देवभूमि उत्तराखण्ड सनातन धर्म, संस्कृति एवं परम्पराओं के संवर्द्धन का सबसे बड़ा केन्द्र है। यहां कुम्भ एवं अर्द्धकुम्भ के अतिरिक्त प्रतिवर्ष महाकुम्भ के बराबर ही कांवड़ मेला, सोमवती अमावस्या, कार्तिक पूर्णिमा एवं गंगा दशहरा जैसे विशाल धार्मिक पर्वों पर लाखों की संख्या मंे श्रद्धालु आते हैं। हरिद्वार को उत्तराखण्ड का प्रवेश द्वार के रुप में जाना जाता है, अतः श्रद्धालुओं के साथ ही पर्यटकों का आवागमन भी हरिद्वार के रास्ते ही होता है। नया राज्य बनने के बाद दो अर्द्धकुम्भ एवं एक कुम्भ पर्व का आयोजन किया जा चुका है तथा राज्य के अपने आयोजन में होने वाले 2021 के कुम्भ पर्व की तैयारियों की अभी तक शुरुआत न होना सरकार और सरकारी तंत्र की धर्म, आस्था और अपने कर्तव्य के प्रति बड़ी उदासीनता का परिचायक है।
अब तक सम्पन्न हुए तीन बड़े मेलों में दोनों अर्द्धकुम्भों का आयोजन कांग्रेस के कार्यकाल में हुआ जबकि 2010 तथा 2021 के दोनांे कुम्भ पर्वों के आयोजन का श्रेय भाजपा सरकार को जायेगा। चूंकि हरिद्वार में कांवड़ मेला सहित प्रतिवर्ष अनेकों लक्खी मेलों का आयोजन होता है इसके अतिरिक्त भी मई-जून के माह में यात्रा सीजन के शुभारम्भ और विद्यालयों के वार्षिक अवकाश के कारण हरिद्वार में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं पर्यटक आते हैं लेकिन व्यवस्थाएं न होने के कारण प्रत्येक शनिवार और रविवार के साथ ही अन्य तिथि एवं दिवसों में भी हरिद्वार में जाम की स्थिति रहती है। पुलिस और प्रशासन का इतना बड़ा अमला होने के बाद भी व्यवस्थाएं न बनना न केवल चिंता का विषय है बल्कि सरकार, शासन और प्रशासन की विफलता एवं अकर्मण्यता की ओर इशारा कर रहा है। राज्य सरकार यदि शासन स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर दे तो व्यवस्थायें बनायी जा सकती हैं लेकिन ये अधिकारी हैं जो जानते हैं यहां आने वाले सभी श्रद्धालु धर्म, कर्म और आस्था के नाम पर आते हैं तो कष्ट सहकर भी उफ नहीं करते हैं लेकिन स्थानीय नागरिकों के साथ ही रोजमर्रा की जिन्दगी, शिक्षा एवं उद्योग भी प्रभावित होते हैं। कुम्भ पर्व के आयोजन में मात्र डेढ़ वर्ष का समय शेष है और हरिद्वार में स्थायी विकास कार्यों की आवश्यकता है लेकिन राज्य सरकार ने बिना किसी कार्य के शुभारम्भ के नाम पर केवल केन्द्र सरकार से धन आवंटन की मांग कर अपने कार्य की इतिश्री कर ली है। केन्द्र और राज्य में दोनों ही जगह एक ही दल की सरकार है जिसे डबल इंजन वाली सरकार के रुप में प्रचारित किया गया था लेकिन कांवड़ मेला सिर पर है। आगामी कुम्भ 2021 आने से पूर्व दो बार कांवड़ मेला आयेगा जबकि कुम्भ पर्व बीतने के तीन माह बाद फिर कांवड़ मेला आयोजित होगा जो स्वयं में कुम्भ से कम नहीं होते हैं। हरिद्वार के हालत ऐसे हैं कि दस वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुए हाईवे निर्माण के कार्य में अभी ऐसी कोई प्रगति प्रतीत नहीं हो रही कि 2021 तक भी यह पूर्ण हो पायेगा। हाईवे निर्माण की गति इतनी धीमी है कि शंकराचार्य चौक से रायवाला रेलवे क्रांसिंग तक लगने वाला ऐतिहासिक जाम कांवड़ और कुम्भ पर्व तक बदस्तूर जारी रहेगा। शंकराचार्य चौक से दूधाधारी चौक तक कांवड़ मेले का भारी दवाब रहता है और इस क्षेत्र में निर्माण कार्यों की धीमी गति के चलते श्रावण मास के कांवड़ मेले में सबसे बड़ा सिर दर्द बनेगा। कई स्थानों पर चल रहे पुलों के निर्माण कार्य और खुदाई के कारण जब बरसात होगी तो पूरा क्षेत्र ही कीचड़ में तब्दील हो जायेगा। कांवड़ मेले में पैदल यात्रियों के साथ ही सजावटी कांवड़ तथा डाक कांवड़ का भी भारी दवाब रहता है जिसे सकुशल सम्पन्न कराने के लिए प्रशासन के पास अभी तक कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है। कुम्भ की भांति यह कांवड़ मेला भी भगवान के ही भरोसे रहेगा, भोलेनाथ करेेंगे बेड़ा पार।
