हरिद्वार। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की पारिवारिक अर्न्तकलह को धिक्कारते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती ने सपा से अपना नाता तोड़ लिया है। इसी वर्ष 12 जनवरी से 4 जून लगभग साढ़े चार माह तक चले गठबंधन से बसपा लोकसभा में शून्य से दस सीटों तक पहुंची जबकि सपा सात से पांच पर सिकुड़ गई। इससे पूर्व 1993 में काशीराम एवं मुलायम सिंह यादव ने गठबंधन किया था जिससे भाजपा का राममंदिर मुद्दा भी फ्लाप हो गया था लेकिन हमारे देश में एक ऐसा समाज सक्रिय है जो दलित-पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों को एकजुट देखना नहीं चाहता वह गठबंधन भी 1995 में जून महीने की दो तारीख को ही टूटा था और इस बार भी गठबंधन तोड़ने जैसा संकेत मायावती ने दो जून को ही दे दिया था। उस समय सपा संगठित थी तो उसका कुछ नहीं बिगड़ा और लगातार बढ़त की ओर अग्रसर रही लेकिन इस बार पारिवारिक कलह से जूझ रही सपा अपने परिवार को भी नहीं बचा पायी और परिवार की कन्नौज, बदायूं तथा फिरोजाबाद की तीनों सीटों से हाथ धोना पड़ा, इसे सपा प्रमुख अखिलेश यादव की हठधर्मी और राजनैतिक अपरिपक्वता ही कहा जायेगा।
किसी भी बाप की विरासत उसके पुत्र को प्राप्त होती है, चूंकि समाजवादी पार्टी को मुलायम सिंह यादव एवं शिवपाल सिंह यादव ने अपने खून-पसीने से सींच कर उच्च शिखर तक पहुंचाया था तो उसकी विरासत सौंपने का अधिकार भी नेताजी को ही था उन्होंने जो कुछ किया उस पर टिप्पणी नहीं की जा सकती लेकिन 2012 में जब नेताजी ने अपनी पार्टी और प्रदेश दोनों की कमान अपने पुत्र अखिलेश यादव को सौंप दी तो वे राजनीति में नौसिखिए होने के कारण इस सम्मान को हजम नहीं कर पाये उन्होंने मुख्यमंत्री रहते पार्टी के किसी भी कद्दावर नेता अथवा कार्यकर्त्ता को तवज्जों न देकर अधिकांश के पर कतर कर उनको आगे बढ़ने से रोक दिया यही रोकथाम (ब्रेक) सपा के लिए घातक सिद्ध हुआ। अखिलेश यादव द्वारा 2012 के बाद लगातार किए जा रहे नए-नए प्रयोगों ने शायद उन्हें कोई सीख दी हो! 2014 के लोकसभा चुनाव में वे 23 से घटकर 5 सीटों पर आ गए तथा मत प्रतिशत भी 23.26 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत रह गया। उन्हीं के नेतृत्व में सपा ने 2017 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा और विधानसभा की 224 सीटों से सिकुड़ कर 47 पर रह गए। अखिलेश यादव ने प्रेक्टिकल जारी रखते हुए 2019 का लोकसभा चुनाव बसपा के साथ मिलकर लड़ा और सात सीटों को गंवाते हुए फिर पुराने आंकड़े पांच पर रह गए जबकि उनकी साझीदार रही बसपा शून्य से उठकर 10 पर पहुंच गई। अखिलेश यादव का अगला नया प्रयोग क्या होगा किसी को कुछ नहीं पता, उन्हांेने अपने चाचा को पार्टी से दर किनार करते हुए कई जनपदों एवं प्रदेशों की इकाइयां भंग करने के साथ अपने आईटी शैल के चैनलों को भी अस्तित्वहीन बना दिया है।
युवा सोच वाले इस कद्दावर नेता का कभी काम बोलता था, तो दो लड़कों का साथ यूपी को पसंद था, इस बार गठबंधन का गणित भी ‘बोल’ गया, उन्हें शायद यह किसी ने नहीं बताया कि संगठित परिवार और उसके संस्कार भी बोलते हैं यही बात सपा से गठबंधन तोड़ते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती ने कही कि सपा के पास अपना कोई कैडर वोट नहीं है, इसलिए गठबंधन तोड़ रही है क्योंकि सपा की तीन सीटों बदायूं, कन्नौज और फिरोजाबाद की हार सपा के मुंह पर बहुत बड़ा तमाचा है। अखिलेश यादव उस धरती पुत्र और नेताजी के नाम से विख्यात राजनैतिक हस्ती के उत्तराधिकारी हैं जिन्हांेने अपनी बहू को निविर्रोध चुनवाकर लोकसभा भेज दिया था, उसके उत्तराधिकारी की ऐसी दुर्गति होगी देश की जनता को ऐसी उम्मीद नहीं थी। परिणाम स्पष्ट है कि नेताजी ने