भारतवर्ष को आजाद हुए सात दशक पूर्ण हो चुके हैं, आजादी के छः दशक तक चले सरकारी कामकाज को जनता ने बर्दाश्त भी किया, सराहा भी और आलोचना भी की। जनता की आवाज सरकार तक पहुंची भी और सरकार ने सुनकर उस पर गौर भी किया कुल मिलाकर 2014 से पूर्व बनी सभी सरकारों पर जनता का यथावत विश्वास रहा और सरकारों ने भी लोकतांत्रिक ढं़ग से शासन व्यवस्था का संचालन करते हुए जन समस्याओं का समाधान भी किया और विपक्ष तथा जनता की आवाज भी सुनीं। इससे पूर्व भी कई बार ऐसी स्थिति आयी कि विपक्ष नाम की चीज समाप्त हो गयी थी लेकिन सरकार ने संवैधानिक व्यवस्था के अनुरुप कार्य किया। ईवीएम को यदि नकार दें तब भी यह जनता का अधिकार है कि वह कितनी सशक्त सरकार बनाये और सरकार का धर्म होता है कि वह जन भावनाओं का सम्मान करे। सन् 1984 में हुई इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस को इतनी बड़ी सहानुभूति मिली थी कि विपक्ष का सफाया हो गया था लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने देश, संविधान, जनता और विपक्ष का पूरा सम्मान किया था।
2014 में आयी कथित मोदी लहर जो मात्र प्रचारित की गई थी वास्तव में थी नहीं, सब खेल पूंजीपतियों का था और उन्होंने यह बता दिया कि धनबल के आधार पर देश की सत्ता पर कैसे कब्जा किया जाता है और कब्जा हो जाने के बाद देश की जनता विपक्ष और संवैधानिक संस्थाओं पर कैसे तानाशाही थोपी जाती है यह वर्तमान व्यवस्था इसकी प्रमाण है। आज न तो संविधान का सम्मान हो रहा न ही संवैधानिक संस्थाओं का। न तो जनता की आवाज सुनी जा रही न ही विपक्ष की, बल्कि नारा दिया गया है हमें विपक्ष विहीन तथा कांग्रेस विहीन भारत बनाना है उसका अर्थ क्या होता है यह अभी तक जनता की समझ में नहीं आया। देश की जनता और विपक्ष किस स्थिति से गुजर रहा है ऐसा इससे पहले कभी देखने, सुनने या अनुभव करने को नहीं मिला।
देश में सबसे पहले आर्थिक आपात लागू कर सबकी जेबें ढीली करवा ली गईं और पूरी अर्थव्यवस्था को अपने कब्जे में ले लिया गया। इसके बाद जीएसटी जैसा कराधान लागू कर पूरे देश को निचोड़ लिया गया। देश के उत्पादों की दुगर्ति करने के लिए उनको सब्सिडी की श्रेणी में लाया गया जबकि विदेशी उत्पाद विशेषकर डीजल, पेट्रोल इत्यादि को प्रतिबंध से मुक्त कर गिने चुने पूंजपति तथा कम्पनियों को देश लूटने के लिए खुली छूट दे दी गई। डीजल, पेट्रोल हो या रसोई गैस किस ढंग से महंगे किए गए? जनता पर इतने कर थोप दिए कि वह कभी उन्नति की ओर अग्रसर हो ही नहीं सकती उन्नति करने का अधिकार लगभग पूरे देश के अधिकतम एक दर्जन घरानों को ही दिया गया है बाकी संचार का क्षेत्र हो या बैंकिंग का, ट्रेडिंग का हो या प्रोडक्शन का सभी पर एकाधिकार स्थापित किया जा रहा है। ओएनजीसी हो या बीएसएनएल, रेलवे हो या सड़क परिवहन ऐसा जाल बुन दिया गया है कि अब देश की जनता केवल और केवल सत्ता की गुलाम बनकर ही जीवित रह सकती है। शिक्षा, चिकित्सा एवं आवागमन का व्यवसायीकरण करने के बाद देश की जनता के सामने अभी से ऐसी स्थिति आ गयी है कि वह अपने ही देश की सड़कों पर बिना कर दिए चल नहीं सकती। सरकारी स्कूल में दाखिला लेना है तो निवास एवं जाति का प्रमाण पत्र देना होगा और प्रमाण पत्र बिना रिश्वत के बनता नहीं चाहे कोई भी हो। कोई भी सरकारी कर्मचारी चाहे किसी भी विभाग का हो खुलेआम रिश्वत मांगता है और बिना रिश्वत लिए कोई काम नहीं करता। कृषि उपज का पूरा मूल्य किसान को नहीं मिलता। सरकारी नौकरी के लिए आवेदन दो तो रुपये लगते हैं और नौकरी मिलती नहीं यदि नहीं एक व्यक्ति और उसका दल जो चाहेगा, आपसे कहलवायेगा यदि नहीं कहांेगे तो देशद्रोही माने जाओगे। भला यह कैसी आजादी और कैसी सरकार...?
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