उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार का नंगा नाच
शाहजहांपुर। तहसील एवं थानों में चल रहे भ्रष्टाचार से देश की सत्तर प्रतिशत आबादी त्रस्त है, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता सरकार तो बदल देती है लेकिन सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारी वही रहते हैं। सरकार किसी भी दल की हो ये कर्मचारी संगठित गिरोह बनाकर भ्रष्टाचार करते रहते हैं। सरकारी दस्तावेजों में हेराफेरी हो या गलत रिपोर्ट देकर शासन एवं प्रशासन को गुमराह करने का मामला किसी भी दोषी सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध कार्यवाही नहीं होती है और यदि मामला न्यायालय में चला जाये तब भी ये भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी न्यायालय में आग लगवाने अथवा फाइल गायब कराने या उसमें से कागजात गायब कराने में कामयाब हो जाते हैं और पीड़ित व्यक्ति को न्याय नहीं मिलने देते हैं।
ऐसा ही एक मामला जनपद शाहजहांपुर की तहसील तिलहर और थाना खुदागंज से जुड़ा 1994 का है, तहसील तिलहर के दो लेखपालों रामप्रकाश यादव तथा योगेन्द्र पाल सिंह ने ग्राम मवैया पट्टी के एक व्यक्ति से साजकर दूसरे की जमीन उसके नाम करने के लिए एक ही व्यक्ति को दो बार मृतक दर्शाते हुए सरकारी कागजातों में बड़ी हेराफेरी की। पीड़ित व्यक्ति जब थाना खुदागंज में उक्त आशय की रिपोर्ट दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध दर्ज कराने गया तो उसकी रिपोर्ट तत्कालीन थानाध्यक्ष इफ्तखार अहमद ने लिखने से मना कर दिया। पीड़ित व्यक्ति जब पुलिस अधीक्षक शाहजहांपुर से मिला तो उन्होंने थानाध्यक्ष खुदागंज को रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश कर दिए लेकिन अपने कप्तान के आदेशों के बाद भी जब थानाध्यक्ष ने रिपोर्ट दर्ज नहीं की तो पीड़ित व्यक्ति दोबारा पुलिस अधीक्षक से मिला और दूरभाष पर सीधी वार्ता कराने के बाद 5 सितम्बर 2014 के आदेश पर थानाध्यक्ष इफ्तखार अहमद ने 23 दिसम्बर 2014 को मु.अ.सं. 595/14 पर रिपोर्ट तो दर्ज कर ली लेकिन दोषी दोनों लेखपालों से बड़ी साज कर 26 जुलाई 2015 में अन्तिम रिपोर्ट प्रेषित कर दी। मामले की जांच पहले तो उपनिरीक्षक सतेन्द्र कुमार ने की बाद में दूसरे जांच अधिकारी सिद्धार्थ उपाध्याय ने अपनी जांच रिपोर्ट में सभी कागजातों के मिलने की बात स्वीकार करते हुए भी फर्जी रिपोर्ट तैयार की और साक्ष्य उपलब्ध न होने की बात कह कर अन्तिम रिपोर्ट प्रेषित कर दी।
पीड़ित व्यक्ति जब जांच से संतुष्ट नहीं हुआ तो उसने दोबारा जांच के आदेश कराये लेकिन जांच फिर थाना खुदागंज को ही भेजी गई तो तीसरे जांच अधिकारी वीरेश कुमार त्यागी ने भी दोषी व्यक्ति से सांठ-गांठ कर पुरानी अन्तिम रिपोर्ट का ही अनुसरण कर दिया। पीड़ित व्यक्ति ने जब उक्त प्रकरण की जांच कार्यवाही हेतु एक पत्र तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को लिखा तो उन्होंने जिलाधिकारी के माध्यम से उप जिलाधिकारी तिलहर विजय शंकर दुबे को जांच सौंपी। एस.डी.एम. विजय शंकर दुबे ने भी दोनों लेखपालों से साज कर जिलाधिकारी के माध्यम से शासन एवं सरकार को गुमराह कर झूठी रिपोर्ट प्रेषित कर दोषी व्यक्तियों को बचा लिया। एस.डी.एम. तिलहर विजय शंकर दुबे की शिकायत जब पीड़ित व्यक्त् िने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष रामआसरे विश्वकर्मा से की तो उन्होंने भी एस.डी.एम. तिलहर विजय शंकर दुबे से साजकर बिना किसी कार्यवाही के दिनांक 5-12-2016 को बिना किसी अग्रिम तिथि निर्धारित किये मामले को बंद कर दिया।
न्याय के लिए भटकता हुआ पीड़ित व्यति अब न्यायपालिका की शरण में गया और 20 मार्च 2017 को मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी शाहजहांपुर के न्यायालय में पुलिस की अन्तिम रिपोर्ट को चुनौती देते हुए प्रोस्टेट दायर किया तो न्यायालय में भी अधिकांश तारीखें अवकाश के दिन की नियत की गयी। दोषी व्यक्तियों ने न्यायालय में भी अपना जाल बिछाना प्रारम्भ कर दिया, इसी कड़ी में दिनांक 3-7-2018 को सीजेएम कार्यालय में आग लग गयी और पत्रावली गायब हो गयी। दिसम्बर 2018 में पत्रावली तो मिल गयी लेकिन उसमें से कई महत्वपूर्ण कागजात गायब हैं परिणाम स्वरुप अभी तक धारा 200 में वादी के ही बयान नहीं हो पाये हैं। इस बीच में दो न्यायिक अधिकारी भी बदले गए, पीड़ित व्यक्ति ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से माननीय न्यायालय से 20 मई 2019 तक पत्रावली पूर्ण कराने की गुहार लगायी है।
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