हरिद्वार। राजनीति देश और प्रदेश पर शासन करने की नीति का नाम होता है यह न तो विरासत की सम्पत्ति हैं और न ही बच्चों का खेल जो कोई भी बाप अपने बच्चे को खिलौना समझ कर थमा दे और बच्चा उससे खेलने लगे। राजनीति जमीन से जुड़कर समाज से समन्वय बनाने वाले राजनेता को सम्मान देती है और वही सफल राजनेता बनता है। यदि पैत्रिक सम्पत्ति के समान ही राजनीति भी हस्तांतरित हो जाती तो राहुल-प्रियंका से बड़ा राजनैतिक परिवार किसी का नहीं है। राजनीति यदि बच्चों का खेल होता तो लालू प्रसाद यादव के लड़के, पूर्व प्रधानमंत्री चौ. चरण सिंह का बेटा-पोता, माधवराव सिंधिया के उत्तराधिकारी ज्योतिरादिव्य सिंधिया, कल्याण सिंह के पुत्र, अमित शाह के पुत्र, चन्द्रशेखर के पुत्र एन.टी. रामाराव के उत्तराधिकारी, हरीश रावत, विजय बहुगुणा और इन्दिरा हृदयेश के पुत्र, पं. गोविन्द बल्लभ पंत के उत्तराधिकारी, लाल बहादुर शास्त्री का परिवार सहित छोटे बड़े दर्जनों ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने अपनी दूसरी पीढ़ी को राजनैतिक विरासत सौंपी लेकिन वे सफल राजनेता नहीं बन पाये तो नेताजी का छोरा भी यदि असफल हो गया तो कोई अतिश्योक्ति नहीं है। हमारे देश ही नहीं बल्कि सृष्टि का नियम है कि सफलता उसी के हाथ लगती है जो जमीन से जुड़कर संघर्ष के माध्यम से तप करता है और उदाहरण आपके सामने है कि मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव ने किस स्तर से राजनीति का शुभारम्भ किया, नरेन्द्र मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी, मायावती हों या शरद पंवार, शरद यादव, नितीश कुमार हों या रामविलास पासवान, देवगौड़ा हों या मोराजी देसाई, बाबू जगजीवन राम और हेमवतीनन्दन बहुगुणा ये सभी अपने संघर्षों के आधार पर राजनेता बने। राजनीति में शिक्षा, संस्कार, समरसता और साम्यवाद का जब समन्वय बनता है तभी सफलता मिलती है। यदि किसी का बच्चा अच्छा राजनेता बनना चाहता है तो उसे कुछ दिन तक अपनी हिटलरशाही न चलाकर बड़ों का सम्मान और शगिर्दी करनी ही पड़ेगी क्योंकि बिना गुरु के कोई भी ज्ञान प्राप्त नहीं होता है। अपनी राजनैतिक विरासत सौंपते समय नेताजी से भी एक गलती हुई उन्होंने यदि पं. जवाहर लाल नेहरु से सबक लिया होता कि उन्होंने अपने रहते इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री नहीं बनाया परिणाम स्वरुप उनकी चार पीढ़ियों ने देश पर राज किया और अखिलेश राजनैतिक विरासत संभालने के बाद अपने नेतृत्व में एक भी चुनाव नहीं जीत पाये।
हरिद्वार। श्रीरामलीला कमेटी रजि. ने आज अपने रंगमंच से परस्पर सहयोग एवं मैत्री भावना के उस दृश्य का अवलोकन कराया जिसके तहत वो समस्याग्रस्त व्यक्ति यदि मैत्री भावना से एक-दूसरे का सहयोग करें तो दोनों के असंभव कार्य संभव हो जाते हैं और यदि कोई भक्त सच्ची भावना से भगवान का दर्शन करना चाहता है तो भगवान स्वयं उसके घर पर आकर दर्शन देते हैं। सुग्रीव मैत्री तथा शबरी राम दर्शन के दृश्यों का मंचन करते हुए श्रीरामलीला कमेटी ने दिखाया कि शबरी एक भील कन्या थी लेकिन भगवान राम का दर्शन करने की उसकी दिली इच्छा थी तो भगवान राम ने स्वयं उसकी कुटिया में जाकर दर्शन दिए तथा उसके झूठे बेर भी खाये। लक्ष्मण द्वारा शबरी के बेर न खाकर फेंकने पर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि दीनहीन व्यक्ति ही दीनानाथ का स्वरुप होता है और जो बेर उन्हांेने फेंके हैं वे ही संजीवनी बूटी के रुप में उनकी मूर्छा को दूर करेंगे। श्रीराम सुग्रीव मैत्री को रामलीला के सर्वाधिक प्रेरणादायी दृश्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए श्रीरामलीला कमेटी ने दर्शाया कि भगवान श्रीराम एवं सुग्रीव दोनों की समस्यायें समान थीं दोनों अपने-अपने राजपाट से वं...
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