हिमालयी राज्यों में उत्तराखण्ड का अपना विशिष्ट स्थान है चाहे वह पर्यटन की दृष्टि से हो या तीर्थाटन के रुप में। प्राकृतिक सौन्दर्य एवं मानव जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति में प्रथम पायदान पर रहने वाला राज्य अपना अलग अस्तित्व पाने के बाद भी आशातीत परिणाम नहीं प्राप्त कर पाया है। स्वार्थ और महत्वाकांक्षा प्रत्येक व्यक्ति की चाहत होती है उन्नति करना उसका उद्देश्य होता है और सुविधायें प्राप्त करना उसका अधिकार। इन सबकी सफलता के लिए जो एक मूल मंत्र है वह है व्यक्ति का कर्तव्य और जब कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य के प्रति सत्यनिष्ठा के साथ कार्य करता है तो उसे अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए किसी प्रकार के संघर्ष की आवश्यकता नहीं होती है।
उत्तराखण्ड राज्य के नेता हों या ब्यूरोक्रेट्स स्वार्थ में सर्वोपरि लेकिन कर्तव्य में फिसड्डी प्रतीत हो रहे हैं। अपने लिए सुविधायें प्राप्त करने का मामला हो तो दोनों राष्ट्रीय दलों के नेता एक राय हो जाते हैं और ब्यूरोक्रेट्स काम छोड़कर हड़ताल का बिगुल फूंक देते हैं क्या कभी किसी ने सोचा कि हमारा राज्य जिस दिन अपने नये गठन के मानकों और बिन्दुओं को पूर्ण कर लेगा उसी दिन भारत का सिरमौर और सुख-सुविधाओं में शीर्ष पर पहंुंच जायेगा। ऐसा केवल सोचा गया था लेकिन राज्य निर्माण के बाद हुआ नहीं। यहां तो वही कहावत चरितार्थ हुई कि जिसने किसी अमुक स्थान पर पुल निर्माण की मांग की थी और मांग मान लेने के बाद अब पुल निर्माण का ठेका भी उसी को चाहिए, चाहे उसे पुल बनाने की तकनीकी का ज्ञान न हो लेकिन पुल बनाने का ठेका वह दूसरों को नहीं लेने देगा, भले ही पुल न बन पाये या गलत बने, बस बनायेगा वही क्योंकि उसने मांग की थी। उत्तराखण्ड भारत का पहला राज्य है जहां राज्य आन्दोलनकारियों को सुविधाओं के नाम पर कई प्रकार के शासनादेश भी जारी हुए हैं। महाराष्ट्र में जहां शिवसेना ने दूसरे राज्य वालों का विरोध किया था वहीं उत्तराखण्ड ने बकायदा राज्य बनते ही सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए विकल्प पत्र भरने का फरमान जारी कर दिया। बाकायदा विकल्प पत्र भरवा कर यूपी मूल के सरकारी कर्मचारी तथा अधिकारियों को यूपी भेज दिया गया इस विकल्प में कहीं भी किसी प्रकार की योग्यता का मानक न रखकर मैदान और पहाड़ का मानक रखा गया ताकि उत्तराखण्ड को शुद्ध रुप से पर्वतीय राज्य बनाया जा सके और यह सपना साकार हो गया। इस नियम के लागू होते ही क्षेत्रवाद की भावना और बलवान हो गयी उसका परिणाम आज सामने है कि उत्तराखण्ड में प्रमोशन और पेस्केल बढ़ाने में अपने नए नियमों को लागू कर लिया तथा विकास योजनायें और वे मानक जो नया राज्य बनने से पूर्व निर्धारित किए थे सब के सब रसातल में चले गए। कोई भी ऐसा संगठन या राजनैतिक दल नहीं बचा जो राज्य निर्माण के लिए तय किए गए मानकों को लागू कराने के लिए संघर्ष करे बल्कि आज भी पूरी राजनीति सुगम और दुर्गम में उलझी हुई है।
जिस पहाड़ के विकास के लिए नए राज्य का निर्माण कराया गया था आज वहां न तो नेता हैं न ही ब्यूरोक्रेट्स और जो हैं वे काम नहीं करते, अधिकांश राजनेता अब पहाड़ छोड़कर मैदान में ही बस गए हैं और मैदान में चुनाव जीतकर दिल्ली तथा देहरादून का रास्ता तय करते हैं। नया राज्य बनने के बाद भी उत्तराखण्ड के कई नेता केन्द्र में मंत्री तथा राज्यसभा सांसद रहे लेकिन इस राज्य के लिए किसने क्या-क्या किया इस बात को पूरे प्रदेश की जनता जानती है। उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य कहें या संयोग कि यहां कोई क्षेत्रीय दल नहीं है। जिस दल ने राज्य निर्माण के लिए संघर्ष किया था वह राज्य आन्दोलनकारी बनकर अपने संघर्ष का प्रसाद प्राप्त कर रहा है तो दो राजनैतिक दल अघोषित रुप से या कहें कि गुप्त समझौता कर बारी-बारी से सत्ता सुख भोग रहे हैं। तीर्थाटन, पर्यटन, ऊर्जा प्रदेश, आयुष प्रदेश और फल तथा बागवानी के क्षेत्र में हिमाचल से आगे जाने के सारे मामले स्वार्थ की सीमा ने समाप्त कर दिए।
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