भारत गांव एवं किसानों का देश है जो आज भी सर्वाधिक सत्तर प्रतिशत की भागीदारी में हैं तथा यही वह आबादी है जिसने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाकर आजादी की पहली सौगात दी, जबकि उद्योग, विधायिका एवं कार्यपालिका केवल अपनी समृद्धि के लिए कार्य करते हैं। भारत लोकतांत्रिक देश है जहां लोक की हालत चिंताजनक और तंत्र की मजबूती से सामाजिक तथा आर्थिक विषमता बढ़ रही है। शिक्षा एवं चिकित्सा जैसे मूल अधिकारों से आज भी देश की सत्तर प्रतिशत आबादी वंचित है और विडम्बना यह है कि आज देश की 17वीं लोकसभा का गठन होने जा रहा है और कथित बड़े राजनैतिक दल देश की जनता को विकसित करने की बात न कहकर उसे भिखारी बनाकर भीख (अनुदान) देने की घोषणायें कर स्वयं अपनी-अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। कोई छः हजार सालाना तो कोई छः हजार मासिक देने का वादा कर चुनाव जीतने की जुगत में लगा है।
देश का दुर्भाग्य देखें कि जो जनता अपने खून-पसीने से विपुल धन सम्पदा करों के रुप में एकत्र करती है उसे देश और समाज के विकास में न लगाकर नेता एवं अधिकारी अपने वेतन भत्ते बढ़ाकर बराबर कर देते हैं और प्रतिवर्ष घाटे का बजट पेश कर देश की जनता को बेवकूफ बना रहे हैं, जिस नेता का चयन देश की मेहनतकश जनता करती है ;समृद्ध व्यक्ति और सम्पन्न अधिकारी कभी भी वोट देने नहीं जाताद्ध उसका दैनिक भत्ता 16-17 रुपये प्रतिदिन और जो नेता शीर्ष पद पर बैठाया जाता है वह चार से पांच करोड़ रुपये प्रतिदिन व्यय कर सकता है। जिस सरकारी अधिकारी कर्मचारी पर जनता की गाढ़ी कमाई का दस से पचास लाख रुपया प्रतिमाह व्यय होता है वे जनता के काम करना तो दूर उससे मिलना भी गवारा नहीं समझते। हम सत्तरहवीं लोकसभा का चुनाव करने जा रहे हैं और उत्तराखण्ड राज्य भी अपने गठन के 18 साल पूर्ण कर चुका है इस नए राज्य में जन्मे बच्चों को पहली बार मताधिकार का अवसर प्राप्त हो रहा है।
चुनाव आयोग और राजनैतिक दल दोनों के चुनाव प्रबंधन पर गौर करें तो अंतर स्पष्ट हो जाता है कि देश की सत्तर प्रतिशत आबादी को दोनों मिलकर किस प्रकार अनदेखा कर रहे हैं। चुनावी बजट सरकारी हो या राजनैतिक दलों का उसका अस्सी प्रतिशत व्यय शहरों में होता है जहां मात्र तीस प्रतिशत मतदाता हैं वे भी मतदान करने नहीं जाते वे इतने असंवेदनशील होते हैं कि उनको जगाने के लिए मतदाता जागरुकता रैलियां निकाली जाती हैं जबकि गांव देहात में कोई मतदाता जागरुकता रैली नहीं होने के बाद भी वहां मतदान का प्रतिशत 70 से ऊपर होता है इससे स्पष्ट हो जाता है कि देश की 70 प्रतिशत आबादी 70 प्रतिशत से अधिक मतदान कर देश की नयी संसद का गठन करती है और उस संसद में जो होता है उससे देश की वही सत्तर प्रतिशत जनता अछूती रहती है जिसने बढ़-चढ़कर मतदान में भाग लिया।
जिस अन्नदाता किसान ने अपनी अथक मेहनत से देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया उसे उसकी उपज का उचित मूल्य न देकर केवल लागत का कुछ अंश ही समर्थन मूल्य के रुप में दिया जाता है जिसमें उस कृषक की मेहनत मजदूरी नहीं जोड़ी जाती है जबकि उद्योगपतियों के लिए बनाया गया नियम इसका ठीक उलटा है क्योंकि वह नेताओं को चंदा और अधिकारियों को रिश्वत देता है। देश से ईमानदारी और मेहनत क्यों गायब हो रही आज जो वर्ग मेहनत मजदूरी कर परिवार पालता है उसे देशद्रोही और राष्ट्रद्रोही की श्रेणी में गिना जाता है। अफसोस ही नहीं विडम्बना देखंे कि जो अपने परिवार और पारिवारिक जिम्मेदारियों से भाग गए वे मुख्यमंत्री बन गए जो अपनी मां और पत्नी को छोड़ गए वे प्रधानमंत्री बन गए जो अपनी मां को अपने पास नहीं रखते उनकी मां एक जानवर है, एक नदी है। जिस भारत देश को लूट-लूट कर उसकी आर्थिकी को बर्बाद कर किया वे अब भारत माता की जय के नारे लगाकर देश की जनता को क्या समझ रहे हैं देश की नई संसद के निर्माण के लिए 11 अप्रैल से मतदान का दौर प्रारम्भ हो रहा है। देश की जनता को अपना और अपने देश तथा भावी पीढ़ी के भविष्य निर्माण के विषय में सोचने का यही उचित अवसर है।
