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काल एवं परिस्थिति के अनुसार प्रत्येक युग में व्यवस्था बनाते हैं भगवान : स्वामी विज्ञानानन्द सरस्वती

हरिद्वार। गीता ज्ञान के मनीषी महामण्डलेश्वर स्वामी विज्ञानानन्द सरस्वतीजी महाराज ने कहा है कि सृष्टि का चक्र और भगवान का स्वभाव युग, समय और

परिस्थिति के अनुरुप बदलता है, प्रत्येक युग में भगवान की लीलाओं का स्वरुप बदल जाता है। कलियुग में अर्थ की प्रधानता रहती है जबकि सतयुग में धर्म का पक्ष मजबूत हो जाता है, वे आज दक्षनगरी के विष्णु गार्डन स्थित श्रीगीता विज्ञान आश्रम में धर्मनगरी में अध्यात्म दर्शन हेतु पधारे श्रद्धालुओं को गीता के उपदेशों का सार समझा रहे थे।
गीता को भगवान श्रीकृष्ण की वाणी बताते हुए उन्होंने कहा कि गीता भारत ही नहीं विश्व का सार्वभौमिक ग्रंथ है जिसमें जाति और धर्म से ऊपर उठकर सम्पूर्ण मानवता के कल्याण की बात कही गई है। देश एवं काल के अनुरुप बनायी जाने वाली सामाजिक व्यवस्था की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि त्रेता एवं द्वापर युग में तो भगवान श्रीहरि ने स्वयं मानवरुप में अवतार लेकर सृष्टि का कल्याण किया लेकिन कलियुग में वे स्वयं न आकर अपने प्रतिनिधि के रुप में समाज एवं देश की आवश्यकता के अनुरुप कार्य करने के लिए राजनेताओं का चयन करवाते हैं क्योंकि प्राचीनकाल में जो व्यवस्था राजाओं के हाथ में होती थी आज राजनेता संभाल रहे हैं। भारत के अन्य देशों के साथ चल रही प्रतिद्वन्दता को विकास की होड़ में आगे निकलने की प्रक्रिया बताते हुए कहा कि भारत में सर्वे भवन्तु सुखिनः के साथ सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की कामना की जाती है इसीलिए भारत की संस्कृति विश्व में सर्वश्रेष्ठ होने का गौरव प्राप्त करती है। उन्होंने गंगा तट पर अर्जित किए गए गीता एवं गायत्री के ज्ञान को सम्पूर्ण मानवता के लिए कल्याणकारी बताते हुए कहा कि माता और गुरु दो ही सच्चा आशीर्वाद प्रदान करते हैं इसीलिए गुरु के सानिध्य में आने से व्यक्ति का भाग्यफल प्रबल हो जाता है और उसकी नकारात्मक सोच में सकारात्मकता आने से कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। इस अवसर पर हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली से आये सैकड़ों श्रद्धालुओं ने गीता एवं गायत्री का सामूहिक जाप कर देश एवं विश्व कल्याण की कामना की।

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