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भारत की हो रही दुर्दशा को चुनाव के माध्यम से संभाले देश की जनता

धर्म और राजनीति दोनों अलग-अलग पहलू हैं, धर्म से राजनीति और समाज दोनों को दिशा मिलती है। धर्म धारण करने की वस्तु है जिससे व्यक्ति धर्म में आस्था बढ़ाकर कर्म की शुद्धि की ओर अग्रसर होता है जबकि राजनीति में छल, बल, झूठ-फरेब तथा साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति अपनानी पड़ती है इसीलिए धर्म को राजनीति से अलग रखा गया था। भारत में एक ऐसा संगठन है जो गुलामी के समय से ही देश का दुश्मन रहा और अंग्रेजों की चाटुकारिता तथा मुखबिरी की, उस संगठन का स्वतंत्रता संग्राम में भी कोई योगदान नहीं रहा और जिस संगठन अथवा व्यक्तियों ने देश को स्वतंत्र कराया वे लोग और संगठन दोनों ही उस संगठन के दुश्मन बन गए परिणाम स्वरुप देश के प्रति गद्दारी करने वालों को देश की जनता ने कभी सत्ता के लिए नहीं चुना।
देश के इन गद्दारों ने देश को पुनः गुलामी में जकड़ने के लिए जहां सरकारी जमीनों को एक विद्यालयी संस्था तथा अन्य संस्थाओं के नाम से आंवटित कर अपनी जड़ें जमायीं वहीं चुनावों में जनता को शराब, धन तथा अन्य खानपान एवं उपभोक्ता की वस्तुएं मुहैया कराकर इतना लालची बना दिया कि जनता अपने वोट की कीमत वसूलने लगी। इस संगठन ने जब देखा कि पूरे देश की जनता अब स्वार्थी हो गयी और वह अपने वेाट की कीमत वसूलने लगी तभी उस संगठन ने कुछ पूंजीपतियों से सांठ-गांठ कर उनकी पूंजी अपनी राजनीति में निवेश करायी जिसका पहला चरण 2011 से 2014 तक चला और पंूजीपतियों के धन से ताबड़-तोड़ रैलियां कर जनता को इतना बड़ा लालच दिया गया कि उसने भविष्य में भी कभी नहीं सोचा होगा इस काम के लिए एक कथित धर्मगुरु को भी लगाया गया जिसने विदेशोें में जमा कालेधन का आंकड़ा पूरे देश में अपने शिविरों के माध्यम से पहुंचाया तब जनता को विश्वास हो गया कि 15-15 लाख रुपये उसके खातों में आ जायेंगे और देश की जनता अच्छे दिनों का मजा लेगी, आखिर 2014 से 2018 के बीच हुए घटनाक्रमों से सिद्ध हो गया कि लालच बुरी बला होती है।
देश की जनता का दर्द सुनने वाला कोई नहीं है, चंद लोग देश की जनता की मेहनत की कमाई का करोड़ों रुपये लेकर विदेश भाग जायें, उन्हें रोकने वाला कोई न हो, भगोड़ों की जो सम्पत्ति देश में बची हो उसे विस्फोटक के माध्यम से ध्वस्त कर दिया जाये, वह भी यह कहकर कि यह निर्माण अवैध था, आखिर किसकी शह पर अवैध निर्माण हुआ था, निर्माण वैध हो या अवैध वह देश की सम्पत्ति था। देश की सेना सुरक्षित नहीं, यदि किसी रक्षा सौदे पर घोटालों का आरोप लगे तो झूठा हलफनामा दिया जाये और फाइलें गायब कराकर न्यायपालिका में बाद में यह कह दिया जाये कि सम्बन्धित फाइलें चोरी हो गयीं, फिर भी मीडिया यह प्रचारित करे कि देश सुरक्षित हाथों में है। जिस देश के किसान को अपनी मेहनत का मूल्य न मिलता हो, जनता करों की मार से मर रही हो ऊपर से नोटबंदी और जीएसटी की मार पड़े तथा रोजगार देने के स्थान पर समाप्त कर दिए जायें।
देश और समाज को एक-दूसरे से अलग करने की परम्परा इतनी बलवती होती जा रही है कि यदि कोई दल आपस में गठबंधन कर लें तो उन्हें बेमेल और ठगबंधन तथा महामिलावट का दर्जा दे दिया जाये। संविधान और संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग से भी काम न चले तो धर्म के नाम पर राजनीति की जाये और इसमें भी सफलता मिलती न दिखे तो देश की सुरक्षा और सैनिक कार्यवाही पर राजनीति होने लगे तो देश किस ओर जा रहा है यह समय रहते समझने की बात है। यदि किसी दल नेता की गलत कार्यवाही का विरोध किया जाये तो उसे राष्ट्रद्रोही कहकर न केवल बदनाम किया जाये बल्कि उस पर मुकदमा भी दर्ज करा दिया जाये तो लोकतंत्र का अर्थ बिगड़ जाता है। लोकतंत्र बहुमत के आधार पर चलता है लेकिन विपक्ष भी लोकतंत्र का अंग होता है। सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करना विपक्ष और जनता दोनों का अधिकार होता है लेकिन जब उनकी जुबान पर ताला लगाने का काम हो रहा हो तो देश की स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। सरकार को चाहिए कि वह जन भावनाओं का सम्मान करते हुए सत्ता का संचालन करे।

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