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देवभूमि उत्तराखण्ड है धर्मस्थलों का गुलदस्ता : स्वामी प्रेमानन्द शास्त्री


हरिद्वार। श्रीकृष्ण हरिधाम ट्रस्ट के परमाध्यक्ष स्वामी प्रेमानन्द शास्त्री जी महाराज ने कहा है कि धर्म को धारण करने वाला सुख एवं समृद्धि को प्राप्त करते हुए जीवन के परमआनन्द की अनुभूति करता है। शास्त्र और संविधान एक-दूसरे के पूरक हैं, जिस प्रकार धर्म का संचालन शास्त्रों के अनुरुप होता है उसी प्रकार देश और उसकी सरकार का संचालन संविधान से होता है। वे आज भोपतवाला स्थित श्रीकृष्ण हरिधाम में देवभूमि उत्तराखण्ड की धार्मिक यात्रा पर आये श्रद्धालुओं को धर्मोपदेश का सार समझा रहे थे।

हरिद्वार को भारत की अध्यात्मिक राजधानी बताते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार देश और प्रदेश की सत्ता संचालन के लिए उसके मुख्यालय की आवश्यकता है जिसे राजधानी कहते हैं उसी प्रकार धर्म एवं अध्यात्म की दीक्षाओं के संचालन के लिए धर्मस्थलों की स्थापना हमारे धर्मगुरु एवं धर्मोपदेशकों ने की हैं। देवभूमि उत्तराखण्ड (हिमालय) के धार्मिक स्वरुप का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान शिव की तपस्थली तथा मां गंगा के उद्गम स्थल और सनातन धर्म के चारों धामों के साथ ही फूलों की घाटी, कलियर शरीफ एवं हेमकुण्ड साहिब तथा नानकमत्ता पूरे विश्व को तीर्थाटन के लिए आकर्षित करते हैं। आदि जगद्गुरु शंकराचार्य की तपस्थली के साथ ही पाण्डवों के वनवासकाल की कथा और लक्ष्मण जी की मूर्छा को समाप्त करने वाली संजीवनी बूटी भी इसी देवभूमि के वरदान हैं। देवभूमि के दर्शनीय स्थलों को जीवन की दिशा और दशा बदलने वाला बताते हुए उन्होंने कहा कि सप्तऋषियों की तपस्थली तथा कुम्भ, अर्द्धकुम्भ एवं श्रावण मास के कांवड़ मेलों के माध्यम से करोड़ों-अरबों तीर्थयात्री यहां आकर अपने जीवन को सार्थक बनाते हैं इस कार्य के संचालन में धर्मनगरी के धर्मस्थलों का विशेष महत्व है जहां धर्मप्रेमी जनता को भोजन प्रसाद एवं आवासीय सुविधायें उपलब्ध करायी जाती हैं। 

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