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सोलहवीं लोकसभा ने गिरायी संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा


सात चरणों में सम्पन्न होने जा रहे लोकतंत्र के 17वें महापर्व लोकसभा चुनाव 2019 ने भारत के लोकतांत्रिक स्वरुप में कुछ नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। 17वीं लोकसभा के लिए सम्पन्न हुए छः चरणों के मतदान ने यह सिद्ध कर दिया कि देश की जनता में मतदान के प्रति अब रुचि नहीं रह गयी है। अब तक लगभग 90 प्रतिशत जनता अपने मताधिकार का प्रयोग कर चुकी माना जा रहा है जबकि वास्तविकता कुछ और है अब तक मतदान का औसत लगभग साठ प्रतिशत माना जा रहा है उसमें भी दो राष्ट्रीय दलों का सीधा मुकाबला समझें तो लगभग 60 प्रतिशत प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों का दबदबा है, ऐसी स्थिति में कोई भी दल ऐसा नहीं है जो कुल पड़े मतों का 50 प्रतिशत से अधिक प्राप्त कर सके और यदि वह कुल पड़े मतों का 50 से 60 प्रतिशत मत प्राप्त भी कर लेता है तो वह कुल जनसंख्या का एक तिहाई ही माना जायेगा। जबकि संविधान की स्वीकृति के अनुसार यह प्रतिशत दो तिहाई होना चाहिए। ऐसी स्थिति में जो भी दल सरकार गठन का दावा प्रस्तुत करेगा उसके पास कुल जनंसख्या का पचास प्रतिशत से अधिक मत होना चाहिए। यदि 30-35 प्रतिशत मत प्राप्त करने वाली पार्टी सरकार बनाने का दावा करती है तो उसे अन्य दलों को साथ मिलाकर मत प्रतिशत 55 से 60 प्रतिशत कर लेना चाहिए यही चुनाव की सार्थकता होगी।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिन दलों के पास आधे से अधिक मत नहीं होते हैं उन्हें भी सत्ता में भागीदारी का अधिकार होना चाहिए क्योंकि अब तक यह देखा गया है कि आधे से कम मत प्राप्त करने वालों को ही बहुमत अथवा बड़ी पार्टी होने के नाते सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर लिया जाता था लेकिन एक दल विशेष ने अपनी सरकार बनवाने के लिए इस नियम को तोड़ दिया है इसके लिए उसने राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर अपने दल के ऐसे नेताओं की नियुक्ति कर दी जो उस दल के कार्यकर्त्ता/नेता के रुप में कार्य कर रहे हैं।
देश की आजादी के सात दशक बीतने के बाद अब तक 16 लोकसभाओं का गठन हो चुका है। जहां तक निर्वाचन आयोग की भूमिका और निष्पक्ष चुनाव की बात है तो इससे पूर्व जो भी निर्वाचन आयुक्त रहे उन्होंने इस संवैधानिक पद की गरिमा को बखूबी निभाया और टी.एन. शेषन ने जो कीर्तिमान स्थापित किया वह भारत के इतिहास में सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा जबकि 16वीं लोकसभा के गठन के बाद न केवल निर्वाचन आयोग बल्कि अन्य संवैधानिक संस्थाओं की कार्यशैली का आकलन किया जाये तो इस लोकसभा का कार्यकाल सबसे खराब की श्रेणी में गिना जायेगा। देश के इतिहास में यह पहला चुनाव है जिसमें कोई विकास अथवा उन्नति का मुद्दा न होकर केवल एक-दूसरे की बुराई और अपशब्दों के प्रयोग तथा भद्दे-भद्दे संबोधनों का जो प्रयोग हुआ उससे सिद्ध हो गया कि देश के नेताओं का स्टेटस कैसा था और वह देश के साथ क्या करना चाहता था। देश में व्यवस्था बनाने के नाम पर इन पांच वर्षों में कैसे-कैसे प्रयोग हुए पूरी दुनियां हंस रही है और जनता अपने कृत्य पर शर्मिन्दा हो रही है लेकिन अब इतनी देर हो चुकी है कि देश की जनता अथवा विपक्ष के लाख चाहने के बाद भी किसी परिवर्तन की आशा नहीं है।
देश की सत्ता पर दोबारा अपनी दावेदारी करने वाले एक दल द्वारा उतारे गए प्रत्याशियों पर नजर डालंे तो देश का कोई नेता अथवा उसके मंत्रिमण्डल के सदस्य चुनाव नहीं लड़ रहे हैं बल्कि नाचने-गाने बजाने और मनोरंजन करने वालों को देश की संसद चलाने की जिम्मेदारी सौंपने की तैयारी हो रही है, यदि ये सभी जीत जाते हैं तो कैसा होगा संसद का स्वरुप और कैसा बनेगा भारत का भविष्य? जिन लोगों का स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं रहा वे फर्जी देशभक्ति का राग अलाप कर एक बार फिर देश की जनता को गुमराह कर भारत के भाग्य से खिलवाड़ करने की योजना बना रहे हैं मात्र एक सप्ताह के अन्दर सबकुछ स्पष्ट हो जायेगा।

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