देश का दुर्भाग्य देखें कि जो जनता अपने खून-पसीने से विपुल धन सम्पदा करों के रुप में एकत्र करती है उसे देश और समाज के विकास में न लगाकर नेता एवं अधिकारी अपने वेतन भत्ते बढ़ाकर बराबर कर देते हैं और प्रतिवर्ष घाटे का बजट पेश कर देश की जनता को बेवकूफ बना रहे हैं, जिस नेता का चयन देश की मेहनतकश जनता करती है ;समृद्ध व्यक्ति और सम्पन्न अधिकारी कभी भी वोट देने नहीं जाताद्ध उसका दैनिक भत्ता 16-17 रुपये प्रतिदिन और जो नेता शीर्ष पद पर बैठाया जाता है वह चार से पांच करोड़ रुपये प्रतिदिन व्यय कर सकता है। जिस सरकारी अधिकारी कर्मचारी पर जनता की गाढ़ी कमाई का दस से पचास लाख रुपया प्रतिमाह व्यय होता है वे जनता के काम करना तो दूर उससे मिलना भी गवारा नहीं समझते। हम सत्तरहवीं लोकसभा का चुनाव करने जा रहे हैं और उत्तराखण्ड राज्य भी अपने गठन के 18 साल पूर्ण कर चुका है इस नए राज्य में जन्मे बच्चों को पहली बार मताधिकार का अवसर प्राप्त हो रहा है।
चुनाव आयोग और राजनैतिक दल दोनों के चुनाव प्रबंधन पर गौर करें तो अंतर स्पष्ट हो जाता है कि देश की सत्तर प्रतिशत आबादी को दोनों मिलकर किस प्रकार अनदेखा कर रहे हैं। चुनावी बजट सरकारी हो या राजनैतिक दलों का उसका अस्सी प्रतिशत व्यय शहरों में होता है जहां मात्र तीस प्रतिशत मतदाता हैं वे भी मतदान करने नहीं जाते वे इतने असंवेदनशील होते हैं कि उनको जगाने के लिए मतदाता जागरुकता रैलियां निकाली जाती हैं जबकि गांव देहात में कोई मतदाता जागरुकता रैली नहीं होने के बाद भी वहां मतदान का प्रतिशत 70 से ऊपर होता है इससे स्पष्ट हो जाता है कि देश की 70 प्रतिशत आबादी 70 प्रतिशत से अधिक मतदान कर देश की नयी संसद का गठन करती है और उस संसद में जो होता है उससे देश की वही सत्तर प्रतिशत जनता अछूती रहती है जिसने बढ़-चढ़कर मतदान में भाग लिया।
जिस अन्नदाता किसान ने अपनी अथक मेहनत से देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया उसे उसकी उपज का उचित मूल्य न देकर केवल लागत का कुछ अंश ही समर्थन मूल्य के रुप में दिया जाता है जिसमें उस कृषक की मेहनत मजदूरी नहीं जोड़ी जाती है जबकि उद्योगपतियों के लिए बनाया गया नियम इसका ठीक उलटा है क्योंकि वह नेताओं को चंदा और अधिकारियों को रिश्वत देता है। देश से ईमानदारी और मेहनत क्यों गायब हो रही आज जो वर्ग मेहनत मजदूरी कर परिवार पालता है उसे देशद्रोही और राष्ट्रद्रोही की श्रेणी में गिना जाता है। अफसोस ही नहीं विडम्बना देखंे कि जो अपने परिवार और पारिवारिक जिम्मेदारियों से भाग गए वे मुख्यमंत्री बन गए जो अपनी मां और पत्नी को छोड़ गए वे प्रधानमंत्री बन गए जो अपनी मां को अपने पास नहीं रखते उनकी मां एक जानवर है, एक नदी है। जिस भारत देश को लूट-लूट कर उसकी आर्थिकी को बर्बाद कर किया वे अब भारत माता की जय के नारे लगाकर देश की जनता को क्या समझ रहे हैं देश की नई संसद के निर्माण के लिए 11 अप्रैल से मतदान का दौर प्रारम्भ हो रहा है। देश की जनता को अपना और अपने देश तथा भावी पीढ़ी के भविष्य निर्माण के विषय में सोचने का यही उचित अवसर है।
Comments
Post a Comment