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सोलहवीं लोकसभा में हुआ संविधान और संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग

सत्रहवीं लोकसभा के गठन के लिए चुनाव अन्तिम चरण में है कुल सात चरणों में से मात्र दो चरण का ही चुनाव शेष बचा है लगभग तीस प्रतिशत मतदाता शेष बचे हैं और मतदान के प्रतिशत तथा जनता की मतदान के प्रति रुचि का विश्लेषण किया जाये तो 10 से 15 प्रतिशत ही मत और पड़ने हैं जो नयी लोकसभा के गठन का निर्णय देंगे। अब तक आजादी के लगभग सत्तर सालों में 16 बार लोकसभा का गठन हो चुका है जिनमें से एक दर्जन चुनावों को यदि सामान्य मान लिया जाये तो 1977, 2014 और अब 2019 के लोकसभा चुनाव को असामान्य या विशेष चुनावी प्रक्रिया का अंग की प्रक्रिया का अंग माना जो सकता है। एक कहावत है कि जब तक जीवन है व्यक्ति के सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती है और प्रत्येक चुनाव में देश की जनता कुछ न कुछ अलग अनुभव करती है। इस बार के लोकसभा चुनावों ने जनता को जिस अनुभव की अनूभूति करायी वह सदा स्मरणीय रहेगी, वैसे तो जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है वह अतीत को भुलाने में क्षण मात्र का भी विलम्ब नहीं करती लेकिन सत्ता पक्ष ने देश की संवैधानिक संस्थाओं एवं संविधान की शक्तियों का जितना दुरुपयोग किया उससे एक अलग परम्परा बन गयी है जो भविष्य में देश की व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बनेगी।
हमारे देश में अंग्रेजी हुकूमत के समय से ही एक वर्ग ऐसा है जिसे न तो देश की स्वतंत्रता में विश्वास था न ही संविधान में उसके जहन में उन अंग्रेजों की विचारधारा है जो तानाशाही का वातावरण बनाकर फूट डालो और राज करो तथा सत्ता पाने के लिए कुछ भी करना पड़े करने में कोई संकोच न करो की पॉलिसी पर चलते है, यदि दूसरे की सत्ता हो तो उसके अच्छे-बुरे सभी कार्यों का विरोध करो और अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दो। मानवता को त्याग दो, जो कहो उसका उलटा करो। जिस जनता ने वोट देने के लिए नाकों चने चबवाये हों उसे पांच साल तक इतना परेशान कर दो कि उसे भी नानी याद आ जाये, जहां तक जनता से दोबारा वोट लेने की आवश्यकता हो उसके लिए वोट डालने वाली मशीन और सरकारी मशीनरी दोबारा सत्ता में लाने के लिए काफी है। देश पर शासन करती है केवल चार प्रतिशत सरकारी मशीनरी शेष सवा सौ करोड़ जनता को न कोई खुश कर पाया न भविष्य में कर पाये। कोई भी व्यक्ति 130 करोड़ जनता का दिल नहीं जीत सकता लेकिन चार प्रतिशत सरकारी मशीनरी को कब्जे में कर सकता है सो कर लिया गया, तुम रटते फिरो लोकतंत्र-लोकतंत्र कौन सुन रहा है। कलियुग में कोई दूसरे की तारीफ नहीं करता बल्कि अपनी प्रशंसा स्वयं करनी पड़ती हैं अपनी उपलब्धि हो या न हो सामने वाले के कामों में इतने कीड़े डाल दो कि देश की जनता उससे नफरत करने लगे यही है अपनी जीत का फण्डा। लेकिन अपने मुंह मियां मिट्ठू कब तक बना जा सकता है और काठ की हाड़ी को कितनी बार चूल्हे पर चढ़ाया जा सकता है। विपक्ष और देश की जनता को कितना परेशान किया जा सकता है जरा अतीत पर गौर फरमायें, यही काम एक बार पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी ने भी किया था परिणाम क्या निकला? इस बात को आज 35 साल होने वाले हैं 1975 के आपात काल और 1984 के दंगों को जनता आज भी नहीं भूली है वहीं गोधरा काण्ड की यादें आज भी रोगटे खड़े कर देती हैं, यदि इन सारी बातों को भुला दें तो 2014 से 2019 तक बीते सोलहवीं लोकसभा के कार्यकाल ने जो मिसाल कायम की है वह लोकतांत्रिक देश में सदा अविस्मरणीय रहेगी, जनता चाहते हुए भी इसे भुला नहीं पायेगी।

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