अब तक सम्पन्न हुए तीन बड़े मेलों में दोनों अर्द्धकुम्भों का आयोजन कांग्रेस के कार्यकाल में हुआ जबकि 2010 तथा 2021 के दोनांे कुम्भ पर्वों के आयोजन का श्रेय भाजपा सरकार को जायेगा। चूंकि हरिद्वार में कांवड़ मेला सहित प्रतिवर्ष अनेकों लक्खी मेलों का आयोजन होता है इसके अतिरिक्त भी मई-जून के माह में यात्रा सीजन के शुभारम्भ और विद्यालयों के वार्षिक अवकाश के कारण हरिद्वार में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं पर्यटक आते हैं लेकिन व्यवस्थाएं न होने के कारण प्रत्येक शनिवार और रविवार के साथ ही अन्य तिथि एवं दिवसों में भी हरिद्वार में जाम की स्थिति रहती है। पुलिस और प्रशासन का इतना बड़ा अमला होने के बाद भी व्यवस्थाएं न बनना न केवल चिंता का विषय है बल्कि सरकार, शासन और प्रशासन की विफलता एवं अकर्मण्यता की ओर इशारा कर रहा है। राज्य सरकार यदि शासन स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर दे तो व्यवस्थायें बनायी जा सकती हैं लेकिन ये अधिकारी हैं जो जानते हैं यहां आने वाले सभी श्रद्धालु धर्म, कर्म और आस्था के नाम पर आते हैं तो कष्ट सहकर भी उफ नहीं करते हैं लेकिन स्थानीय नागरिकों के साथ ही रोजमर्रा की जिन्दगी, शिक्षा एवं उद्योग भी प्रभावित होते हैं। कुम्भ पर्व के आयोजन में मात्र डेढ़ वर्ष का समय शेष है और हरिद्वार में स्थायी विकास कार्यों की आवश्यकता है लेकिन राज्य सरकार ने बिना किसी कार्य के शुभारम्भ के नाम पर केवल केन्द्र सरकार से धन आवंटन की मांग कर अपने कार्य की इतिश्री कर ली है। केन्द्र और राज्य में दोनों ही जगह एक ही दल की सरकार है जिसे डबल इंजन वाली सरकार के रुप में प्रचारित किया गया था लेकिन कांवड़ मेला सिर पर है। आगामी कुम्भ 2021 आने से पूर्व दो बार कांवड़ मेला आयेगा जबकि कुम्भ पर्व बीतने के तीन माह बाद फिर कांवड़ मेला आयोजित होगा जो स्वयं में कुम्भ से कम नहीं होते हैं। हरिद्वार के हालत ऐसे हैं कि दस वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुए हाईवे निर्माण के कार्य में अभी ऐसी कोई प्रगति प्रतीत नहीं हो रही कि 2021 तक भी यह पूर्ण हो पायेगा। हाईवे निर्माण की गति इतनी धीमी है कि शंकराचार्य चौक से रायवाला रेलवे क्रांसिंग तक लगने वाला ऐतिहासिक जाम कांवड़ और कुम्भ पर्व तक बदस्तूर जारी रहेगा। शंकराचार्य चौक से दूधाधारी चौक तक कांवड़ मेले का भारी दवाब रहता है और इस क्षेत्र में निर्माण कार्यों की धीमी गति के चलते श्रावण मास के कांवड़ मेले में सबसे बड़ा सिर दर्द बनेगा। कई स्थानों पर चल रहे पुलों के निर्माण कार्य और खुदाई के कारण जब बरसात होगी तो पूरा क्षेत्र ही कीचड़ में तब्दील हो जायेगा। कांवड़ मेले में पैदल यात्रियों के साथ ही सजावटी कांवड़ तथा डाक कांवड़ का भी भारी दवाब रहता है जिसे सकुशल सम्पन्न कराने के लिए प्रशासन के पास अभी तक कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है। कुम्भ की भांति यह कांवड़ मेला भी भगवान के ही भरोसे रहेगा, भोलेनाथ करेेंगे बेड़ा पार।
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