकता है जिस पर आज तक किसी सरकार अथवा प्रशासनिक अधिकारी ने काम नहीं किया। हरिद्वार का कांवड़ मेला भले ही अव्यवस्थाओं से गुजर रहा हो लेकिन कुम्भ 2021 से एक वर्ष पूर्व 2020 में पुनः कांवड़ मेला आयेगा जिसके लिए कुम्भ बजट से स्थायी निर्माण कार्य होने चाहिए। कुम्भ 2021 के लिए कुंभ मेलाधिकारी के रुप में दीपक रावत की नियुक्ति हो चुकी है। उन्हांेने हरिद्वार रूड़की विकास प्राधिकरण, डीएम कैम्प कार्यालय तथा मेला नियंत्रण कक्ष सभी पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है लेकिन कुंभ व्यवस्थाओं के नाम पर अब तक केवल कुछ संतों से मिलकर तत्कालिक व्यवस्थाएं बनाने की ही योजना है जबकि नियमानुसार कुम्भ बजट के अस्सी प्रतिशत कार्य स्थायी निर्माण होने चाहिए तभी व्यवस्थायें बन पायेगी। कुछ संतों ने तो पूर्ण कुम्भ की तर्ज पर अपने-अपने अखाड़े एवं मंदिरों के जीर्णोद्धार की योजनायें तैयार कर मेलाधिकारी को सौंप दी हैं। केन्द्र एवं राज्य सरकार का क्या निर्णय होगा यह भविष्य की बात है।
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