दलित, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों को जोड़कर सबसे पहले अपना परिवार और वतन मजबूत तथा विकसित किया तो पूरा प्रदेश उनके साथ हो लिया लेकिन अखिलेश यादव ने परिवार और पार्टी दोनों को तोड़ दिया तो दुष्परिणाम सामने हैं। उन्हें याद रखना होगा कि गठबंधन तभी सफल होगा जब अपना संगठन मजबूत हो और काम भी तभी बोलता जब जीवन में संस्कार हों। चाचा को दुत्कारने के बाद न तो बुआ का आशीर्वाद काम आता न ही दो लड़कों का साथ। गांव में एक कहावत चलती है कि यदि बच्चों से काम चल जाता तो बच्चों की मां खसम न करती।
किसी भी बाप की विरासत उसके पुत्र को प्राप्त होती है, चूंकि समाजवादी पार्टी को मुलायम सिंह यादव एवं शिवपाल सिंह यादव ने अपने खून-पसीने से सींच कर उच्च शिखर तक पहुंचाया था तो उसकी विरासत सौंपने का अधिकार भी नेताजी को ही था उन्होंने जो कुछ किया उस पर टिप्पणी नहीं की जा सकती लेकिन 2012 में जब नेताजी ने अपनी पार्टी और प्रदेश दोनों की कमान अपने पुत्र अखिलेश यादव को सौंप दी तो वे राजनीति में नौसिखिए होने के कारण इस सम्मान को हजम नहीं कर पाये उन्होंने मुख्यमंत्री रहते पार्टी के किसी भी कद्दावर नेता अथवा कार्यकर्त्ता को तवज्जों न देकर अधिकांश के पर कतर कर उनको आगे बढ़ने से रोक दिया यही रोकथाम (ब्रेक) सपा के लिए घातक सिद्ध हुआ। अखिलेश यादव द्वारा 2012 के बाद लगातार किए जा रहे नए-नए प्रयोगों ने शायद उन्हें कोई सीख दी हो! 2014 के लोकसभा चुनाव में वे 23 से घटकर 5 सीटों पर आ गए तथा मत प्रतिशत भी 23.26 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत रह गया। उन्हीं के नेतृत्व में सपा ने 2017 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा और विधानसभा की 224 सीटों से सिकुड़ कर 47 पर रह गए। अखिलेश यादव ने प्रेक्टिकल जारी रखते हुए 2019 का लोकसभा चुनाव बसपा के साथ मिलकर लड़ा और सात सीटों को गंवाते हुए फिर पुराने आंकड़े पांच पर रह गए जबकि उनकी साझीदार रही बसपा शून्य से उठकर 10 पर पहुंच गई। अखिलेश यादव का अगला नया प्रयोग क्या होगा किसी को कुछ नहीं पता, उन्हांेने अपने चाचा को पार्टी से दर किनार करते हुए कई जनपदों एवं प्रदेशों की इकाइयां भंग करने के साथ अपने आईटी शैल के चैनलों को भी अस्तित्वहीन बना दिया है।
युवा सोच वाले इस कद्दावर नेता का कभी काम बोलता था, तो दो लड़कों का साथ यूपी को पसंद था, इस बार गठबंधन का गणित भी ‘बोल’ गया, उन्हें शायद यह किसी ने नहीं बताया कि संगठित परिवार और उसके संस्कार भी बोलते हैं यही बात सपा से गठबंधन तोड़ते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती ने कही कि सपा के पास अपना कोई कैडर वोट नहीं है, इसलिए गठबंधन तोड़ रही है क्योंकि सपा की तीन सीटों बदायूं, कन्नौज और फिरोजाबाद की हार सपा के मुंह पर बहुत बड़ा तमाचा है। अखिलेश यादव उस धरती पुत्र और नेताजी के नाम से विख्यात राजनैतिक हस्ती के उत्तराधिकारी हैं जिन्हांेने अपनी बहू को निविर्रोध चुनवाकर लोकसभा भेज दिया था, उसके उत्तराधिकारी की ऐसी दुर्गति होगी देश की जनता को ऐसी उम्मीद नहीं थी। परिणाम स्पष्ट है कि नेताजी ने दलित, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों को जोड़कर सबसे पहले अपना परिवार और वतन मजबूत तथा विकसित किया तो पूरा प्रदेश उनके साथ हो लिया लेकिन अखिलेश यादव ने परिवार और पार्टी दोनों को तोड़ दिया तो दुष्परिणाम सामने हैं। उन्हें याद रखना होगा कि गठबंधन तभी सफल होगा जब अपना संगठन मजबूत हो और काम भी तभी बोलता जब जीवन में संस्कार हों। चाचा को दुत्कारने के बाद न तो बुआ का आशीर्वाद काम आता न ही दो लड़कों का साथ। गांव में एक कहावत चलती है कि यदि बच्चों से काम चल जाता तो बच्चों की मां खसम न करती।
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