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मुद्दाविहीन बन गया लोकसभा चुनाव

17वीं लोकसभा के गठन हेतु देश की 91 सीटों पर गत 11 अप्रैल को प्रथम चरण का मतदान सम्पन्न हो चुका है जबकि 13 राज्यों की 97 सीटों पर दूसरे चरण का मतदान 18 अप्रैल को हो रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद एक ऐसी परम्परा जिसे चुनावी संस्कृति भी कह सकते हैं जिसके कर्ता-धर्ता देश और समाज के लिए कुछ भी न कर केवल अपने और अपने चार-पांच उन घरानों के लिए सबकुछ न्यौछावर कर रहे हैं जो उनकी चुनावी वैतरणी पार करते हैं। देश में पहली बार ऐसा मुद्दाविहीन चुनाव हो रहा है जिसमें जनता को खैरात बांटने का तो जिक्र है लेकिन जो देश और समाज की मूलभूत आवश्यकतायें हैं उन पर किसी भी दल के घोषणा-पत्र में कुछ भी खास नहीं है। 28 मार्च के बाद से प्रारम्भ हुए चुनाव प्रचार पर यदि गौर करें तो प्रत्येक राजनेता एक-दूसरे की बुराई के अलावा अपनी किसी भी उपलब्धि पर जोर नहीं दे रहा है। देश की जनता इन बुराईबाज राजनेताओं की बातंे सुन-सुन कर इतना थक चुकी है कि वह इस नतीजे पर पहुंच गयी की ये सभी राजनेता जो स्वयं को राष्ट्रीय दलों का महानायक बता रहे हैं वे देश और समाज के विषय में कितना सोचते हैं। राष्ट्रीय दलों के राजनेता कैसी-कैसी बातों में देश की जनता को उलझा रहे इसी से उनकी मानसिकता का पता लगाया जा सकता है कि वे देश के प्रति कितने संवेदनशील हैं। इस चुनाव में इन राजनेताओं की एक और उपलब्धि को यदि सम्मिलित किया जाये तो वह है इन सबकी बद्जुबानी, धिक्कर है ऐसे राजनेताओं को जिन्हें बोलने की तहजीब नहीं वे देश चलाने का दावा ठोक रहे हैं। पिछले 60 सालों में सरकारों ने क्या किया यह वर्तमान प्रधानमंत्री बता रहे हैं और वर्तमान सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में क्या किया यह देश की एक राष्ट्रीय पार्टी के साथ ही समूचा विपक्ष बता रहा है। बात केवल बताने तक ही सीमित नहीं है पूरे देश की जनता देख चुकी है, महसूस कर रही और अनुभव चुकी है, इतना ही नहीं देश की जनता पिछली सरकारों से वर्तमान सरकार की तुलना भी कर चुकी है कि जब देश आजाद हुआ था उस समय देश की क्या दशा थी और अस्सी के दशक से प्रारम्भ हुए उन्नति के सफर ने 2014 से पूर्व तक क्या-क्या उपलब्धियां हासिल कीं।
देश की जनता इस चुनाव में किसी फेकूराम या पप्पू भाई को वोट देने से पहले कुछ सोचेगी जरुर कि जो बादल गरजते हैं वे कितना बरसते हैं और किसी व्यक्ति की बुराई के शब्द उसी व्यक्ति की जुबान से निकलते हैं जो स्वयं बुरा होता है, अन्यथा लोकसभा चुनाव का मुद्दा ऐसा कभी नहीं रहा जैसा वर्तमान चुनाव में देखा जा रहा है। सत्ता में आते ही जिस व्यक्ति ने देश की जनता की मेहनत मजदूरी का सारा धन निकलवा लिया और कुछ लोगों को बड़ी-बड़ी धनराशि लेकर विदेश भगा दिया भला यह कैसी चौकीदारी कि देश का खजाना ही गायब करवा दिया। कालेधन के नाम पर चवन्नी वापस नहीं आयी जबकि उद्योगपति, व्यापारी, राजनेता और अधिकारी अब भी खंगाले जा रहे हैं कहां ले जायेगा इस धन को और क्या होगा इस देश का जनता सोचे समझे और मतदान करे।

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