मशीन और मैनुअल में अन्तर होता है यह प्रकृति का नियम है कि जब व्यक्ति मशीनों के विषय में जानता नहीं था तब स्वस्थ, मस्त और चिरायु होता था और जब से व्यक्ति का मशीनों से मोह बढ़ा तब से व्यक्ति ही मशीन बन गया। जब मशीन है तो उसमें खराबी होना स्वभाविक है, जब व्यक्ति बीमार पड़ सकता है तो मशीन भी खराब हो सकती है, चूंकि लोकतंत्र की रक्षा और भावी लोकतंत्र के निर्माण का जिम्मा जब मशीन के हवाले कर दिया जायेगा तो फिर बीमार लोकतंत्र ही पैदा होगा, जैसा कि हो रहा है। भारत में ईवीएम का जन्म हुए अभी दो दशक भी पूर्ण नहीं हुए हैं इसकी कार्यशैली पर लगातार उगलियां उठ रही हैं लेकिन कुछ दल एवं उनके नेताओं की ऐसी नियति बन गयी है कि वे ईवीएम को बाय-बाय करने के स्थान पर उसे छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहे तो चुनाव आयोग तो राजनीति की कठपुतली बनेगा ही। भले ही वह पद संवैधानिक है लेकिन अब पहले जैसी विश्वसनीयता नहीं रह गई जब टी.एन. शेषन ने अपना असली रुप दिखाया था। एक बात ध्यान में रख लो कि जब तक मशीनों से वोट पड़ेंगे, मशीने खराब होती रहेंगी फिर अच्छे और स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना मिथ्या होगी।
ईवीएम राजनीति का ऐसा सरस फल है कि जो दल या नेता इसका स्वाद चख चुके वे इसकी बुराई नहीं करते लेकिन यह स्वाद इतना महंगा है कि हर राजनेता इसका रसास्वादन नहीं कर सकता यह बात अब पूरे देश की जनता जान चुकी है लेकिन होगा वही जो राम जी करेंगे, जो चीखते हैं वे चीखते रहें और सोशल मीडिया पर पोस्ट डालते रहें, अजी कौन सुन रहा, और कौन उस पर कार्यवाही कर रहा, प्रचार तंत्र भी अब पहले वाला नहीं रहा देश के वर्तमान हालात पर गहन चिंतन किया जाये और संवैधानिक संस्थाओं की कार्यशैली का मूल्यांकन किया जाये तो देश में ऐसे हालात तैयार हो रहे हैं कि संविधान एवं लोकतंत्र दोनों खतरे में हैं। देशभक्ति का झूठा राग अलापना और देशद्रोह में फंसाने की झूठी धमकियों ने सत्ता के विश्वास को खो दिया है। शासक देश का राजा होता है जिस पर समस्त जनता के हितों की रक्षा का दायित्व होता है लेकिन चीन के राष्ट्रपति के समान या हिटलर की कार्यशैली जब किसी व्यक्ति पर सत्ता में रहने का कोई जुनून सवार कर दे तो उसका और देश का दोनों का अस्तित्व खतरे की ओर अग्रसर हो जाता है। वर्तमान चुनाव में कम हो रहे मत प्रतिशत, प्रत्याशियों के चरित्र, उनके पेशे, कार्यशैली और समाज के प्रति उनके दायित्व पर यदि गौर करें तो संसद का भावी चेहरा और धुंधला होने के आसार बन रहे हैं। अब क्या नाचने गाने वाले संसद चलायेंगे या जेल से निकलने वाले अब जनता के मसीहा बनेंगे? वर्तमान हालात को देखकर उन अमर शहीदों की आत्मा कैसा महसूस करती होगी जिन्होंने अपनी जान की कुर्बानी देकर इस देश को आजाद करवाया था। यह तो तभी आभास होने लगा था जब आजादी के नायक को आजादी के साढ़े पांच महीने में ही मौत के घाट उतार दिया गया था हालांकि उनकी इसी कार्यशैली एवं विचारधारा के चलते हमारे पूर्वजों ने उस दल या उसके नेताओं को सत्ता के करीब नहीं फटकने दिया लेकिन सत्ता का नशा इतना खराब होता है कि एक नेता ने जब देश में आपातकाल लागू कर अत्याचार का ताण्डव शुरु कर दिया तो सम्पूर्ण विपक्ष को एकजुट होना पड़ा और उस एकता में आजादी में महानायक के हत्यारे भी सम्मिलित हो गए तथा 1977 में गठित हुई जनता पार्टी की सरकार में इनके मुंह सत्ता का खून लग गया उसी दिन से उन्हांेने देश की सत्ता पर काबिज होने के लिए नए सिरे से काम शुरु किया, संस्थाओं का गठन किया, सरकारी जमीने आंवटित करायीं, शिक्षण संस्थाएं प्रारम्भ की और अपनी गतिविधियां इस प्रकार बढ़ायीं कि सत्ता के लिए कुछ भी करना पड़े, करने में कोई संकोच नहीं करेंगे उनका यही मिशन उनको भले ही साम्प्रदायिक होने का दंश दे गया हो लेकिन उन्हांेने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनका समाज या राष्ट्र से कोई नाता न होकर केवल और केवल सत्ता पाना उद्देश्य हो गया इसीलिए आज ऐसे हथकण्डे अपनाये जा रहे हैं कि देश से संविधान और लोकतंत्र दोनों की विदाई के लक्षण प्रतीत होने लगे हैं।
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