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मोदी की दोबारा जीत ने सिद्ध कर दिया, काम नहीं प्रचार बोलता है

राजनीति को समझ रहे थे खेल, गठबंधन हो गया फेल
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का दिल जीतना बड़ी बात होती है और जनता का सारा रुझान अपनी तरफ मोड़ कर दूसरे के कामों को इतना बुरा बता दो कि जनता अपने दिल और दिमाग दोनों से निकाल दे यही कलियुग की सफलता का मूलमंत्र है जो केवल प्रचार माध्यमों से प्राप्त किया जा सकता है और इस प्रक्रिया को आत्मसात किया है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो अपने गलत निर्णयों को भी सही सिद्ध करने में कामयाब हुए यही उनकी दोबारा सफलता का मुख्य कारक बना। कौन अपना है और कौन पराया है, इस बात को आज तक कोई जान ही नहीं पाया लेकिन किस व्यक्ति और तंत्र को किस काम के लिए प्रयोग करना है इस बात का इल्म जिसको हो जाता है वह जीवन की सफलता रुपी सीढ़ी पर आगे बढ़ता रहता है स्वयं को दूसरे की तुलना में श्रेष्ठ सिद्ध करने की कलाकारी या तो पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी में थी या अब नरेन्द्र मोदी में है।
विजय-विजय होती है और हार-हार होती है, अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने वाले सब कुछ हासिल करने के बाद भी सफल नहीं हो पाते और घर-परिवार छोड़कर एकांगी जीवन जीने वाले कर्तव्य के प्रति अकर्मण्य होने के बाद भी सफल हो जाते हैं। अजित सिंह और राहुल गांधी प्रधानमंत्री के पुत्र होने के बाद भी पिता की विरासत को नहीं संभाल पाये तेजस्वी यादव लालू प्रसाद यादव की विरासत नहीं सभाल पाये और न ही चन्द्रबाबू नायडू एनटी रामाराव की विरासत को शिखर पर पहुंचा पाये तथा अखिलेश यादव को उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने थाली में सजाकर सत्ता दी, पद और प्रतिष्ठा दी, उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी, तीन बार सत्ता का स्वाद चख चुकी एक पार्टी सौंपी लेकिन विदेश में पढ़ाई करने के कारण वे संस्कार नहीं दे पाये जो उनकी विरासत को आगे तक संभाल पाते सत्तासीन होने के बाद ही उन्होंने 2014 का लोकसभा चुनाव हारा, 2017 का विधानसभा हारा और अब 2019 भी हार गए, न तो अपने परिवार को ही जिता पाये न बिरादरी और ही पत्नी को और समाज या साझीदारों को यह उनकी राजनैतिक अदूरदर्शिता का प्रमाण है कि अपने से तो दूरी बना ली और दूसरे दल कभी कांग्रेस तो कभी बसपा और रालोद परिवार से साझा कर सत्ता की ख्वाहिश पाल रहे हैं, लगभग सारे प्रेक्टिकल पूर्ण हो चुके हैं अब उनका अगला कदम क्या होगा वे ही बेहतर जाने। राजनेता के रुप में जो पहचान मुलायम सिंह यादव ने बनायी कि डिम्पल यादव को निविर्रोध संसद में भेजा और लालू प्रसाद यादव ने अपनी अल्प शिक्षित पत्नी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया।
फिलहाल नरेन्द्र मोदी ने जो फंडा चलाया उसमें वे कामयाब रहे उनका मानना है कि सत्ता की प्राप्ति के लिए धन और प्रचार केवल दो चीजों की आवश्यकता होती है ये दोनों चीजें आ जायें तो बोलने के लिए तो रोज नए-नए मुद्दे स्वतः ही मिल जाते हैं। मोदीजी को मालूम है कि यह कलियुग है और कलियुग में अपनी प्रशंसा स्वयं करनी पड़ती है इसके लिए संसाधन जुटाना समय की आवश्यकता होती है इसीलिए उन्होंने सत्ता में आते ही सबसे पहले बड़ा निर्णय लेते हुए नोटबंदी लागू की और ऐसी नीतियां लागू कर दीं कि उनके अलावा किसी के पास धन न टिकने पाये। कलियुग में धर्म और ईमान के इतर धन ही सबसे बड़ा संसाधन होता है और इसी से सारी व्यवस्थाओं का संचालन होता है। जहां तक धन की बात है तो धन कमाते तो सभी हैं लेकिन खर्च करने का दिल हर किसी के पास नहीं होता है। जहां तक प्रचार माध्यमों का सवाल है तो मीडिया को बिकाऊ या ब्लैकमेलर तो कोई भी कह सकता है लेकिन उसका प्रयोग अपने पक्ष में कर ले वही बड़ा नेता माना जाता है। मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर और पांच साल तक प्रधानमंत्री रहते देश और समाज का कितना भला किया यह बात पूरा देश, पूरा विपक्ष और दुनिया के अन्य देश ही नहीं स्वयं इस देश की जनता और उन्हीं की पार्टी के नेता और कार्यकर्त्ता भी जानते हैं। टाइम पत्रिका इसका प्रमाण है फिर भी दोबारा सफलता मिल जाये तो उस व्यक्ति के अन्दर कुछ तो कलाकारी है इस बात पर सम्पूर्ण विपक्ष को मनन करना चाहिए और अब समझ लेना चाहिए कि राजनीति करना कोई बच्चों का खेल नहीं है। राजनीति में सफल होने के लिए जन और तंत्र दोनों को साधना पड़ता है, केवल अपना प्रोटोकाल बनाने से काम नहीं चलता।

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