हरिद्वार से श्रावण मास में चलने वाली कांवड़ यात्रा समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता को समाप्त करने वाला सबसे बड़ा अनुष्ठान है जिसमें यूपी, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब तथा मध्य प्रदेश से आने वाले लगभग दो करोड़ कांवड़ यात्री हरिद्वार सहित सम्पूर्ण यात्रा मार्ग में लगभग तीस अरब रुपये का पंूजी निवेश करते हैं और ये समस्त कांवड़ यात्री भारत के आरक्षित वर्ग के होते हैं। हरिद्वार में दस हजार से अधिक कांवड़ यात्रियों पर किए गए सर्वे में यह तथ्य सामने आये हैं कि कांवड़ यात्रा में 98 प्रतिशत यात्री अन्य पिछड़ा एवं अनुसूूचित जाति के हैं। प्रस्तुत आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है कि तप, त्याग, सामाजिक एकता तथा आर्थिक समरसता बनाने में इस वर्ग का सबसे बड़ा योगदान है। योगदान उस समुदाय का भी कम नहीं है जिसने देश के सबसे बड़े वर्ग को धर्म और समाज की सेवा करने के लिए तन, मन और धन लगाकर समर्पित होने की प्रेरणा दी।
हरिद्वार से कांवड़ लेकर अपने-अपने शिवालयों तक पहुंचने में प्रत्येक कांवड़ यात्री पांच सौ से पांच हजार रुपये व्यय करता है कुछ सजावटी कांवड़ों पर यह व्यय लगभग दस हजार रुपये प्रति व्यक्ति भी हो जाता है लेकिन पांच सौ रुपये से कम का खर्चा किसी भी कांवड़ यात्री का नहीं होता है। समस्त कांवड़ यात्रियों का औसत व्यय डेढ़ से दो हजार रुपये प्रति व्यक्ति आता है जिसे वे अपनी पवित्र कमाई में से प्रतिवर्ष कांवड़ यात्रा पर खर्च करते हैं। कांवड़ यात्रा धार्मिक एकता एवं परस्पर संभाव बनाने का सबसे बड़ा माध्यम है, जितनी भी कांवड़ बनती है सभी को हमारे मुस्लिम भाई बनाते हैं और हिन्दू भाई बेचते हैं। इस कार्य में हरिद्वार तथा उसके निकटवर्ती बिजनौर, सहारनपुर एवं मुजफ्फरनगर के मुस्लिम भाइयों का बड़ा योगदान रहता है और यह उनकी आजीविका का माध्यम भी है। कई परिवार तो ऐसे भी हैं जो कांवड़ बनाने की कमाई से ही वर्ष पर्यन्त आजीविका चलाते हैं। कांवड़ यात्रा विश्व की सबसे बड़ी धार्मिक यात्रा है जिसमें श्रद्धालु औसतन 50 से 500 किमी0 तक की यात्रा पैदल चलकर तय करता है। आर्थिक समरसता के लिए बनायी गई कांवड़ यात्रा पर अब चीन की नजरें लग गयी हैं और कांवड़ की सजावट सहित अनेक ऐसे आइटम आ गए हैं जो चायना निर्मित हैं और कांवड़ निर्माण में उपयोग में लाये जाते हैं।
कांवड़ यात्रा के पीछे कुछ धार्मिक मान्यतायें हैं तो इसके कुछ वैज्ञानिक कारण भी हैं जिनके आधार पर धर्म, संस्कृति, समाज और देश को स्वस्थ बनाये रखना है तो कांवड़ यात्रा का संरक्षण करना होगा। हमारे ऋषि मुनियों ने कुछ ऐसे मंत्रों एवं जयकारों का सृजन किया है जिनके उच्चारण मात्र से व्यक्ति की अर्न्तशक्ति ऊर्द्धगामी हो जाती है जो न केवल उसका मनोबल बढ़ाती है बल्कि ऐसी शक्ति का संचार करती है जिससे पैदल यात्रा का दर्द ही गायब हो जाता है। भले ही गंगा स्वच्छता के नाम पर धन हड़पने वाले यह प्रचारित करते हों कि गंगा जल अब प्रदूषित हो गया है और आचमन के योग्य नहीं है लेकिन हरिद्वार के गंगा जल में आज भी वह शक्ति है जो आचमन से व्यक्ति को विकारों से मुक्त करता है, स्नान से तन एवं मन को शुद्धता प्रदान करता है तो कांवड़ यात्रा में गंगा जल के सानिध्य का ही प्रभाव होता है कि साधारण व्यक्ति में भी दो-तीन सौ किमी0 पैदल चलने की सामर्थ्य आ जाती है। यदि इस यात्रा का वैज्ञानिक विधि से विश्लेषण किया जाये तो भी इसे बड़े तप की श्रेणी में रखा गया है, शुद्धता और परिश्रम तथा निद्रा एवं क्षुधा का परित्याग कर जो भक्त 5 से 15 दिन तक श्रद्धा को समर्पित रहता है उसके शरीर से पसीने के रास्ते वे सभी दूषित पदार्थ बाहर निकल जाते हैं जो विभिन्न बीमारियों का कारण बनते हैं। स्थान परिवर्तन, खान-पान में संयम एवं शुद्धता के साथ व्यक्ति जब अपने उद्देश्य तक पहुंचने का प्रयत्न करता है तो निश्चित ही उसके मन में श्रम कर सफलता प्राप्त करने की इच्छाशक्ति बलवती हो जाती है। एक किवदन्ती है कि वर्षा के जल के साथ आसमान से अमृत बरसता है और इस अमृत जल से जो स्नान कर लेता है उसकी काया निरोगी हो जाती है इसकी पुष्टि विज्ञान भी करता है। वैज्ञानिक ही नहीं देश का किसान भी जानता है कि उसकी फसल को जितना लाभ वर्षा के जल से होता है उतना ट्यूबबेल के जल से नहीं, यही कारण है कि कांवड़ यात्रा में सम्मिलित होने वाले सभी श्रद्धालुओं पर भगवान भोलेनाथ, प्रकृति और समाज सभी की कृपा बरसने लगती है और भोले का भक्त कभी मायूस नहीं होता।
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